सिक्खमत के प्रमुख स्तम्भ गुरु अर्जुन देव जी


गुरु नानक के पश्चात् सिक्खमत को विकसित एवं सुदृढ़ करने का श्रेय गुरु अर्जुनदेव को है। इसीलिए उन्हें सिक्खमत का दूसरा स्तम्भ माना जाता है। गुरु अर्जुनदेव ने गुरुमत के प्रचार और प्रसार का ही कार्य नहीं किया वरन् सिक्खमत को अपनी एक अलग पहचान देते हुए उसके संगठन को भी मजबूत किया। गुरु अर्जुनदेव एक सुयोग्य धर्मगुरु ही नहीं थे, वरन् एक लोकहितकारी समाज सेवी, निष्ठावान भक्त, मेधावी मनीषी एवं समर्थ कवि भी थे। भाई गुरुदास ने उनकी प्रशंसा में जो कुछ लिखा है वह सर्वथा सार्थक एवं संगत है। वे कहते हैं-

अरजन काइआ पलट के मूरति हरि गोविन्द सवारी
दल भंजन गुरु सूरमा बड़ जोधा बहु परउपकारी।

गुरु अर्जुनदेव का जन्म 19 वैशाख सम्वत् 1620 (15 अप्रैल, 1563 ई.) को गोइंदवाल में हुआ था। उनके पिता श्री रामदास चौथे गुरु थे और तीसरे गुरु अमरदासजी उनके नाना थे। इसलिए आध्यात्मिकता और प्रभु-भक्ति उन्हें पारिवारिक विरासत के रूप में प्राप्त हुई। वे गुरु रामदास के सबसे छोटे पुत्र थे। प्रिथिचंद और महादेव दोनों उनके बड़े भाई थे। परंतु, इनके विनम्र एवं सौम्य स्वभाव, हरिभक्ति में निष्ठा, पितृ-पे्रम एवं गुरु-श्रद्धा, संगठन-क्षमता, गम्भीर चिंतनशीलता एवं नैसर्गिक काव्य-प्रतिभा आदि को देखकर गुरु रामदास ने उन्हें ही गुरगद्दी पर प्रतिष्ठित किया। इनके बड़े भाई प्रिथिचंद इसे सहन नहीं कर सके। सत्ता का लोभी प्रिथिचंद ईष्र्या एवं द्वेषवश जीवर भर इनका प्रबल विरोध करता रहा और उनके अनिष्ट में जुटा रहा। गुरु अर्जुनदेव को संवत् 1636 (सन् 1581) में गुरुता प्राप्त हुई थी लेकिन प्रिथिचंद उनके गुरु रूप में स्थापित होने में निरंतर बाधाएं उपस्थित करता रहा। यही नहीं, उसने उनके पुत्र हरगोबिंद को मरवाने के भी अनेक प्रयास किए, जिससे उनके पश्चात् गुरुता उसके परिवार में आ सके। अपने इन प्रयत्नों में असफल होने पर उसने लाहौर और दिल्ली के शासकों से मिलकर उनके विरुद्ध षड्यंत्र किया, जिसके परिणामस्वरूप अंतत: संवत् 1663 (सन् 1606) में लाहौर के शासक द्वारा अनेक कठोर यातनाएं देकर उनकी अमानुषिक हत्या कर दी गई और इस तरह गुरु अर्जुनदेव गुरु-परम्परा के प्रथम शहीद बने।

गुरु अर्जुनदेव की मृत्यु के कारणों के संबंध में अनेक मत प्रचलित हैं। सिक्ख-परम्परा के अनुसार लाहौर के सूबेदार का एक सरदार चंदूशाह भी उनकी मृत्यु का कारण बना था क्योंकि गुरु अर्जुनदेव ने अपने पुत्र हरगोबिंद के लिए उसकी कन्या का सम्बन्ध स्वीकार नहीं किया था, जिससे खिन्न होकर उसने शासकों को उनके विरुद्ध भड़काया। इस घटना का एक राजनैतिक कारण भी माना जाता है और कहा जाता है कि जहांगीर गुरु अर्जुनदेव से इसलिए रुष्ट था क्योंकि गुरु अर्जुनदेव पर खुसरो की सहायता का आरोप लगाया गया था। कुछ विद्वानों का मत है कि जहांगीर धार्मिक दृष्टि से अकबर जैसा उदार नहीं था। वह गुरुमत के बढ़ते हुए प्रभाव से बहुत चिंतित था, इसलिए वह चाहता था कि या तो गुरु अर्जुनदेव को इस्लाम के प्रभाव के अंतर्गत ले लिया जाए अन्यथा उन्हें नष्ट कर दिया जाए। 'तुजके जहांगीरी' से इस बात का स्पष्ट संकेत मिलता है कि गुरु अर्जुनदेव को जहांगीर की अनुदार, संकुचित एवं असहिष्णु धार्मिक भावनाओं का शिकार होना पड़ा था।

