आज दलबदल की बुराई एक भयावह और चिंताजनक रूप ले चुकी है। देश के किसी भी सूबे और किसी भी दल की राजनीति इस बीमारी से अछूती नहीं है
वास्तव में दलबदल का खेल जवाहर के बाद से शुरू हुआ जब कांग्रेस को अन्य दलों का सामना करना पड़ा और इसके साथ ही ‘आया राम, गया राम’ की रिवायत शुरू हो गई थी
सत्ता दल स्याही बदल, क्रास वोटिंग, वोट रद्द करने आदि के औच्छे व बेतुके तरीको से अपना कार्य सिद्ध कर रहे हैं
पिछले कुछ समय से राजनीति में रातोंरात पार्टियां बदली जा रही हैं, रिसोर्ट पॉलिटिक्स हो रही है। विधायक खरीदने-बेचने पर कार्टून भी बन रहे हैं सरकारें तोड़ी जा रही हैं और बनाई भी जा रही हैं। विधायकों को भेड़-बकरियों की तरह बंद कमरों में कड़ी निगरानी में रखा जाता है। यहां तक कि सर्वोच्च नागरिक राष्ट्रपति का चुनाव भी सरपंच के चुनाव की तरह प्रचार व प्रलोभन के माध्यम से होते हैं जबकि संवैधानिक तौर पर राष्ट्रपति व गवर्नर का पद गैर राजनैतिक है। हरियाणा में एक जमाने में ‘आया राम गया राम’ का दौर चला था और लगता है कि दल-बदल कानून होने के बावजूद ये देश में दूसरा ‘आया राम गया राम’ का दौर चल रहा है लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि उस दौर में राजनीति में गिरवाट पर देश की संसद में भी चर्चा हुई थी और आज के दौर में राजनीति की गिरावट पर किसी में बात करने की हिम्मत ही नहीं बची है। देश का लोकतंत्र खतरे में है और देश की जनता मोबाइल के नशे में मदहोश हुई पड़ी है। एक तरह से राजनीति के सर्कस में नेता लोग मदारी बनकर बैठे हैं और उन्हें वोट देने वाले बस मौन होकर सर्कस देख रहे हैं।
वर्तमान में तो तमिलनाडु से गोवा और महाराष्ट्र तक राजनीतिक उठापटक हुई। ऐसा खेल स्वस्थ और नैतिकता की राजनीति के लिए यह सब ठीक भी नहीं है। अत: लिहाजा व्यक्तिगत या सामूहिक दल-बदल की खबरें अब किसी को भी चौंकाती या हैरान नहीं करती हैं। छोटे राज्यों की विधानसभाओं में तो, जहां दो राजनीतिक दलों के बीच बहुमत के लिए बहुत कम सदस्यों का अंतर होता है, अक्सर ही विधायकों को पाला बदलकर राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति पैदा करते देखा जाता है।
हाल के दिनों में महाराष्ट्र में विधायकों के दल-बदल के चलते शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के सांझी सरकार गिर गई और आज शिवसेना के बागी एकनाथ शिंदे सीएम और भाजपा के देवेंद्र फडनवीस उप मुख्यमंत्री हैं। इससे पहले हरियाणा, झारखंड, छत्तीसगढ़, गोवा में भी ऐसे हालात पैदा होते रहे हैं और सीमावर्ती पूर्वोत्तर के तमाम छोटे-छोटे सूबे तो अक्सर ऐसी स्थिति से दो-चार होते ही रहते हैं। अब तो कह रहे हैं ऑपरेशन लोटस चल रहा है कि विपक्ष को खत्म ही कर दिया जाए देश में। ना रहेगा बांस और ना बजेगी बांसुरी।
