जन-चेतना एवं राजनैतिक क्रांति के सूत्रधार ताऊ

जन नायक ताऊ देवी लाल पूरे राष्ट्र में विशेष तौर से उत्तरी भारत में जन चेतना व राजनैतिक क्रांति जागृत करने के एकमात्र सूत्रधार बनकर उभरे। उनका सफरनामा अल्पायु से ही ताउम्र संघर्ष व चुनौती पूर्ण मार्ग से होकर गुजरा है। मात्र 16 वर्ष की आयु में ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आह्वान पर अपनी शिक्षा बीच में छोडकर भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े और संघर्ष करते हुए अपने एकमात्र सार्वजनिक हित के लक्ष्य को साधने के लिए उन्होने अपनी परंपरागत हजारों एकड़ कृषि भूमि, भूमिहीन कामगारों व खेतीहर मजदूरों के सुपुर्द कर दी। समाज को राजनैतिक तौर से जागरूक करने व राजनैतिक चेतना को सुदृढ़ करने के लिए सामाजिक तकनीकीकरण और वर्गीकरण के दो अद्भुत सामाजिक संसाधनों पर अमल करते हुए जनता के सामुहिक सहयोग से न्याय युद्ध, यातायात अवरूद्ध करने, पैदल यात्रा आदि के शांतिपूर्ण संघर्ष से प्रशासन व सरकार को जन कल्याण के प्रति जागरूक किया। चौधरी देवी लाल का लंबा राजनैतिक दौर सदैव जन कल्याण व राजनैतिक जनक्रांति के संघर्ष से परिपूर्ण रहा है और सत्ता में रहते हुए व सत्ता से बाहर भी जनता जनार्धन के सहयोग अपने इन अनुकरणीय उद्देश्यों के प्रति संघर्ष करते रहे। 


संयुक्त पंजाब के मुख्यमंत्री सरदार प्रताप सिंह कैरों से हरियाणा राज्य के अस्तित्व को लेकर मतभेद होने पर उनके कट्टर विरोधी बन गए व कांग्रेस से 39 साल के राजनैतिक संघर्ष के बाद पार्टी को अलविदा कह दिया और जनता जनार्धन के बीच सामाजिक जन चेतना व राजनैतिक क्रांति लाने के लिए निकल पड़े। हरियाणा वासियों के हक के लिए जबरदस्त पैरवी की और स्वर्गीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को उनकी अलग हिंदी भाषी क्षेत्र की मांग को मानना पड़ा, जिस कारण 1 नवंबर 1966 को हरियाणा प्रांत को अलग से राज्य का दर्जा दिया गया और वर्ष 1974 में रोड़ी (सिरसा) से विधायक चुने गए। वर्ष 1975 में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा प्रजातांत्रिक मूल्यों व जनता के राजनैनिक अधिकारों की अनदेखी कर तानाशाही रवैये के विरूद्ध राष्ट्र के कोने-कोने में जाकर सरकार की जन विरोधी नीतियों का भंडाफोड़ करके जनता में राजनैतिक जनक्रांति लाने के लिए पुरजोर संघर्ष किया और 19 मास तक गुडगांव जेल में रहे, लेकिन अपना संघर्ष जारी रखा। उनका मानना था कि राजनैतिक अधिकार संघर्ष से मिलते हैं, मांगने से नहीं। अपने राजनैतिक दौर में हमेशा गुरू गोविंद सिंह की प्रेरणादायक वाणी 'कोऊ किसी को राज ना देह है, जो लेह निज बल से लेह है' पर अमल करते हुए राजनैतिक चेतना व कल्याणकारी सोच की राजनीति के लिए संघर्ष करते रहे।