गुरु अर्जुनदेव की शहीदी सिक्ख-इतिहास की एक लोमहर्षक घटना है। उन्हें बंदी बनाकर जब लाहौर के शासक मुर्तजा खां को सौंपा गया तो वहां उन्हें अमानुषिक यातनाएं दी गईं। उन्हें गर्म सलाखों से जलाया गया। गर्म रेत पर लिटा दिया गया, उबलते हुए पानी और तपते हुए कड़ाहे से तेल डालकर उनके शरीर को जलाया गया। लेकिन, गुरु जी अपने प्रण पर अटल रहे और अपने आदर्शों के लिए अनेक कष्ट सहते हुए शहीदी प्राप्त की। उनका यह बलिदान उनकी नैतिक शक्ति, पवित्र जीवन के प्रति निष्ठा और अदम्य साहस का परिचायक है। इस घटना ने सिक्ख-इतिहास को एक नया मोड़ दिया और उसमें क्रांतिकारी परिवर्तन उपस्थित हुए। गुरु अर्जुनदेव ने आत्म बलिदान देकर सिक्खमत को नया जीवन प्रदान किया और साहस, दृढ़ता, निर्भीकता, संघर्ष और बलिदान की परम्परा को जन्म दिया। उनके पुत्र और गुरुता के उत्तराधिकारी गुरु हरगोबिंद दो तलवारें धारण करने लगे, जिसमें से एक अध्यात्म की प्रतीक थी, दूसरी शक्ति की और इस तरह सिक्खमत में अध्यात्म के साथ-साथ शौर्य की परम्परा का प्रर्वत्तन हुआ और शक्ति संगठन की प्रवृत्ति का प्रारंभ होता है। 

सिक्खमत को दृढ़ करने में योगदान

गुरु अर्जुनदेव ने सिक्खमत के सिद्धांतों के प्रचार के साथ-साथ इसके आध्यात्मिक विचारों एवं सामाजिक आदर्शों को व्यवहार में प्रयुक्त करने पर बल दिया। उन्होंने धर्म-प्रचारार्थ अनेक स्थानों का भ्रमण किया; अनेक लोक-कल्याणकारी कार्य किए; सरोवर, कुएं, बावडिय़ां खुदवाईं, नगर बसाए, व्यापार-व्यवसाय, कला-शिल्प और कृषि को प्रोत्साहन दिया, मसंदों की नियुक्ति की; धर्मशालाएं बनवाईं; सिक्खमत को उसका स्थायी धर्म-ग्रंथ और उपासना केंद्र प्रदान किया तथा नित्य गुरुवाणी पाठ, कीर्तन और सत्संगति की प्रथा चलाई। इससे सिक्खमत् को एक समुचित व्यवस्था मिली और उसका विधिवत विकास होने लगा। सिक्खों को अपने धर्माचरणा में दृढ़ रहने के संस्कार एवं प्रेरणा मिली। अत: उनके अनुयायियों की संख्या निरंतर बढऩे लगी और सिक्खमत एक शक्तिशाली सम्प्रदाय के रूप में स्थापित हो गया। इनके समय में पेशावर से दिल्ली तक सिक्खमत का प्रभाव था। अमृतसर नगर की संरचना, हरि-मंदिर का निर्माण तथा 'आदिग्र्रंथ' का सम्पादन सिक्खमत को उनकी महत्त्वपूर्ण देन है जिनसे सिक्ख-मत ने अपनी निजी विशिष्टता और पहचान प्राप्त की। अमृतसर नगर की संरचना का कार्य यद्यपि अकबर द्वारा भेंट की गई भूमि पर गुरु रामदास द्वारा आरंभ किया गया था किंतु गुरु अर्जुन देव ने इस नगर को उन्नत एवं समृद्ध किया और वहां अनेक व्यवसायों की व्यवस्था की। अमृतसर में ही 1588 ई. में उन्होंने 'हरि मंदिर' की नींव डाली और इसकी पहली ईंट प्रसिद्ध सूफी फकीर मियां मीर से रखवाई गई जिससे उनकी धार्मिक उदारता का परिचय मिलता है। 'हरि मंदिर' मानववादी भावना का प्रतीक था। उसके चार द्वार इस तथ्य के द्योतक थे कि यह मंदिर चारों वर्णों के लिए, चारों दिशाओं से खुला हुआ है तथा कर्म, ज्ञान, वैराग्य एवं योग इन चारों मार्गों से प्रवेश पाकर हरि-भक्ति और प्रभु-सेवा द्वारा प्रभु को पाया जा सकता है। गुरु अर्जुनदेव द्वारा निर्मित 'हरि मंदिर' सिक्खों की आस्था और विश्वास का केंद्र था और उनका मुख्य उपासना स्थान है।

