दो समाचार-पत्र ही उन दिनों सत्ता के गलियारों में कड़े प्रतिबंधों के बावजूद निरंतर दनदना रहे थे- इंडियन एक्सपे्रस और पंजाब केसरी पइन दिनों ट्रैक्टरों की मदद से अखबार के मुद्रण का प्रयोग विश्वभर में चर्चा का विषय बना। ये वाकई लोकतंत्र व प्रेस की स्वाधीनता की रक्षा के दिन थे
इन दिनों आपातकाल (1975-1977) को नए सिरे से 47 वर्ष बाद एक बार फिर याद किया जा रहा है। इस पुनर्पाठ का एक अर्थ यह भी होता है कि इसी बहाने भूली-बिसरी बातें, नए-नए संदर्भों में नई ऊर्जा देने लगती है। मीडिया के लिए वे दिन बेहद चुनौतीपूर्ण थे। दो समाचार-पत्र उन दिनों सत्ता के गलियारों में कड़े प्रतिबंधों के बावजूद निरंतर दनदना रहे थे। एक चुनौती इंडियन एक्सपे्रस समूह की ओर से थी, दूसरी पंजाब केसरी की ओर से। इंडियन एक्सपे्रस के रामनाथ गोयनका व पंजाब केसरी के संस्थापक लाला जगत नारायण, चौथे स्तम्भ की इस खुली चुनौती के प्रतीक बन गए थे।
उन्हीं दिनों का एक संस्मरण अश्विनी चोपड़ा ने मुझे सुनाया था, 'जिस दिन अपातकाल की घोषणा हुई, मैं जालंधर में ही था, उसी रात लालाजी (लाला जगत नारायण)को गिरफ्तार कर लिया था। मैं संपादक कक्ष में अपने पूज्य पिता एवं हिंद समाचार व पंजाब केसरी के समूह-संपादक रमेश कुमार के साथ ही बैठा था। तभी पंजाब के एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी (अब अवकाश प्राप्त), जालंधर के उपायुक्त के साथ कार्यालय में आए। दोनों अधिकारियों ने पहले तो रमेश के चरण छुए, फिर मुझ से गले मिले।'
उसके बाद दोनों अधिकारियों ने हाथ जोड़े और कहा, 'हमें दरअसल आज एक दुखद आदेश के पालन के लिए यहां आना पड़ा है। मुख्यमंत्री का आदेश है कि आपके अखबार की बिजली सप्लाई काट दी जाए। वैसे यह काम यहां बिना आए भी मुमकिन था, लेकिन निजी संबंधों और आपके प्रति आदर के वशीभूत हमें स्वयं यहां आना आवश्यक लगा।'
मुझे मालूम है कि आपातकाल के वे दिन हमने कैसे बिताए। लालाजी का आदेश था कि संपादकीय स्तंभ विरोध-स्वरूप या तो खाली छोड़ा जाए या फिर वहां कोई विद्रोही तेवर वाला उर्दू का शेर या श्री रामधारी दिनकर अथवा स्व. माखनलाल चतुर्वेदी की कुछ पंक्तियां छाप दी जाएं।
अदने से सरकारी अधिकारी 'सेंसर' की ड्यूटी पर तैनात किए गए थे। उन लोगों को न तो भाषा का समुचित ज्ञान था, न ही खबरों की बारीकियों का कुछ अता-पता था। बस जहां भी सरकार विरोधी बयान दिखाई देता, उसे काट देते। हम लोगों ने बिजली कट जाने के बावजूद अखबारों का प्रकाशन बंद नहीं किया। ट्रैक्टरों की मदद से अखबार के मुद्रण का हमारा प्रयोग विश्वभर में चर्चा का विषय बना।
हमारे जैसी ही स्थिति जालंधर के अन्य अखबारों की भी थी। उनके संचालक वीरेंद्र, ज्ञानी शादी सिंह, साधू सिंह हमदर्द आदि भी गिर$फ्तार किए गए थे। सभी अखबारों के दफ्तरों में 'सेंसर' लागू था।
मगर उस सख्ती के बावजूद हम किसी न किसी बहाने आपातकाल से जुड़ी कुछ खबरें परोक्ष रूप से छाप लेते थे। अगले दिन जब 'सेंसर' पर तैनात सरकारी कारिंदों को उच्चाधिकारियों द्वारा डांट पड़ती तो वे हाथ बांधकर हमारे सामने खड़े हो जाते, 'हमारी आप से करबद्ध प्रार्थना है कि कृपा हमारे बीबी-बच्चों व हमारी नौकरी का ध्यान रखते हुए ऐसा उल्टा-सीधा किसी भी रूप में न छापें, जिससे हमारी नौकरी चली जाए।'
वे दिन वाकई लोकतंत्र व प्रेस की स्वाधीनता की रक्षा के दिन थे। मुझे इस बात का गर्व है, सिवाय कुछ पिछलग्गुओं के, शेष मीडिया ने देशभर में अद्भुत जज्बा दिखाया। प्रैस की स्थिति उस काल में ज़्यादा अच्छी भी नहीं रही। यह बात कम तकलीफदेह नहीं थी कि कुछेक वरिष्ठ संपादक श्रीमती गांधी को आपातकाल की बधाई देने भी पहुंच गए थे। मगर कुछ ऐसे भी थे जो आपाकाल के विरुद्ध तो थे, मगर खुलकर विरोध का साहस नहीं जुटा पा रहे थे।
