मरीज का इलाज तो डॉक्टर ही करते हैं, मगर उसकी अच्छे से देखभाल तो नर्स ही करती है। नर्स यानी 'सेवा-शुश्रूषा'। किसी की 'सेवा' उसके मांगे बिना की जाती है जैसे हम मां-बाप और गुरुजनों की करते हैं लेकिन जब किसी रोगी या निर्बल व्यक्ति के मांगने पर, चाहने पर या इशारे पर की जाए उसे 'शुश्रूषा' कहा जाता है। वो नर्स ही है जो रोगी के उन्माद का इलाज करती है और उसकी दवाओं को क्रियान्वित करती है, मरीज की सेवा करती है, बच्चों को दूध पिलाती है और दाई का काम करती है।
नर्स मरीज के सिर्फ बाहरी जख्मों पर ही नहीं बल्कि उसके अंदरूनी जख्मों पर भी मरहम लगाती है। ऐसी मदद की जरूरत मरीज को तब और ज़्यादा महसूस होती है जब उसे बताया जाता है कि उसे कोई जानलेवा बीमारी है या अब वह कुछ ही दिनों का मेहमान है। रोगी के लिए एक नर्स को मां बनना पड़ता है। एक कुशल नर्स बनने के लिए सिर्फ त्याग की भावना होना ही काफी नहीं है, अच्छी नर्स बनने के लिए अच्छी ट्रेनिंग और तजुर्बा होना भी बेहद जरूरी है। एक नर्स का स्वभाव दोस्ताना होता है, हमदर्द होने के साथ-साथ उसमें बहुत कुछ सहन करने की भी हिम्मत, संयम और सहनशीलता होती है।
नर्सिंग एक ऐसा पेशा है जो हमेशा कायम ही रहेगा, जब तक इंसान रहेगा तब तक ऐसे लोगों की जरूरत पड़ती रहेगी जो प्रेमभाव और सहानुभूति के साथ पीडि़तों की सेवा कर सकें। कोविड-19 का खौफ नर्सिंग सिस्टर्स के प्रति हमारी सामाजिक जवाबदेही जागृत करने के लिए पर्याप्त है। एक नर्स में मरीज के असहनीय दर्द और तकलीफों को समझने की काबिलीयत होनी चाहिए और दिल से उसकी मदद भी करनी चाहिए।
आज हमारे देश में करीब 30 लाख नर्सें हैं, इनमें 18 लाख तो अकेले केरल से ही हैं और केरल की करीब 57 फीसदी नर्सें तो विदेश चली जाती हैं। इसके बाद सबसे ज्यादा नर्स तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक में हैं। देश को आज 20 लाख और नर्सों की आवश्यकता है। इस हिसाब से भारत में प्रत्येक नर्स प्रतिदिन 50 से 100 मरीजों की देखभाल कर रही है। डब्ल्यूएचओ की बात मानें तो प्रति हजार आबादी पर तीन नर्स होनी चाहिए। एक नर्स अपने प्रतिदिन के कार्यकाल के दौरान करीब दस किलोमीटर तक पैदल चलती है जबकि आम इंसान पूरे दिन में मात्र पांच किलोमीटर ही चलता है।
दुनिया भर में हर वर्ष 12 मई को फ्लोरेन्स नाइटिंगेल के जन्मदिन को अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस के रूप में मनाया जाता है लेकिन साल 2020 का 'नर्स दिवस' दुनिया की सभी नर्सों को प्रोत्साहन के रूप में याद रहेगा। जिसका दिल सेवा से भरा हो, जिसके हाथों में जादू हो, जो दूसरों का दर्द समझ सके और जो सबसे रिश्ता जोड़ ले, इसलिए परमात्मा ने नर्स (वह औरत जो बीमार की रखवाली और खबरदारी करे) बनाई। नर्स दिवस को मनाने का प्रस्ताव पहली बार अमेरिका के स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याण विभाग के एक अधिकारी डोरोथी सदरलैंड ने दिया था। बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति डीडी आइजनहावर ने इसे मनाने की स्वीकार्यता प्रदान की। अंतरराष्ट्रीय नर्स परिषद ने इसे पहली बार वर्ष 1965 में मनाया और नर्सिंग पेशेवर की शुरूआत करने वाली फ्लोरेंस नाइटिंगल के जन्म दिवस 12 मई को अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस के रूप में मनाने का फैसला साल 1974 में लिया गया था।