'आदिग्रंथ' का सम्पादन

'आदिग्रंथ' सिक्खमत को गुरु अर्जुनदेव की सबसे महत्त्वपूर्ण देन है। किसी धर्म अथवा सम्प्रदाय की स्थायी सत्ता बनाने में उस धर्म के धर्मग्रंथ का विशेष महत्त्व होता है। सिक्खमत का ऐसा कोई 'धर्मग्रंथ' पहले से नहीं था। गुरु अर्जुनदेव सिक्खमत को व्यवस्थित एवं सुदृढ़ करने के लिए अनेक प्रयास कर रहे थे। सिक्खमत को स्वायत्तता प्रदान करने के लिए उन्होंने एक ऐसे ग्रंथ की रचना का संकल्प किया जिससे सिक्खधर्म के सिद्धांतों का विस्तार से प्रतिपादन हो सके और वह सिक्खों के लिए स्थायी प्रेरणा का स्रोत बन सके। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने अपनी तथा पूर्व गुरुओं की प्रामाणिक वाणी का संकलन करने का निश्चय किया, क्योंकि सिक्खमत में 'गुरुवाणी को गुरु रूप और गुरु को वाणी रूप' स्वीकार किया गया है। गुरुओं की प्रामाणिक वाणी को अप्रामाणिक वाणी से अलग करके सुरक्षित रखा जा सके। इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए उन्होंने भाई गुरुदास को यह कार्य सौंपा, जो गुरुवाणी के ज्ञाता, काव्य  के पारखी और दर्शन के विद्वान् थे। अमृतसर के निकट एक निर्जन एवं एकांत स्थान पर 'आदिग्र्रंथ' के सम्पादन का कार्य आरंभ किया गया जो कि 1604 ई. में पूर्ण हुआ। इसके पूर्ण होने पर इसे 'हरि मंदिर' में स्थापित किया गया और बाबा बुड्ढे को इसका प्रथम ग्रंथी नियुक्त किया गया। इस ग्रंथ की रचना से सिक्खों ने अपार हर्ष, उल्लास और आनंद प्रकट किया। 'आदिग्रंथ' में गुरु अर्जुनदेव तथा उनसे पूर्व के चार गुरुओं की वाणी के अतिरिक्त 12वीं से 17वीं शताब्दी तक के 15 प्रमुख संतों- भक्तों की या 17 भाटों की तथा कुछ अन्य रचनाएं संकलित हैं। बाद में गुरु गोबिंद सिंह द्वारा इसमें गुरु तेगबहादुर की वाणी को भी सम्मिलित करके इसे 'गुरु ग्रंथ साहब' का नाम दिया गया है और 1708 में उन्होंने गुरु-परम्परा समाप्त करके 'गुरु ग्रंथ साहब' को ही गुरु मानने का आदेश दिया। 'गुरु ग्रंथ साहब' के 1430 पृष्ठ हैं। इसमें सर्वाधिक वाणी गुरु अर्जुनदेव की है और इसमें उनके 2218 पद संकलित हैं।

'आदिग्रंथ' का सम्पादन अत्यंत जटिल एवं श्रमसाध्य कार्य था। इसकी सबसे बड़ी समस्या वाणी का संकलन करना और उसकी प्रामाणिकता का निर्धारण करना था। इस सम्बन्ध में मत प्रचलित हैं कि गुरु अर्जुनदेव ने पूर्ण गुरुओं की वाणी कैसे और कहां से प्राप्त की। सिक्ख-परम्परा के अनुसार गुरु अर्जुनदेव ने गुरु-वाणी की एक पाण्डुलिपि बाबा मोहन से प्राप्त की थी तथा कुछ वाणी गुरु-सिक्खों से सुनकर लिखी थी, जिन्हें कुछ पद स्मरण थे। कुछ विद्वानों का मत है कि पूर्व गुरुओं की वाणी का संकलन उन्हें गुरु गद्दी के साथ प्राप्त हुआ था। उसी के आधार पर उन्होंने यह ग्रंथ तैयार किया। इसी प्रकार संतों की वाणी के संकलन के सम्बन्ध में भी कई धारणाएं हैं। भाई संतोख सिंह कृत 'गुरु प्रताप सूरज' के अनुसार कबीर, नामदेव आदि संतों ने स्वयं सूक्ष्म रूप में उपस्थित होकर अपनी वाणी लिखवाई थी। मैकालिफ का मत है कि 'विभिन्न संत सम्प्रदायों के अनुयायियों से संतों की वाणी एकत्रित की गई थी।' कुछ लोग यह भी मानते हैं कि संतों की वाणी भी उन्हें परंपरागत रूप से पूर्व गुरुओं से प्राप्त हुई थी। इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय बात यह है कि यह निर्णय गुरु अर्जुनदेव को ही करना था कि किस-किस संत कवि की वाणी को 'आदिग्रंथ' में स्थान देना है और उनके कौन से पद लेने हैं। 'आदिग्रंथ' में जयदेव, नामदेव, शेखफरीद, त्रिलोचन, रामानंद, कबीर, पीपा, सधना, सेना, धन्ना, रविदास, बेनी, परमानंद, भीखम एवं सूरदास की रचनाएं संकलित हैं। लेकिन उनकी सम्पूर्ण वाणी को यहां नहीं लिया गया है। 