जन साधारण के सहयोग व संघर्ष से राजनैतिक क्रांति लाकर वर्ष 1977 में जनता पार्टी के हरियाणा में एकमात्र नेता उभरकर आगे आए और शेरे हरियाणा के नाम से प्रसिद्ध हुए व मुख्यमंत्री बने। विधानसभा की 90 सीटों में से 85 सीटों पर विजय प्राप्त की जिनमें से 17 आरक्षित सीटों पर विभिन्न वर्गों के उम्मीदवारों को विजय दिलवाई और लोकसभा की सभी 10 सीटों पर जीत हासिल की। अपने शासनकाल में जन साधारण के लिए कल्याणकारी नीतियों व राजनैतिक जागरूकता को विशेष तौर से जारी रखा और जनहित के लिए अनेकों कल्याणकारी योजनाएं - गरीब, मजदूर, किसान, दुकानदार के दस हजार रुपए तक के कर्जे माफ, किसानों को ओलावृष्टि का मुआवजा, व्यापारी भाइयों के लिए 59 वस्तुओं पर सेल्सटैक्स कम, इंस्पैक्टरी राज से छुटकारा, प्रदेश के वृद्धों को 100 रुपये सम्मान पैंशन, गांव-गांव में हरिजन चौपाल, बेरोजगार युवकों को बेरोजगारी भत्ता, किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य, सडक के किनारे खड़े वृक्षों में किसानों को आधा हिस्सा, ट्रैक्टर का रजिस्ट्रेशन टैक्स, साइकल टोकन टैक्स, रेडियो पर लाइसैंस पूर्ण तौर पर समाप्त, गांव-गांव में रिंग बांध बनाकर बाढ पर नियंत्रण, 24 घंटे बिजली, पानी का प्रबंध, किसानों को 6.5 एकड़ भूमि का मालिया माफ, इंटरव्यु पर जाने वाले बेरोजगार युवकों को मुफ्त बस यात्रा, हरिजन के घर पर पहला बच्चा पैदा होने पर 300 रूपये, दूसरा बच्चा होने पर 500 रूपये की ग्रांट राशि, हरिजन विधवा की लडकी की शादी के लिए सरकार द्वारा 5100 रूपये कन्यादान के रूप में सहायता, खानाबदोश व घुमंतू लोगों के बच्चों द्वारा स्कूल जाने पर प्रतिदिन एक रूपया की व्यवस्था, गांवों तथा शहरों में शुद्ध पीने के पानी की व्यवस्था, मार्केटिंग बोर्ड द्वारा गांव-गांव में सड़कों का निर्माण, सरकारी रोजगार प्राप्त करने हेतू उम्मीदवारों की अधिकतम आयु सीमा 30 वर्ष से बढ़ाकर 35 वर्ष करना, काम के बदले अनाज की योजना, गांव व शहर के विकास के लिए अद्भुत मैचिंग ग्रांट योजना, पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए नंबरदारी का पद सुरक्षित करना, नई कृषि नीति की घोषणा, खुले जनता दरबार, बड़े-बड़े पांच सितारा होटलों में चौपाल की व्यवस्था आदि शुरू की जिनका आज समस्त राष्ट्र में अनुकरण किया जा रहा है, जो कि उनका ऐतिहासिक कल्याणकारी व जनक्रांति की सोच का परिणाम है।

  