रोगी की देखभाल करने के लिए नर्स को अच्छी तरह से प्रशिक्षित, शिक्षित और अनुभवी होना चाहिए। जब चिकित्सक दूसरे रोगियों को देखने में व्यस्त होते हैं तब रोगियों की चौबीस घंटे देखभाल करने के लिए नर्सिस की उपलब्धता होती है। नर्सिस से रोगियों के मनोबल को बढ़ाने वाली और उनकी बीमारी को नियंत्रित करने में मित्रवत, सहायक और स्नेहशील होने की उम्मीद की जाती है। इसलिए हर वर्ष 12 मई को राष्ट्रीय फ्लोरेंस नाइटिंगेल पुरस्कार दिया जाता है। हमारे देश में इसकी शुरुआत 1973 में की गई थी और अब तक कुल 250 के करीब नर्सों को इस पुरस्कार से सुशोभित किया गया है। पुरस्कार हर साल देश के राष्ट्रपति द्वारा दिया जाता है। फ्लोरेंस नाइटिंगल पुरस्कार में 50 हजार रुपए नकद, एक प्रशस्ति पत्र और मेडल दिया जाता है।
फ्लोरेंस को ही दुनिया की पहली नर्स माना जाता है और उन्हीं के जन्मदिन को अंतरराष्ट्रीय 'नर्सेस डे' यानी नर्स दिवस के रूप में मनाया जाता है। फ्लोरेंस नाइटिंगेल की ऐसी कई खास बातें हैं जो उन्हें महान बनाती हैं। 12 मई 1820 को इटली के फ्लोरेंस में जन्मीं फ्लोरेंस नाइटिंगेल को एक नर्स से ज्यादा घायलों की जान बचाने वाली 'देवदूतÓ के रूप में जाना जाता है। उन्होंने जंग में घायल हजारों लोगों की जान बचाई थी। नाइटिंगेल का बचपन से ही ये शौक था कि वो लोगों की सेवा करे लेकिन वर्ष 1844 में उन्होंने पूरी तरह से ये तय कर लिया कि उन्हें नर्सिंग के पेशे में जाकर लोगों की सेवा करनी है। जब फ्लोरेंस इसकी ट्रेनिंग के लिए इंग्लैंड के सैलिसबरी शहर जाना चाहती थी तो उनके माता-पिता ने इसके लिए इनकार कर दिया था क्योंकि वो चाहते थे कि उनकी बेटी शादी करके अपना घर बसा ले लेकिन फ्लोरेंस ने इस पेशे के प्रति अपने उत्साह को यूं ही बरकरार रखा। साल बाद ही जब घरवालों को ये अहसास होने लगा कि नाइटिंगेल शादी नहीं करेंगी तो हारकर उन्होंने नर्सिंग की ट्रेनिंग लेने के लिए उन्हें जर्मनी जाने की इजाजत दे दी।
फ्लोरेंस की सबसे विशिष्ट योग्यता क्रीमिया के युद्ध में रही जब 1854 में उन्हें 38 नर्सों के साथ घायलों की सेवा के लिए तुर्की भेजा गया। इसी दौरान उनके कोमलभाव और सद्गुणों के लिए उन्हें 'द लेडी विद द लैंप' की उपाधि से सुशोभित किया गया था क्योंकि वो रात के समय भी हाथ में मशाल लिए घायलों की सेवा करने निकल पड़ती थीं। फ्लोरेंस को ब्रिटेन की सरकार ने 'ऑर्डर ऑफ मेरिट' के सम्मान से नवाजा गया था। ये विशिष्ट सम्मान पाने वाली वो पहली महिला थीं। फ्लोरेंस लोगों की सेवा में इस कदर जुटी रही कि उन्हें अपनी उम्र का भी पता नहीं चला। हालांकि लंबी उम्र और सेवा के लंबे करियर के बाद वर्ष 1910 में 90 साल की उम्र में वो परमपिता परमात्मा को प्यारी हो चली।
-(सेवा सिंह रापडिय़ा)
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