हरियाणा की सभ्यता: लोहारू-पलवल और रेवाड़ी
ब्रिटिश शासन के समय लोहारू स्टेट को भी राजशाही रुतबा हासिल था और उसके शासक को 9 तोपों की सलामी प्राप्त करने क सम्मान भी मिला हुआ था। यहां पर मुस्लिम राजशाही की स्थापना वर्ष 1803 में अहमद बख्श खान द्वारा की गई थी। उस वर्ष यह स्टेट ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने भरतपुर के जाट-शासकों के खिलाफ मदद करने के एवज में अहमद बख्श खान को पुरस्कार रूप में प्रदान की थी।
वर्ष 1827 में अहमद बख्श का बेटा शमसुद्दीन खान गद्दी पर बैठा, मगर उसका शासनकाल लम्बा नहीं चला। वर्ष 1835 में उसे दिल्ली के ब्रिटिश रेजिडेंट सर विलियम $फे्रज़र की हत्या का षड्यंत्र रचने के आरोप में $फांसी दे दी गई थी। उसके बाद यह सत्ता शमसुद्दीन के भाई अमीनुद्दीन खान व जि़याउद्दीन खान को सौंपी गई।
नवाब लोहारू की हवेली, जिसका एक नाम ‘महल सरा’ भी था, अब भी दिल्ली के बल्लीमारान क्षेत्र में मौजूद है। इस हवेली में नवाब के दामाद एवं प्रख्यात उर्दू शायर मिजऱ्ा $गालिब कुछ वर्ष तक रहे थे। वैसे मिजऱ्ा की अपनी हवेली भी कुछ दूरी पर थी। अब भी दिल्ली के बल्लीमारान क्षेत्र में ही एक गली, ‘कोठी नवाब लोहारू-लेन’ कहलाती है।
अमीनुद्दीन खान के बाद 1869 में यहां का शासन उसके बेटे अलाउद्दीन खान ने सम्भाला। बाद में उसका बेटा अलाउद्दीन खान गद्दी पर बैठा। वह उस समय मलेरकोटला स्टेट के प्रशासक के रूप में भी जाना जाता था। वह बाद में ब्रिटिश वायसराय की ‘लैजिस्लेटिव काउंसिल’ का सदस्य भी मनोनीत हुआ था। उसी का बेटा अमीनुद्दीन खान लोहारू का नवाब बना। विभाजन के समय नवाब ने भारत में विलय स्वीकार कर लिया लेकिन शाही परिवार के अनेक अन्य सदस्य लोहारू छोडक़र पाकिस्तान चले गए थे। नवाब अमीनुद्दीन की बेटी माहबानो बेगम अब भी इस्लामाबाद में ही रहती हैं।
अब लोहारू 119 गांवों पर आधारित एक सब-डिविज़न है। यहां अब भी वर्ष में दो बार (जनवरी व जुलाई) में ऊंटों का एक विशाल मेला लगता है और बड़ी संख्या में यहां पर्यटक भी आते हैं।
पलवल: इस शहर को कपास के उत्पादन से जाना जाता है
दिल्ली से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पलवल शहर भी अपनी मूल स्थापना महाभारत काल से जोड़ता था। तब इसका नाम अप्लेवा था। बाद में इसी विक्रमादित्य ने नया रूप दिया। किवदंती यही है कि पांडवों के शासन में यहां एक राक्षस पलवासुर बसा हुआ था। प्रजा के आग्रह पर भगवान कृष्ण के भाई बलराम ने उसका वध किया था। अब भी इस घटना की स्मृति में हर वर्ष ‘बलदेव छात का मेला’ आयोजित होता है। यहां पर पालिका परिसर के समीप बलदेव मंदिर भी स्थित है। पलवल के रेलवे स्टेशन से महात्मा गांधी का नाम भी जुड़ा हुआ है। महात्मा इसी रेलवे स्टेशन पर पहली बार गिरफ्तार किए गए थे। उनकी स्मृति में यहां गांधी आश्रम भी स्थापित किया गया।