अपनी दूरदर्शी जन क्रांतिकारी राजनैतिक छवि की बदौलत वर्ष 1986 व 1987 में हरियाणा विधानसभा के निर्विरोध नेता रहे। वर्ष 1982 में कांग्रेंस की भ्रष्ट व खरीद-फरोख्त की राजनीति की वजह से मुख्यमंत्री का पद छीन लिया गया लेकिन 1987 के चुनाव में भ्रष्ट राजनीतिज्ञों को करारा जवाब देकर विधानसभा की 85 सीटें जीतकर एक एतिहासिक मिशाल कायम करते हुए कांग्रेस का सफाया किया और मुख्यमंत्री बने। ग्रामीण क्षेत्र के विकास के मुख्य स्त्रोत हरियाणा खादी बोर्ड की प्रदेश में प्रथम बार स्थापना की क्योंकि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की तरह उनकी विशेष सोच थी कि ग्राम विकास के बना राष्ट्र का विकास नहीं हो सकता। किसान, कामगार, काश्तकार व छोटे व्यवसायी वर्ग के कल्याण व उत्थान के लिए कर्जा माफी, आसान किस्तों पर ऋण उपलब्ध करवाने, खेती के लिए सस्ते दामों पर खाद, बीज उपलब्ध करवाने, बिजली-पानी की प्रयाप्त व्यवस्था आदि करवाकर राष्ट में एक नई जन कल्याणी व्यवस्था शुरू की। उनकी एक विशेष कल्याणकारी सोच थी कि राष्ट्र के विकास व कल्याणकारी जनक्रांतिकारी राजनैतिक व्यवस्था के लिए किसान का बेटा प्रधानमंत्री व दलित का बेटा राष्ट्रपति होना आवश्यक है। वर्ष 1987 में राजस्थाान के सीकर व हरियाणा में रोहतक से एक साथ सांसद चुने गए और देश के उप प्रधानमंत्री रहे। वर्ष 1989 में उन्होने सैंट्रल मोटर व्हीकल अधिनियम 1989 के नियम 7 के तहत प्रावधान करवाकर किसान के टै्रक्टर को ट्रांसपोर्ट व्हीकल की श्रेणी में रखवाकर हर प्रकार के कर से मुक्त करवाया लेकिन वर्तमान केंद्रीय सरकार इस अधिनियम में संशोधन करके किसान के कृषि ट्रैक्टर को ट्रांसपोर्ट व्हीकल यानि कि कमर्शियल व्हीकल की श्रेणी में लाना चाहती है जबकि चौधरी देवी लाल का मानना था कि किसान का ट्रैक्टर कृषि कार्य के लिए उनका गड्डा है। राष्ट्र में नई राजनैतिक जनक्रांति लाने व जन साधारण के कल्याण हेतू कल्याणकारी व निष्पक्ष सत्ता स्थापित करने के लिए प्रधानमंत्री पद की पेशकश को ठुकराकर स्वर्गीय श्री वी.पी. सिंह व बाद में स्वर्गीय श्री चंद्र शेखर को प्रधानमंत्री बनवाकर निस्वार्थ व त्याग की ऐतिहासिक मिशाल पेश की और किंगमेकर कहलाए। उनका ये मानना था कि सत्ता सुख भोगने के लिए नहीं अपितु जन कल्याण को समर्पित होनी चाहिए।


जनकल्याण व निष्पक्ष राजनैतिक व्यवस्था के अपने उद्देश्यों की पूर्ति हेतू सदैव समाज के सभी वर्गों व जन साधारण को साथ लेकर स्वच्छ राजनीति की। उन्होंने ग्रामीण पृष्ठभूमि के हर वर्ग के व्यक्ति को राजनीति में प्रवेश करवाकर सभी वर्गों को एक मंच पर लाकर क्रांतिकारी राजनीति का श्री गणेश किया और उपेक्षित हो रहे किसान, कामगार, काश्तकार वर्ग को अपने हितों की पैरवी करने के लिए राजनीति में उभरकर आने को प्रेरित किया। हरियाणा में गुहला से श्री दिल्लू राम बाजीगर, नारायणगढ़ से लाल सिंह गुर्जर, दलित वर्ग से बड़ौदा से डॉ. कृपा राम पुनिया, जुंडला से रिसाल सिंह, कलायत से श्री बनारसी दास, बवानी खेड़ा से श्री जगन्नाथ, रतिया से श्री आत्मा राम गिल, गुजरात से चिमन भाई पटेल, उत्तरप्रदेश से श्री मुलायम सिंह यादव, रामनरेश यादव, बिहार से श्री कर्पूरी ठाकुर, लालु प्रसाद यादव, आंध्रप्रदेश से श्री एन. टी. रामाराव, कर्नाटक से श्री देवगौड़ा, पंजाब से सरदार प्रकाश सिंह बादल आदि को राजनीति में सक्रिय सहयोग दिया और समस्त राष्ट्र में क्रांतिकारी राजनति की नींव रखी। उन्होंने कभी भी जातिवाद, छल कपट व भेदभाव की राजनीति नहीं की। हरियाणा के इतिहास में पहली बार सैनी वर्ग के श्री मनोहर लाल को महेंद्रगढ़ से सांसद बनवाया। बाद में 1980 में कुरुक्षेत्र से उनको सांसद विजयी करवाया। श्री गुरदयाल सिंह सैनी, श्रीमती कलाशो देवी जब तक चौधरी देवी लाल के साथ रहे, कुरूक्षेत्र लोकसभा क्षेत्र से सैनी बिरादरी का प्रतिनिधित्व कायम रहा। हालांकि इस क्षेत्र के लगभग 1 लाख मतदाताओं में 4 लाख से अधिक वोटर जाट समाज से थे। इसी प्रकार करनाल लोकसभा क्षेत्र से कश्यप जाति से संबंधित उमेद सिंह को पहली बार सांसद प्रत्याशी बनाया। बाद में इंद्री हल्के से डा0 अशोक कश्यप को विधायक बनवाया। उनकी स्पष्टवादिता व निष्पक्षता का उनके विरोधी भी लोहा मानते थे। वे कहते थे कि मुझे जब भी नीचा दिखाने की कोशिश की गई, मैं अपनी असली ताकत जो भारत के ग्रामीण लोगों में निहित है, के सहयोग से अधिक ताकतवर होकर उभरा हूं। वर्ष 1979 में जब उनको मुख्यमंत्री पद पाने में अपदस्थ किया गया तो उन्होंने कहा कि एक सरमायेदार ने किसान की झोपड़ी फूंकी थी, मैनें उनके महल को आग लगा दी और श्री मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री के पद से हटाने की अह्म भूमिका निभाई। 