किसी संत के तो एक या दो पद ही लिए गए हैं जबकि कुछ के पद पर्याप्त संख्या में आए हैं। जयदेव के 2, त्रिलोचन के 4, रामानंद, सधना, सेन, परमानन्द एवं भीखम का एक-एक, वेणी के 3 तथा धन्ना के केवल 4 पद लिए गए हैं जबकि रविदास के 41, फरीद के पद और श्लोक 134 तथा कबीर के 292 पद और 249 श्लोकों को स्थान दिया गया है। भाटों के भी 123 पद हैं। यह चयन कर पाना सरल नहीं था। इन संतों के जिन पदों को 'आदिग्रंथÓ में स्थान दिया गया है उसके चयन का मुख्य आधार गुरुमत के विचारों से समानता ही हो सकता था और इसके लिए गुरु अर्जुनदेव को कितना विशद अध्ययन और अनुशीलन करना पड़ा होगा, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। उनके सम्मुख विपुल सामग्री रही होगी, किन्तु सूक्ष्मता से उसका अनुशीलन करके समुचित एवं उपयोगी सामग्री का ही चयन किया गया।

यहां विशेष रूप से उल्लेखनीय बात है कि इन कवियों की रचना को अपने 'धर्मग्रंथ' में स्थान देकर गुरु अर्जुनदेव ने अपनी धार्मिक उदारता तथा मानववादी दृष्टि का ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत किया है। इन कवियों में विभिन्न धर्मों, मतों, जातियों, वर्गों एवं क्षेत्रों के लोग सम्मिलित हैं। हिन्दू भी हैं और मुसलमान भी। सू$फी भी हैं और वैष्णव भी। निर्गुण धारा के कवि भी हैं और सगुणधारा के भी। ब्राह्मण भी हैं और हरिजन भी। इस रूप में 'आदिग्रंथ' का सम्पादन गुरु अर्जुनदेव की सामाजिक समानता एवं राष्ट्रीय भावना का भी परिचायक है।

'आदिग्रंथ' का सम्पादन कार्य भी बड़ी कुशलता से वैज्ञानिक पद्धति पर किया गया है। सम्पूर्ण वाणी को विभिन्न रागों में निबद्ध किया गया है और फिर उन्हें एक विशेष योजना के अंतर्गत क्रम-व्यवस्था में रखा गया है। समस्त गुरुवाणी क्रमश: सिरी, माझ, गौडी, आसा, गूजरी, देवगांधारी, बिहागड़ा, बड़हस, सोरठ, धनासरी, जैतसरी, टोडी, बैराडी, तिलंग, सूही, बिलावल, गौंड, रामकली, नटनराइण, माली-गौड़ा, मारू तुखारी, केदारा, भैरव, बसंत, सारंग, मलार, कानडा, कल्याण जैजैवंती एवं प्रभाती इन 31 रागों में विभक्त की गई है। पहले विशिष्ट, राग मेें गुरु नानक (महल्ला-1) की वाणी आती है, फिर क्रमश: दूसरे (महल्ला-2), तीसरे (महल्ला-3), चौथे (महल्ला-4), पांचवें (महल्ला-5) एवं नवें (महल्ला-9) की वाणी रखी गई है। उसके पश्चात् संतों एवं भक्तों आदि की। आरंभ सिरी राग से किया गया है जोकि बड़े रागों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है और समाप्ति प्रभाती राग से होती है। रागों की व्यवस्था भाव, विषय, मन:स्थिति एवं समय के अनुरूप की गई है। वैज्ञानिक ढंग से राग के अंतर्गत एक पदे, द्विपदे, त्रिपदे, चौपदे, छ: पदे, पंच पदे, अष्टपदियां, सोहिले, दंत, बार आदि के क्रम से वाणी रखी गई है। पद छोटे भी हैं और बड़े भी। इनकी तुकों के आधार पर ही इन्हें ये नाम दिए गए हैं। प्रत्येक राग में किसी गुरु की कितनी वाणी है तथा उसमें कितने एकपदे, द्विपदे, चउपदे आदि हैं, इसकी संख्या भी साथ-साथ ही दी गई है। इन रागों के अंतर्गत पहरे, वणजारा, बारहमाहा, दिनरैणी, बिरहड़े, पट्टी, करहले, बावन अखरी, सुखमनी, थिति, घोडिय़ां, आलहणियां, आरती, अनदे, सद्द, सिद्धगोसटि, अंजुलिया, जापु, सोलहे, बार, गाथा, फुनहे आदि कुछ अन्य शीर्षकों से भी वाणी आई है। गुरुजी ने संगीत शास्त्रीय नियमों का कठोरता से पालन नहीं किया, वरन् संगीत की देशी विधि को अधिक अपनाया गया है। वस्तुत: 'आदिग्रंथ' की मनोहारी संगीतात्मकता एवं लयात्मक विशिष्टता के कारण इसे अब 'गुरुमत संगीत' की संज्ञा भी दी जाने लगी है। गुरु जी ने संगीत की सार्थकता भी प्रभुपे्रम के गायन से मानी है।