एक जमाने में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी यानी राजाजी और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व संस्करण भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी अपने समय में देश के शीर्ष राजनेताओं में शुमार किए जाते थे। वे लंबे समय तक कांग्रेस से जुड़े रहे। राजाजी को तो कांग्रेस ने ही देश का प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल बनाया तथा बाद में मद्रास प्रांत का मुख्यमंत्री भी। डॉ. मुखर्जी भी आजादी के बाद जवाहर लाल नेहरू की सरकार में मंत्री थे, लेकिन दोनों ही नेताओं को वैचारिक मतभेदों के चलते बाद में कांग्रेस से अलग होना पड़ा। राजाजी ने कांग्रेस से अलग होकर स्वतंत्र पार्टी का गठन किया और डॉ. मुखर्जी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की मदद से भारतीय जनसंघ की स्थापना कर ली। कांग्रेस से ही जुड़े एक अन्य विद्वान राजनेता मीनू मसानी भी कांग्रेस से नाता तोडक़र राजाजी की स्वतंत्र पार्टी में शामिल हुए थे।
इसके पूर्व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर रहे समाजवादी धड़े के आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण, डॉ. राममनोहर लोहिया आदि नेताओं ने तो बड़ी संख्या में अपने समर्थकों के साथ कांग्रेस छोडक़र सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया था। उसी दौर में महात्मा गांधी के अनन्यतम अनुयायी आचार्य जेबी कृपलानी ने भी कांग्रेस से नाता तोडक़र किसान मजदूर प्रजा पार्टी बनाई थी, जो बाद में सोशलिस्ट पार्टी में विलीन हो गई थी। ये सारे दल-बदल किसी न किसी विचार और आदर्श पर आधारित थे, न कि महज सत्ता प्राप्ति के लक्ष्य से प्रेरित। चौधरी देवी लाल, चौधरी चरण सिंह, दीनबंधु चौधरी छोटू राम ने भी कांग्रेस छोडक़र जनहित व राष्ट्र कल्याण के लिये अलग-अलग दल बदलकर स्वच्छ व पारदर्शी राजनीति सता की शुरूआत की। चौधरी देवी लाल ने तो उपप्रधान मंत्री होते हुये जनप्रतिनिधि द्वारा अपनी जिम्मेवारियों के प्रति खरा न उतरने की स्थिति में उसकी सदस्यता खत्म करके वापस बुलाने हेतु विधान सभा में बिल लाने का प्रस्ताव दिया था जिस पर दलगत नीति के राजनेताओं द्वारा अपने हितो के लिये कोई कार्यवाही नहीं होने दी गई।
दरअसल सन् 1967 के आम चुनाव तक दल-बदल को राजनीतिक प्रक्रिया का एक सामान्य अंग ही माना जाता था। यह एक रोग या अनिवार्य बुराई है, यह धारणा उस वर्ष विधानसभा चुनावों के बाद जो कुछ हुआ, उसके कारण विकसित हुई। आज यह बुराई एक भयावह और चिंताजनक रूप ले चुकी है। देश के किसी भी सूबे और किसी भी दल की राजनीति इस बीमारी से अछूती नहीं है। 1967 में विभिन्न राज्यों में व्यापक पैमाने पर घटी दल बदलने और पार्टी तोडऩे की घटनाओं ने निर्वाचित सदनों की पवित्रता नष्ट कर उन्हें जनप्रतिनिधियों के नीलामी घर में तब्दील कर दिया था। इसके अलावा चुनावों के समय टिकट वितरण के दौरान और चुनाव के बाद स्पष्ट जनादेश के अभाव में जोड़-तोड़ से सरकार बनाने के लिए कवायद भी खूब होती हैं। इस खेल को समाप्त करने के लिए पहली बार उस समय गंभीरता पूर्वक सोचा गया, जब आठवें आम चुनाव में कांग्रेस ने राजीव गांधी की अगुवाई में तीन चौथाई से अधिक बहुमत हासिल कर सरकार बनाई। राजीव गांधी की सरकार ने दल-बदल पर रोक लगाने के लिए 52वें संविधान संशोधन के जरिए दल-बदल विरोधी कानून संसद में पारित कराया। कई लोगों ने इसे उनके 450 से अधिक सांसदों के भारी-भरकम बहुमत की सुरक्षा के लिए उठाया गया कदम माना।