28 जून 1975 को सुबह प्रैस क्लब में 100 के लगभग पत्रकार एकत्र हुए थे। वहां पर वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया, जिसमें कहा था, 'यहां पर एकत्र हम सभी पत्रकार, सैंसरशिप लागू करने की निंदा करते हैं और सरकार से अपील करते हैं कि इसे फौरन वापिस लिया जाए। हम मांग करते हैं कि पिछले दो दिनों में गिरफ्तार सभी पत्रकारों को रिहा किया जाए।' यह प्रस्ताव ध्वनियत से तो पारित हो गया, लेकिन वहां मौजूद 100 में से केवल 27 पत्रकारों ने उस पर हस्ताक्षर किए और शेष धीरे-धीरे खिसक गए। हस्ताक्षर करने वालों में प्रभाष जोशी, ए. माणि, एन. मुखर्जी, वी. राघवन, वीरेन्द्र कपूर, एससी राजे, सुभाष किरपेकर, बलवीर पुंज, विजय क्रांति, वेद प्रताप वैदिक, चांद जोशी, एस भटनागर, अषीम चौधरी, आनंदवद्र्धन, इरफान खान आदि शामिल थे।
अनेक विदेशी पत्रकारों जिनमें 'दी टाइम्स' मुख्य प्रतिनिधि पीटर हेजलइस्र्ट भी शामिल थे, को देश से निष्कासित कर दिया गया। यही बर्ताव बीबीसी के मार्क टुली के साथ हुआ। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर पर 'जामा मस्जिद जाकर मुसलमानों को सरकार के खिला$फ भड़काने की कोशिश' का आरोप लगा था। आईबी के अनुसार नैयर ने एक बार शाही इमाम के साथ दावत में भी शिरकत की थी। नैयर को गिरफ्तार कर लिया। बाद में प्रकाशित अपने संस्मरणों में नैयर ने लिखा था(1) -
'जेल की बोझिल जि़न्दगी बहुत यंत्रणा भरी थी। दिन जितने लम्बे होते, रातें उससे भी ज़्यादा लम्बी। एक रात कहीं नज़दीक से बच्चों का शोर सुनकर मेरी नींद खुल गई। मैं यह देखकर सिहर उठा कि एक तालाबंद कमरे में सलाखों के पीछे बहुत-से लड़के ज़ोर-ज़ोर से रो रहे थे। मैंने कुछ दूसरे कैदियों से इसके बारे में जानना चाहा तो समझ में कुछ भी नहीं आया। अगली सुबह वे लड़के न जाने कहां गायब हो गए थे।
मैंने वार्डन से लड़कों के बारे में पूछा। वह मेरे प्रश्न पर हंसरने लगा। उसने कहा कि ये लड़के बिना किसी सुनवाई के बरसों से बंद थे। उन्हें अंदर लाते समय रजिस्टर में कोई भर्ती नहीं की गई थी। उन्हें सड़कों से उठाकर लाया जाता था और तरह-तरह के काम करवाए जाते थे। जब ज़्यादा कैदी होते थे तो इन लड़कों की संख्या भी बढ़ जाती थी। इनमें से बहुत कम को रिहाई नसीब होती थी, क्योंकि किसी-न-किसी जेल में उनकी ज़रूरत पड़ती रहती थी और उनका तबादला होता रहता थ। वार्डन ने मुझे बतया कि इनमें से कुछ लड़के छह-सात वर्ष से बंद थे। यह सब गरीब परिवारों से थे, इसलिए इनकी रिहाई आसानी से नहीं होती थी।
हमारी मदद करने वाले ऐसे ही एक लड़के से मैंने बात की तो उसने बताया कि वह तीन दिन पहले ही जेल में आया था। दिल्ली की डिफेंस कालोनी में उसके मालिक ने उसे रात को 9 बजे 'पान लाने के लिए' भेजा था। लेकिन गश्ती पुलिस ने उसे पकड़ लिया था और जेल में बंद कर दिया था।
'टाइम्स ऑफ इंडिया' ने अपने 'आबिच्युरी' (शोक समाचार/श्रद्धांजली) स्तंभ में एक 'बॉक्स' छापा, जो इस प्रकार था-
"We regret the demise of ‘D’oracy, DEM beloved husband of T.Ruth, loving father of L.I Bertie, brother of Faith, HOPE, Justice, who expired on 26th June."
यह शोक समाचार उन दिनों 'आपातकाल' का एक लतीफा बन गया था।
- पंजाब में अखबारों ने संपादकीय स्तम्भों में पहले कुछ शेअर छापने आरंभ किए। इनमें से अधिकांश शेअर फैज़ अहमद फैज़, इकबाल व दिनकर की लम्बी कविताओं में से लिए जाते थे। कुछ दिन पर ऐसे 'शेअर' छापने जाते थे। कुछ दिन पर ऐसे 'शेअर' छापने या संपादकीय स्तंभ वाला स्थान खाली छोडऩे पर भी पाबंदी लगा दी गई।
-साभार: डॉ. चन्द्र त्रिखा
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