वस्तुत: 'आदिग्रंथ' की सम्पादन पद्धति से गुरु अर्जुनदेव की साहित्यिक प्रतिभा, व्यापक अध्ययन, मौलिक चिंतन, मानववादी एवं समन्वयवादी उदार दृष्टि, संगीत शास्त्रीय विशद ज्ञान आदि का भरपूर परिचय मिलता है। काव्य की विविध शैलियों एवं विभिन्न काव्यरूपों से भी वे भली-भांति परिचित थे और किस काव्य शैली की ओर किस काव्य रूप को किस राग में प्रस्तुत करना उचित होगा, इसकी उन्हें सम्यक जानकारी थी। गुरुजी को रागों की प्रवृत्ति का भी पूर्ण ज्ञान था और मनुष्य की आध्यात्मिक साधना में क्रमिक विकास की प्रक्रिया को ध्यान में रखकर ही उन्होंने उनके अनुरूप रागों की क्रम-व्यवस्था की है जो श्रोता के मन पर तद्नुरूप अमिट प्रभाव डालती है। निस्संदेह, 'आदिग्र्रंथ' का सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं धार्मिक दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है। यह भक्ति, ज्ञान, वैराग्य से परिपूर्ण रचना है और प्रभुपे्रम की पवित्र एवं निश्छल अनुभूतियों की इसमें मार्मिक व्यंजना हुई है। यह सिक्ख इतिहास, संस्कृति और परम्परा का प्रतीक ग्रंथ है और इसने सिक्खों के सामाजिक एवं धार्मिक आचार का निर्देशन करके उन्हें एक सूत्र में बांधने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। यह सिक्खों की साहित्यिक परंपरा का स्रोत एवं उनके सांस्कृतिक एवं बौद्धिक चिंतन का प्रकाश स्तम्भ है। निश्चय ही समाज और साहित्य को गुरु अर्जुनदेव की यह एक विलक्षण एवं अद्वितीय देन है।

कृतित्व

गुरु अर्जुनदेव की वाणी उपयुक्त जिन शीर्षकों के अंतर्गत रखी गई है उनमें 'बारहमासा' में बिरहणी जीवात्मा की बारह महीनों में होने वाली मन:स्थिति का चित्रण किया गया है। इसका मुख्य विषय आध्यात्मिक है जिसमें यह प्रतिपादित किया गया है कि अटल सुहाग परब्रह्म के वियोग के कारण ही जीवात्मा को वर्ष के बारह महीनों में कष्ट सहना पड़ता है। जैसे- आषाढ़ के विषय में कहा गया है कि यह महीना उन्हीं के लिए तपता है जो प्रभु का नाम स्मरण नहीं करता।1 इन पदों में आध्यात्मिक प्रेमानुभूति की व्यंजना बड़ी सरल और सरस शैली में की गई है। इनमें प्रभु मिलन के उपाय और प्रेरणा तथा मिलन अनुभूति के सुख की झलक भी मिलती है।

'बावन अक्षरी' यद्यपि वर्णमाला के बावन वर्णों के आधार पर लिखी रचना है, पर इसका विषय भी आध्यात्मिक चिंतन, प्रभुभक्ति, नाम के महत्त्व एवं गुरु स्तुति से सम्बन्धित है। गुरुजी ने गउडी, गूजरी, जैतसरी, रामकली, मारूबसंत रागों में कुछ 'वारें' भी लिखी हैं जिनका विषय भी प्रभु का गुणगान करना है और हरि के प्रति अपनी भक्ति को प्रदर्शित करना है। इन 'वारों' में अनुभूतियों की मार्मिक अभिव्यंजना हुई है और भाषा के विविध रूपों (ब्रज, पंजाबी) के दर्शन होते हैं। पहले पहरे के अंतर्गत पांच पद आए हैं, जिनमें मानव जीवन के- शैशव, यौवन, जरा, मृत्यु आदि पांच सोपानों का वर्णन करते हुए मानव जीवन की विभिन्न स्थितियों का चित्रण तथा नाम महिमा के महत्त्व का निरूपण किया गया है। 'थिति' में व्रत उपवास आदि बाह्य कर्मकाण्डों की निंदा करते हुए नाम-स्तुति के महत्त्व के दर्शाया गया है। इसी तरह 'दिन रैणी' में भी हरि स्मरण की पे्ररणा दी गई है। 'बिरहड़े' में मनुष्य को सांसारिक धन सम्पति आदि से अनासक्त होकर संतोषी जीवन व्यतीत करते हुए प्रभु स्मरण की पे्ररणा दी गई है। 'फूनहे' में भी माधुर्य भाव से ओतप्रोत पद हैं जिनमें जीवात्मा की अपने प्रिय परमात्मा के प्रति आकुलता आदि की अभिव्यंजना की गई है। यह पंजाबी लोक-गीतों की पद्धति पर लिखी गई रचना है।