इस कानून में सबसे बड़ी खामी या विसंगति यह थी कि इसके जरिए व्यक्तिगत दल-बदल पर तो रोक लगाई गई किन्तु थोक में ऐसा करने को कानूनी मान्यता दे दी गई। शुरू में इस कानून में प्रावधान था कि यदि किसी पार्टी के एक तिहाई विधायक या सांसद दल बदलते हैं तो उनका यह कदम दल-बदल नहीं बल्कि दल-विभाजन माना जाएगा। आगे चलकर यह संख्या पचास प्रतिशत और फिर दो तिहाई कर दी गई लेकिन मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की। उस समय जनता पार्टी के सांसद और वरिष्ठ समाजवादी नेता प्रो. मधु दंडवते ने भी इसका समर्थन कर इसे ऐतिहासिक कदम करार दिया था। लेकिन समाजवादी चिंतक और संसदविद् मधु लिमये एकमात्र ऐसे नेता थे, जिन्होंने अखबारों में अपने लेखों के माध्यम से इसके प्रावधानों पर सवाल उठाते साफ कहा था कि इस कानून से दलबदल नहीं रुकेगा। उनका कहना था कि यह कानून खुदरा दल-बदल को तो रोकता है, मगर थोक में हुए दल-बदल को वैधता प्रदान करता है। दल-बदल विरोधी कानून बनने के कुछ वर्षों के भीतर ही यह साफ हो गया कि यह कानून अपने मकसद को पाने में नाकाम है और आज तो यह कानून न सिर्फ नाकारा बन गया है, बल्कि इसने हमारे संसदीय लोकतंत्र में कई तरह की विपत्तियों को जन्म दे दिया है।
हरियाणा में गत कांग्रेस सरकार द्वारा हरियाणा जनशक्ति से दलबदल करने वाले विधायकों के मामले को पूरा कार्यकाल, 5 साल तक लटकाये रखा गया और बाद में सरकार का कार्यकाल पूरा होने के समय उनकी सदस्यता रद्द कर दी गई। इस खेल में अन्य राज्य भी अध्यक्ष की कठपुतली छवि का बेखुबी फायदा उठाते रहे है। मणिपुर में 2017 में विधानसभा चुनावों के तुरन्त बाद कांग्रेस के 7 विधायक भाजपा में शामिल हो गये। स्पीकर ने सुर्पीम कोर्ट के 4 सप्ताह के भीतर निपटारा करने के निर्देष के बावजूद उन्हें आयोग्य ठहराने की याचिका को 2 साल लटकाये रखा। अत: सुप्रीम कोर्ट द्वारा दखल देते हुये मंत्री श्री श्याम कुमार सिंह को मत्रिमंडल से हटाने के लिये विशेष अधिकारो का प्रयोग करना पड़ा था। कर्नाटक में 2010 में भाजपा के विद्रोही विधायको के एक गुट ने तत्कालीन मुख्यमंत्री को पद से हटाने के लिये राज्यपाल से भेंट करके विशेष सवैधानिक प्रक्रिया लागू करने की अपील की परन्तु स्पीकर ने उन्हें स्वेच्छा से पार्टी छोडऩे का आधार बनाकर आयोगय करार दे दिया हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के इस फैसले को पलट दिया।
इसी आधार पर 2017 में अन्नाद्रमुक के 18 विधायको के गुट को तत्कालीन मुख्यमंत्री पलासीनामा के खिलाफ राज्यपाल से सम्पर्क करने पर स्पीकर ने उन्हें आयोग्य करार दिया था। इस प्रकार से नेताओं द्वारा दलबदल के खेल बेखौफ जारी है और इस कानून की खामियों के कारण राष्ट्र में दलबदल कानून का बिल्कुल पालन नहीं हो रहा है जिसके लिये इस कानून को प्रभावशाली व संवैधानिक तौर से लागू करने की आवश्यकता है। वास्तव में दलबदल का खेल जवाहर के बाद से शुरू हुआ जब कांग्रेस को अन्य दलों का सामना करना पड़ा और इसके साथ ही ‘आया राम, गया राम’ की रिवायत शुरू हुई। इस क्षेत्र में बीजेपी ने तो काफी महारत हासिल कर ली है, जिसने राजनैतिक सत्ता की प्राप्ति व वर्चस्व हेतु 2016 में उतराखंड, अरूणाचल प्रदेश, वर्ष 2017 में गोवा, वर्ष 2019 में कर्नाटक, 2020 में मध्यप्रदेश में राजनैतिक उठापठक के हथकंडे अपनाने के बाद 2022 में महाराष्ट्र में भी दलबदल शुरू किया हुआ है, हालांकि 2017 में दिल्ली, 2020 में पश्चिमी बंगाल व राजस्थान में बीजेपी सरकार दलबदल के प्रयास में विफल रही है। जिसकी ‘हार्स ट्रेंडिंग का राजा’ की छवि बन गई है।