उनकी यह अह्म क्रांतिकारी सोच थी - 'लोकराज लोकलाज से चलता है'। मैं एक ग्रामीण हूं और चालाकी की राजनीति एक ग्रामीण मर्यादा के खिलाफ है तथा जन कल्याणकारी व्यवस्था के हित में नहीं है। इसलिए क्रांतिकारी व जन कल्याणकारी शासन की व्यवस्था के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में खुले दरबार लगाकर प्रशासन व पुलिस तंत्र की जनता के प्रति जबाबदेही जिम्मेवारी सुनिश्चित करके स्वच्छ प्रशासनिक व्यवस्था की शुरूआत की।

 

अपनी जन कल्याणकारी व जनक्रांतिकारी सोच की बदौलत उन्होंने अपने शासनकाल में हरियाणा में कृषि व किसानी पर आधारित सभी जातियों के शैक्षणिक व आर्थिक विकास के लिए जस्टिस गुरनाम सिंह आयोग की स्थापना की और जाट, जट-सिक्ख, रोड़, त्यागी, बिश्रोई, मेव, सैनी, गुर्जर व राजपूत 9 जातियों को ओ बी सी में आरक्षण दिलवाया जोकि उनकी निष्पक्षता व सर्वजन कल्याणकारी छवि को स्पष्ट करता है।