गुरु अर्जुनदेव की सबसे प्रमुख और महत्त्वपूर्ण रचना है 'सुखमणि' की गोड़ी राग में लिखी गई है। यह सूत्रात्मक शैली में रचित एक लम्बी रचना है जिसमें ब्रह्म, जीव, माया, सृष्टि आदि के स्वरूप का चिंतन करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि वास्तविक सुख क्या है और मनुष्य उस सुख की उपलब्धि कैसे कर सकता है। गुरुजी के अनुसार प्रभु सभी सांसारिक सुखों का प्रदाता है और ये सब सुख भी नाम स्मरण, गुरुसेवा, साधु-संगति, अहंकार के त्याग एवं विनम्रता ग्रहण करने से प्राप्त होते हैं। ब्रह्म की अनन्तता, अद्वैतता एवं सर्वशक्तिमत्ता, शरीर और संसार के मिथ्यात्व आदि पर प्रकाश डालते हुए गुरुजी ने अहंकार के त्याग, सत्संगति, नामस्मरण, हुकम (गुरु-कृपा) एवं गुरु के महत्त्व तथा माया जनित कष्टों एवं सांसारिक दु:खों से त्राण पाकर शाश्वत सुख एवं अनंत  आनंद कैसे प्राप्त किया जा सकता है, इसका प्रतिपादन किया है। गुरुजी ने सरल भक्ति मार्ग का निरूपण करते हुए सभी लौकिक पारलौकिक सुखों की प्राप्ति हरि-स्मरण से मानी है। प्रभु-नाम सुखों की मणि है और सुखों का भंडार 'नाम' से ही उपलब्ध होता है। और प्रभु-स्मरण से सब दु:खों,  कष्टों, संताप एवं आवागमन का नाश होता है।1 वस्तुत: 'सुखमणि' में आध्यात्मिक और व्यावहारिक सुखों की प्राप्ति के साधनों का विस्तार से निरूपण किया गया है। यह रचना परम तत्त्व से तादात्म्य हेतु आध्यात्मिक प्रवृत्ति की पे्ररणा देती है और व्यावहारिक जीवन में सुख और शांति के लिए समाधान प्रस्तुत करती है तथा सुखी जीवन के प्रति आस्था जगाती है। आत्मा को आध्यात्मिक चिंतन और प्रभु-भक्ति से शांति, आशा और सुख प्राप्त होता है और व्यावहारिक जीवन में विनम्रता और दीनता मनुष्य को सुखी बनाते हैं। गुरुजी ने मानव जीवन को सुखी बनाने के लिए 'सचुकरनी' और 'सचुकथनी' पर भी विशेष बल दिया है।

वस्तुत:, गुरु अर्जुनदेव के सभी पदों एवं रचनाओं का मुख्य और केंद्रीय विषय आध्यात्मिक जीवन से संबंधित है। उनके पदों में पुन:-पुन: और भिन्न-भिन्न रूपों में अथवा भिन्न-भिन्न दृष्टांतों एवं रूपकों के माध्यम से ब्रह्म, जीव, जगत-सृष्टि, माया आदि के स्वरूप; सांसारिक वैभव, ऐश्वर्य, शक्ति एवं सम्बन्धों की नश्वरता; भोग-विलास की व्यर्थता; काम, क्रोध, लोभ, मोह, तृष्णा एवं अहंकार आदि के त्याग, सत्य, संयम, संतोष, क्षमा, दया, विनय, परोपकार आदि को धारण करने; साधु-संगति एवं सत्संगति के महत्त्व; गुरु, गुरुकृपा एवं गुरु-उपदेश के महत्त्व; नामस्मरण; दुष्कर्मों के त्याग एवं शुभ-कर्म करने; आवागमन एवं अन्य दुखों से मुक्ति के उपाय; सुख-दुख-अपनापन, स्तुति-निंदा से ऊपर उठकर हरि-गुणगाथा करते हुए शांति-सुख की उपलब्धि के उपायों आदि का विशदता से प्रतिपादन किया गया है।

गुरु अर्जुनदेव ने ब्रह्म के स्वरूप का निरूपण विविध पदों में विस्तारपूर्वक किया है। उनके अनुसार परब्रह्म परमेश्वर, अगम, अगोचर, अलख, अकाल मूरति, अजूनि, निरभय निरवैर, सत्य, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, शक्तिमान, सर्जक, सर्वोच्च, सर्व समर्थ है। सब स्थानों में सभी दिशाओं में, यहां-वहां, घर-घर में सर्वत्र वही व्याप्त है। उसी का एक सर्वत्र प्रसार है। उसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। उसी की ज्योति का सब ज्योतियों में विस्तार है। पशु-पक्षी, जल-थल, वायु, अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा सबका वही निर्माता है। वही निर्गुण भी है और सगुण भी। समस्त जग-रचना प्रभु ने आप ही की है। आप ही वह सारे जगत में व्याप्त है, उसके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है। जगत के आदि में भी आप ही था, अब भी आप ही है। जगत के अन्त में भी आप ही रहेगा। आप ही अपने सुख स्वरूप में टिका होता है, अपनी शोभा सुनने वाला भी वह आप ही है, यथा-