पलवल ब्रिटिश युग गुडग़ांव का ही एक भाग था। वर्ष 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में यहां के लोगों ने पूरी सक्रियता से भाग लिया। इसी शहर के हयात अली व खैरात अली के साथ 70 लोगों ने उस संग्र्राम में शहादत पाई थी। इससे पूर्व 17वीं शताब्दी में भी यहां मुसलमान का शासन था लेकिन साम्प्रदायिक-सद्भाव व राष्ट्रीयता इस शहर एवं क्षेत्र की विशिष्ट पहचान थी। अब इस शहर को ‘कपास’ के उत्पादन व उससे जुड़े उद्योगों के कारण भी पहचाना जाता है। यद्यपि यह महानगर नहीं है, मगर इसे 21वें जि़ले का दर्जा प्राप्त है। यहां का पंचवटी-मंदिर भी प्रागैतिहासिक माना जाता है। लगभग 12 लाख की आबादी वाला यह नगर मुख्य जीटी रोड पर स्थापित होने के कारण अब प्रदेश के समृद्ध नगरों की $फहरिस्त में शामिल है।
बलराम की धर्मपत्नी राजकुमारी रेवती के नाम से बना ‘रेवाड़ी’
हरियाणा के अनेक अन्य नगरों की तरह रिवाड़ी की प्रागैतिहासिकता भी महाभारत काल से जुड़ी है। किवदंतियों के अनुसार भगवान कृष्ण के अग्रज बलराम कुशास्थली की राजकुमारी रेवती से ब्याहे थे। उसी रेवती के नाम पर बसे गांव का नाम धीरे-धीरे रेवाड़ी हो गया। मगर अधिकृत रिकार्ड के अनुसार रिवाड़ी की स्थापना एक अहीर योद्धा नंद राम ने की थी। मध्यकाल में इसी क्षेत्र के कुतबपुरा का एक योद्धा हेमचंद्र भार्गव चर्चा में छाया। उसने अपने काल में 1553 से लेकर 1556 तक पंजाब से बंगाल के मध्य 22 युद्धों में विजय प्राप्त की थी। उसने मुगल सम्राट अकबर की सेनाओं को भी आगरा व दिल्ली में पराजित किया था। दिनांक 7 नवम्बर, 1556 में उसने दिल्ली के पुराना-किला में स्वयं हेमचंद्र विक्रमादित्य के रूप में अपना अभिषेक कराया था।
रिवाड़ी के साथ राव तुला राम का नाम जुड़ा है। उस योद्धा ने प्रथम भारतीय स्वाधीनता संग्राम (वर्ष 1857) में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध विद्रोह किया था। उस काल से लेकर अब तक राव तुला राम को हर वर्ष याद किया जाता है। अब भी यहां की राजनैतिक जि़न्दगी का केंद्र बिन्दु राव-परिवार ही है। इस वंश-परम्परा के राव बिरेंद्र सिंह हरियाणा के दूसरे मुख्यमंत्री भी थे। वह केंद्र में भी मंत्री रहे और अब उन्हीं के बेटे राव इंद्रजीत केंद्र में राज्यमंत्री हैं। दो अन्य कारणों से भी यह क्षेत्र चर्चा में रहा है। पहला कारण, हिन्दी पत्रकारिता के सशक्त हस्ताक्षर बाबू बाल मुकुंद गुप्त की जन्मस्थली होनेे का है और दूसरी विशिष्ट चर्चा के रूप में 1962 के भारत-चीन युद्ध के मध्य हुई ‘रेज़ांगला की लड़ाई’ है। बाबू लाल मुकुंद गुप्त का जन्म यहीं के समीपवर्ती गांव गुडियानी में हुआ था। गांव से ही वह कथुरा, लाहौर, कालाकांकर और फिर कलकत्ता जाकर पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित करने में स$फल रहे थे। इस रेज़ांगला-युद्ध के मध्य भारत-चीन सीमा पर अहीर सैनिकों पर आधारित 13 कुमायूं रेजिमेंट ने अनुपम वीरता का प्रदर्शन किया था। उस युद्ध में (18 नवम्बर, 1962) इस रेजिमेंट के 123 में से 114 वीर सैनिक शहीद हो गए थे। इसी रेजिमेंट के मेजर शैतान सिंह को मरणोपरांत परमवीर चक्र मिला था। इन सबका स्मारक धारूहेड़ा-चौक के समीप बनाया गया है। इस युद्ध में 1700 चीनी सैनिक भी मार किराए गए थे।
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