विधानसभा अथवा लोकसभा अध्यक्ष द्वारा अपनी पार्टी के हित एवं नेतृत्व के दिशा निर्देशानुसार कार्रवाई की जाती है, जिससे दल-बदल विरोधी कानून का महत्व ही समाप्त हो जाता है। ऐसे मामलों में कभी-कभी राज्यपालों की उनकी अपनी राजनीतिक निष्ठाओं से प्रेरित भूमिका भी आग में घी का काम करती है। इसलिए इस कानून में इस तरह के बदलाव की दरकार है जिसके अनुसार सदन के अध्यक्ष को दल-बदल विरोधी कानून के उल्लंघन संबंधी याचिकाओं पर तीन मास के अंदर फैसला लेना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। विधानसभा अध्यक्ष के फैसले के विरोध में यदि किसी सदस्य द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जाती है तो उसका फैसला भी तत्काल उसी प्रकार दिया जाना चाहिए जिस प्रकार किसी मुकदमे में जमानत की याचिकाओं पर फैसला दिया जाता है
ब्रिटेन की संसद में कोई भी निर्वाचित सदस्य सदन में पार्टी के रुख से अपनी स्पष्ट असहमति व्यक्त कर सकता है, वह पार्टी के आधिकारिक रुख के खिलाफ वोट भी दे सकता है लेकिन दो मौकों पर उसे पार्टी व्हिप का पालन अनिवार्य रूप से करना होता है, पहला अविश्वास प्रस्ताव के समय और दूसरा-वत्तीय विधेयक (मनी बिल) के दौरान। इसमें अगर सदस्य अपनी पार्टी के अनुशासन का पालन नहीं करता है तो उसकी सदस्यता खारिज हो जाती है।
ये दो मौके ही हैं, जब शक्ति परीक्षण में हारने पर सरकार गिर जाती है अन्यथा नहीं। आज भी ब्रिटिश संसद में गाहे-बगाहे सदस्य अपनी पार्टी के खिलाफ वोट देते हैं, पार्टी बदल भी लेते हैं, लेकिन उनकी सदस्यता बरकरार रहती है। वहां प्रधानमंत्री, विंस्टन चर्चिल, हैरोल्ड मैकमिलन, मार्गेट थैचर जैसे कई नेता हुए हैं, जिन्होंने सांसद के रूप में अपनी पार्टियों के खिलाफ संसद में कई बार मतदान किया। लेकिन भारतीय व्यवस्था ऐसी है कि यदि कोई सांसद या विधायक ऐसा करे तो उसकी संसद या विधानसभा की सदस्यता तत्काल समाप्त हो जाती है। लेकिन इन कमियों को दूर करने के बारे में देश की राजनीतिक जमातें सोचने को तैयार नहीं हैं। इसीलिए नग्न अवसरवाद और मूल्यहीनता का खुला खेल चल रहा है। सवाल यही है कि हमारी संसद कोई भी कानून सीधा-साधा क्यों नहीं बनाती है? क्यों उसमें इतने जटिल प्रावधान बना दिए जाते हैं जिनका खुलेआम दुरुपयोग किया जाता है, जिससे उस कानून की आत्मा ही मर जाती है। दलबदल व मानसिक तरीकों से सरकारो का गठन व वर्चस्व रोकने हेतु अभी तक कोई भी प्रभावी व तर्कसंगत नीति/कानून नहीं बनाया गया है जिसका कारण सत्ता दल स्याही बदल, क्रास वोटिंग, वोट रद्द करने आदि के औच्छे व बेतुके तरीको से अपना कार्य सिद्ध कर लेते है। अत: आज विश्व की सबसे बड़ी प्रजातंत्र की स्वेच्छा व धर्मनिरपेक्ष छवि को बनाये रखने हेतु प्रभावशील व सवैधानिक कानून द्वारा दलबदल को रोकने की नितांत आवश्यकता है।
लेखक: डॉ. महेंद्र सिंह मलिक, आईपीएस (सेवानिवृत)
कोई टिप्पणी नहीं
एक टिप्पणी भेजें