लम्पी स्किन डिजीज- गाय व भैंस में आने वाली गंभीर बीमारी

 


लम्पी स्किन डिजीज- LSD एक जानकारी

यह एक विषाणु जनित बीमारी है जो कि गाय व भैंस में मच्छर, मक्खी, चींचड़ द्वारा फैलती है तथा अन्य जानवरों व मनुष्यों को प्रभावित नहीं करती है।

इस बीमारी में पशुओं की चमड़ी व शरीर के अन्य भाग पर 2-5 सेन्टीमीटर घेरे की गांठे बनने लगती है। यह बीमारी अधिकांशतः उमस के मौसम में अधिक फैलती है। क्योंकि इस मौसम में मच्छर, मक्खी, चींचड़ व अन्य खून चूसने वाले कीटों की संख्या अधिक हो जाती है। जिनके कारण यह बीमारी अधिक तेजी से फैलती है।

माना जाता है कि मच्छर, मक्खी व खून चूसने वाले अन्य कीटों के अलावा संक्रमित फीड, लार, नाक से बहने वाले पानी, पीने वाले पानी, पशुओं के परस्पर सम्पर्क, संक्रमित सूई इत्यादि से भी यह बीमारी फैलती है।
मुख्य लक्षण:
पशु के संक्रमित होने के बाद 4-14 दिन के मध्य में इस बीमारी के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। शुरुआत में बुखार 41 डिग्री सैल्सियस/105 डिग्री फॉरेनहाईट तक तापमान देखने को मिल सकता है। साथ ही पशु के शरीर पर चेहरा, गर्दन, लेवटी, नर में अण्डकोष पशु के नीचले हिस्से पर गांठें मिलती है बाद में यह गांठें पशु के पूरे शरीर पर फैल जाती हैं। पशु का पोषण प्रभावित हो जाता है। दुग्ध उत्पादन काफी कम हो जाता है पशु सुस्त हो जाता है।
कभी कभार पशु की नासिका द्वारा मुंह के पास व आंख के चारों ओर भी यह गांठें देखने को मिलती है। जिसके कारण अत्यधिक लार गिरना, नाक से श्लेष्मा का स्राव होना व सांस लेने में कठिनाई होती है।
इस बीमारी का फैलाव 5-45 प्रतिशत है व मृत्यु दर 10 प्रतिशत से कम है। कमजोर व पहले से बीमार पशु में मृत्युदर अधिक होती है।
बचाव:
केन्द्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अनूप कुमार ने बताया कि इस संक्रामक बीमारी की अभी तक कोई वैक्सीन अर्थात् टीका उपलब्ध नही है। अतः पशु में संक्रमण के लक्षण दिखाई देने पर पशु को अलग करें। उसका जूठा दाना व पानी दूसरे पशुओं को न देवे स्वस्थ पशुओं को खून चूसने वाले कीडो, मच्छर व मक्खियों को दुर रखने का प्रयास करें। जिसके लिए शाम को नीम की पत्तियों, गुगल, गाय के गोबर के उपलों का धुआं उचित वैन्टीलेशन के साथ करें। पशुओं को पशु मेले व पशु बाजार में नहीं लेकर जाना चाहिए। ऐसा करने से यह बीमारी ऐसे क्षेत्रो में भी फैल जाती है जहां यह बीमारी नहीं है।
केन्द्र के पशु विज्ञान विशेषज्ञ डॉ. मुकेश कुमार ने बताया कि पशुपालन विभाग भारत सरकार द्वारा जारी की गई गाईडलाईन के अनुसार Goat Pox vaccine (Uttarkashi Strain) की वैक्सीन 4 महीने व बडे पशुओं में लगाने से इस बीमारी से बचाव किया जा सकता है परन्तु यह वैक्सीन संक्रमित पशु में नही लगाई जानी चाहिए।
ईलाज:
यह बीमारी विषाणु जनित बीमारी है जिसका सही मायने में कोई ईलाज नही है परन्तु दवाईयों के माध्यम से इसके प्रभाव व फैलाव को कम किया जा सकता है। अतः बचाव ही उपाय है। पशुओं को संतुलित आहार देवें, साफ पानी पिलायें तथा साफ सफाई का विशेष ध्यान रखें। संक्रमित पशुओं को एन्टीबायोटिक, सूजन व बुखार कम करने की दवाई, लीवर टॉनिक, इम्यूनिटी बूस्टर, विटामिन बी व सी के टीके पशु चिकित्सक की सहायता से ही उपयुक्त ईलाज करवायें। गांठ फूटने पर एंटीसेप्टीक क्रीम या लोशन लगाये।
- किसान सेवा सर्वोपरी- कृषि विज्ञान केन्द्र,ग्रा.वि. संगरिया

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