दुख भंजन निधान अमोले।
निरभउ निरवैर अथाल अतोले।
अकाल मूरति, अजूनी सभौ...।
सदा संगी हरि रंग गोपाला।

(माझ म. 5/4/9/16)

पार ब्रह्म अपरंपर देवा।
अगम अगोचर अलख अभेवा।
दीन दइआल मधुसूदन निसतारे।
गुरमुखि संगी क्रिसन मुहारे।
बड समरथ सदा दातारा।।
(माझ म. 5/4/6/13)
निरंकार आकार आपि निरगुन सरगुन एक।
एकहिं एक बखानबो नानक एक अनेक।।

(गउड़ी बावन अखरी महला-4 श्लाकु-पउड़ी-2)

आपहि कीआ कराइआ आपहि करनै जोगु।
नानक एको रवि रहिआ दूसर होआ न होगु।
आदि मधि अंति निरंकारं।
आपहि सुनं आपहि सुख आसन।
आपहि सुनत आप ही जासन
आपन आपु आपहि उपाइओ।
आपहि बाप आप ही माइओ।

(गउडी बावन अखरी म.-5  श्लोकु पउड़ी-2

वही निराकार, अगोचर, अगम,अकाल, अलख-निरंजन भी है और वही गोविंद, हरि, केशव, दामोदर, कृष्ण, गोपाल, मुरारि, श्याम, मुकुन्द, मधुसूदन, लक्ष्मीपति और राम भी हैं। यथा-

जपि मना तू राम नराइनु गोविंदा हरि माधो।
धिआइ मना मुरारि मुकंदे करीए करल दुख फाधो।
सिमरि मना दामोदर दुख हरू मैं भंडान हरि राईया।
करुणामै समरथु सुआमी घट-घट प्राण अधारी।
गुण गाऊ मना अचुत अविनासी सभते ऊच दईआला।
बिसंभरू देवनकउ एकै सरब करै प्रतिपाला।

(गउडी 3 म. 5/सलोकू/3)

यह ठाकुर, बादशाह, सच्चा पातशाह और करुणामय, दीनदयाल, अनाथ-नाथ निराश्रितों का आश्रय, दु:ख भंजक सुखदाता है। वह दीन-दुखियों के दु:ख रूपी तिमिर को नष्ट करके उन्हें ज्ञान का सुखदायक मार्ग दिखाता है। वही सर्व-ज्ञाता, सर्वप्रदाता, पावन एवम् परम सुन्दर है। वही जीव का माता, पिता, बन्धु, मित्र एवम् रक्षक है। यथा-

तूं मेरा पिता तूं है मेरा माता, तूं मेरा बन्धपु तूं मेरा भ्राता।
तूं मेरा राखा समनी थाई, जीअ जंत अभितुधु उपाए।

(माझ म. 5/4/39/46)

उसके स्मरण-मात्र से जीव के सारे पापों का नाश हो जाता है और वह आवागमन से छूटकर शांति एवम् आनंद को प्राप्त करता है। सही सर्वकत्र्ता है, वही मारने और जिताने वाला है, सब कुछ उसी के हाथ में है। उसी के 'हुकम' से 'सृष्टि' का प्रसार होता है। सब कुछ उसी के शासन में चल रहा है और उसका शासन अटल है।

प्रभु का न कोई रूप है, न चिह्न-चक्र और न कोई रंग। वह माया के तीनों गुणों से बेदाग है-

रूप न रेख न रंगु किछु त्रिहु गुण ते प्रभ भिंन।

(सुखमनी म. 5/सलोकु/8/15/1)

उसका रूप और ठिकाना सत्यस्वरूप है-

रूपु सति जा का सति असथानु।

(वही, म. 5 सलाकु 8/15/6)

उस प्रभु का अस्तित्व आदिकाल से ही है। वह युगों के शुरू से ही मौजूद है, इस वक्त भी मौजूद है और भविष्य में भी सदा स्थिर रहेगा-

आदि सचु जंगादि सचु।
है भि सचु नानक होसी भि सचु।।

(सुखमनी म. 5/सलोकु8/16/1)

आप ही आप होता है। जो कुछ उसने बनाया है, अपनी मौज में बनाया है। वह सब जीवों के साथ भी है और सबसे अलग भी। वह स्वयं ही एक है और स्वयं ही अनेक रूपधारण कर रहा है। वह सब कुछ देखता, समझता और पहचानता है। वह न कभी मरता है, न जन्मता है। वह प्रभु सदा ही अपने आप में टिका रहता है-