लेखक के निजी अनुभव हैं कि वर्ष 1978 में लेखक को हरियाणा सरकार में सहायक पुलिस महानिदेशक के तौर पर चौधरी देवी लाल के मुख्यमंत्री काल में उनके निजी सम्पर्क में रहने का अवसर मिला। इसी वर्ष पूर्व लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद हुए लोकसभा उप चुनाव में करनाल लोकसभा क्षेत्र से जनता पार्टी के उम्मीदवार श्री महेंद्र सिंह लाठर व कांग्रेस के श्री चिरंजीलाल शर्मा के चुनाव अभियान के समय पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी एक मुकदमें में जेल हिरासत से रिहा हुई और चुनाव अभियान में कूद पड़ी। उनका पहला दौरा करनाल लोकसभा क्षेत्र का था और उनकी पहली जनसभा पानीपत में हुई। पूरा राष्ट्र विशेषकर हरियाणा, पंजाब उनके प्रति प्रथम राजनैतिक रुझान देखने व जानने का इच्छुक था। ताऊ देवीलाल ने बतौर मुख्यमंत्री लेखक को निर्देश दिया कि पानीपत में होने वाली श्रीमती इंदिरा गांधी की जनसभा की पूरी जानकारी मेरे को व लाला जगतनारायण को पानीपत विश्राम गृह में तुरंत दी जाये। मैने जन सभा की रिकार्डिंग करवाई व रैस्ट हाउस पहुंचा, जहां पर दोनों उपस्थित थे और कहा 'थे सुनाओं लोगों का क्या रूझान था। मैने टेप रिकार्ड आन किया और आन होते ही तालियों की गडगड़ाहट व जन समूह का नारा- 'इंदिरा गांधी आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैंÓ सुनते ही कहा लाला जी इंदिरा खत्म नहीं हुई अभी भी लीडर है, जिससे स्पष्ट है कि वे राय देने में भी पूर्णत: स्पष्ट व निर्भिक थे। इसी प्रकार मुझे उनके साथ का एक और अवसर याद है जो कि उनकी जन कल्याणकारी, क्रांतिकारी भाावना के साथ-साथ जनहित में तुरंत निष्पक्ष व बेझिझक कार्यवाही को दर्शाता है। वर्ष 1978 के दौरान ही जब उत्तरी हरियाणा में गन्ने की बंपर पैदावार हुई थी और केंद्र सरकार की किसान विरोधी नीतियों के कारण गन्ना 4 रूपये क्विंटल तक कौडियों के भाव बिक रहा था और गन्ने की धीमी अदायगी व उगाही के कारण किसानों में घोर निराशा थी। यमुनानगर से किसानों का एक शिष्टमंडल मुख्यमंत्री चौधरी देवी लाल को मिला व अपनी समस्या बताई कि गन्ना खेतों में खराब हो रहा है और शुगर मिल बंद हो चुका है। उन्होंने तुरंत सरस्वती गन्ना मिल यमुनानगर के स्वामी श्री डीडी पुरी को फोन कर कहा कि जब तक किसान के खेत में गन्ने की एक भी टोटी (टुकड़ा) शेष है, आप शुगर मिल बंद नहीं करोगे। यह उनकी किसान, काश्तकार के हित के प्रति चिंता को व्यक्त करता है जबकि इससे पूर्व की चौधरी भजन लाल सरकार द्वारा गन्ना उगाही व मात्र कुछ रेट बढ़ाने के मुद्दे पर किसानों पर लाठीचार्ज व अपराधिक मुकदमें दर्ज किए गए थे। जब चौधरी देवी लाल को यह आभास हुआ कि किसान, कामगार बढ़ी कृषि लागत व प्रकृति की मार से घाटे में जा रहा है तो तुरंत किसान, कामगार व छोटे दुकानदारों के कर्ज माफ करने की एक ऐतिहासिक पहल की, जो कि एक क्रांतिकारी मुख्यमंत्री ही कर सकता है और बाद में इस योजना का किसान हित में समस्त राष्ट्र में अनुशरण किया गया।

 

ताऊ देवी लाल एक ऐसी अद्वितीय प्रतिभा के स्वामी थे जो आज तक किसी नेता के पास नहीं हैं। वे हरेक के दु:ख को अपनाकर उसकी भरपूर मद्द करते थे और वे हर समस्या की जड़ तक जा कर उसका निवारण करते थे। बहुत से दिग्गज़ नेताओं ने उनकी तरह बनने के प्रयास किये परन्तु वे विफल रहे क्योंकि वो मसीहा देवीलाल जी की तरह उनसे मन से नहीं जुड़ पाएं।

लेखक — महेन्द्र सिंह जी मलिक
नि:संदेह यह बहुत गर्व एवं सम्मान की बात है कि चौधरी देवी लाल एक ऐसी अकाल्पनिक एवं अद्भुत प्रतिभा के स्वामी थे जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन जनता जनार्धन के मूल अधिकारों के हित की लड़ाई के लिए समर्पित कर दिया तथा सदैव ही उनके पथ को उजागर किया और मार्गदर्शन के लिए संघर्षशील रहते थे। ऐसा करते-करते 6 अप्रैल 2001 को संघर्षशील धरतीपुत्र चौधरी देवी लाल की आत्मा पवित्र धरती में विलीन हो गई और आज आम आदमी लगातार टकटकी लगाए अपनी गंभीर समस्याओं के समाधान के लिए किसी और धरतीपुत्र के पुन: उद्गम होने की मृगतृष्णा में है।



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