करन करावन करनै हारु।
आपे आपि आपि प्रभु सोहू।

जो किछु कीनो सु अपनै रंगि।
सभ ते दूरि सभहू कै संगि।
आपहि एक आपहि अनेक।

मरै न बिनसै आवै न जाइ।
नानक सद ही रहिआ समाइ।।

(सुखमनी म. 5/8/116)

वह प्रभु अत्यंत सुंदर, अनन्त, अगम्य और अप्रतिम है। उसका रूप बेहद प्यारा है। उसकी वाणी बहुत मधुर है जो कि प्रत्येक शरीर में कानों द्वारा सुनी और जिह्वा द्वारा कही जा रही है-
भला भला भला तेरा रूप।
अति सुन्दर अपार अनूप।
निरमल निरमल निरमल तेरी बाणी।
                  घटि घटि सुनी स्रवन बख्याणी।

                                                                                          (सुखमनी म. 5/8/12)

सब जीवों के भीतर एक अकालपुरुष ही व्याप्त है, उससे बाहर कोई चीज नहीं। सब बड़ा गंभीर, गहरा, बुद्धिमान, सर्वोपरि, मालिक, जीवपालक, दया का भण्डार और क्षमाशील है-

तिस ते परै नाही किछु कोइ।
सरब निरंतरि एको सोइ।
आपे बीना आपे दाना।
गहिर गहीरु सुजाना।
पारब्रह्म परमेसुर गोबिंद।
क्रिपा निधान दइआल बखसंद। 

(सुखमनी म. 5, 8/15/1)

उस प्रभु के घर में सदा-सर्वदा आनंद और खुशियां व्याप्त रहती हैं, सारे जागतिक पदार्थ वहां विद्यमान हैं। राजाओं में प्रभु आप ही राजा हैं, जोगियों में जोगी हैं, तपस्वियों में बड़े तपस्वी हैं और गृहस्थियों में भी आप ही गृहस्थी हैं-

अनद रूप मंगल सद जा कै।
सरब थोक सुनीअहि धरि ताकै।
राज महि राजु जोग महि जोगी।
तप महि तपीसरु ग्रिहसत महि भोगी।

(वही, म. 5, 8/15/2)

सारे जीव-जन्तु उस अकाल पुरुष के आसरे हैं। जगत् के समस्त भाग, तीनों भुवन तथा चौदहों लोक उसी अकाल पुरुष के टिकाए हुए हैं। वेद, पुराण, स्मृतियां, सारे आकाश और पाताल उसी प्रभु के आधार पर हैं-
नाम के धारे सगले जंत।
नाम के धारे खण्ड ब्रह्मांड।
नाम के धारे सिभ्रिति बेद पुरान।
नाम के धारे सुनन गिआन धिआन।
नाम के धारे आगास पाताल।
नाम के धारे सगल आकार।
नाम के धारे पुरीआ सभ भवन।
नाम कै संगि उधरे सुनि स्रवन।

(वही, म. 5, 8/15/5)

वह प्रभु जीवों के मन के स्वप्न पूर्ण करने तथा शरणागतों की सहायता करने में समर्थ है। उसका पलक झपकने के बराबर का समय जगत के पालन तथा नाश के लिए काफी है। उसका रहस्य कोई जीव नहीं जानता; इतना ही नहीं, समस्त देवगण भी उन्हें खोज-खोज कर थक गए हैं-

मनसा पूरन सरना जोग।
जो करि पाइआ सोई होगु।
हरन भरन जा का नेत्र फोरु।
तिस का मंत्रु न जानै होरु।

जाकी लीला की मिति नाहि।
सगल देव हारे अवगाहि।

(वही, म. 5, 8/15/2-3)

जिस मनुष्य को गुरु-कृपा से अपने-आप की सूझ हो जाती है, वह जान लो कि उसकी तृष्णा मिट जाती है। जो व्यक्ति सत्संग में बैठकर अकालपुरुष का गुणगान करता है, वह समस्त रोगों से बच जाता है। जो प्राणी प्रतिदिन प्रभु का कीर्तन उच्चरित करता है, वह गृहस्थी होते हुए भी निर्लिप्त होता है। जिस मनुष्य की आस उस एक अकालपुरुष पर है, उसकी यमों वाली फांसी कट जाती है। जिस मनुष्य के मन में प्रभु-मिलन की उत्कंठा है, उस मनुष्य को कोई दु:ख स्पर्श नहीं करता-

गुर प्रसादि आपन आपु सुझै।
तिस की जानहु त्रिसना बुझै।
साध संगि हरि हरि जसु कहत।
सरब रोग ते ओहु हरि जनु रहत।
अनदिनु कीरतनु केवल बख्यानु।
ग्रिहसत महि सोई निरबानु।
एक ऊपरि जिसु जन की आसा।
तिस की कटीऐ जम की फासा।
पारब्रह्म की जिसु मनि भूख।
नानक तिसहि न लागहि दूख।

(वही, म. 5, 8/13/4)

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