क्या कभी हिंदी के लेखक भी बन पाएंगे करोड़पति?




पिछले दिनों चर्चा चली थी कि क्या भारतीय लेखक कभी लेखन के बूते पर अमीरी अथवा आर्थिक सम्पन्नता प्राप्त कर सकता है? ऐसा नहीं है कि विश्व के आर्थिक रूप से सम्पन्न लेखकों की  फहरिस्त में भारत का जि़क्र तक नहीं है। जि़क्र भी है और भागीदारी भी मगर जहां तक अंग्रेजी के अतिरिक्त अधिकांश भारतीय भाषाओं के लेखकों का संंबंध है, प्राय: लेखकों की आर्थिक सम्पन्नता दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती।

दुनिया भर के अमीरों की सूची तैयार करने वाली पत्रिका ‘फोब्र्स’, लेखकों की समृद्धि की भी सूची तैयार करती है। जब इस सूची में शिखर पर ‘हैरी पॉटर’ सीरीज़ की लेखिका जेके राउलिंग थी। ‘फोब्र्स’ के अनुसार उस साल उसने 95 करोड़ पौंड कमाए थे। उससे पिछलेे बरस भी उसकी एक किताब ‘हैरी पॉटर एंड द कस्र्ड चाइल्ड’ की पहले तीन दिन में ही एक लाख 80 हज़ार प्रतियां बिक गई थीं। बिक्री का यह आंकड़ा सिर्फ ब्रिटेन का ही था।
पिछले तीन बरस से पश्चिमी के सर्वाधिक कमाऊ लेखकों की $फहरिस्त में जेम्स पेटर्सन शिखर पर चले आ रहे थे। मगर इस बार राउलिंग ने उन्हें पीछे धकेल दिया था।

भारतीय लेखकों विशेष रूप में हिन्दी लेखकों के लिए ‘फोब्र्स’ की सूची में स्थान पाना असंभव दिखता है ऐसा नहीं है कि हिन्दी में किताबें बिकती नहीं या लेखक लोकप्रिय नहीं होते। हिन्दी में अब भी ऐसी स्तरीय पुस्तकें हैं जो लाखों की संख्या में बिकी हैं। इनमें ‘गोदान’, ‘उर्वशी’, ‘अंधा युग’,  ‘गुनाहों का देवता’, ‘चित्रलेखा’, ‘कामायनी’, ‘साए में धूप, ‘राग दरबारी’ आदि शामिल हैं। बंगला भाषा में गीतांजली व टैगोर की कुछ अन्य कृतियां लाखों में बिकी। मलयाली में ऐसे अभिनंदित साहित्य की भरमार है। इन कृतियों की तुलना में ‘हैरी पॉटर सीरीज़’ का कोई साहित्यिक स्तर नहीं है। यदि उस दृष्टि से आंकना हो तो देवकीनंदन खत्री की कृतियां ‘चंद्रकांता’ व ‘चंद्रकांता सन्तति’ हैरी पॉटर सरीखी बिकी होंगी। गुरुदत्त, दत्तभारती, गुलशन नंदा, कुशवाहा कांत, सुरेंद्र पाठक, वेद प्रकाश शर्मा आदि की कृतियां भी अपने-अपने समय में लाखों का आंकड़ा पार कर गई थीं। लेकिन साहित्य ने उन्हें पूरी तरह बुहार दिया था।

जहां तक दिनकर जी की कृतियों की बात है, यह भी एक तथ्य है कि उन्हें अपने कुछ प्रकाशकों की कारोबारी प्रवृत्ति से तंग आकर स्वयं अपने प्रयासों से एक प्रकाशन की स्थापना करानी पड़ी थी। यही स्थिति मुंशी पे्रमचंद के प्रकाशनों को लेकर थी। प्रसाद, पे्रमचंद, दिनकर या दुष्यंत को लाखों में पारिश्रमिक मिला हो, ऐसा सम्भव नहीं दिखता।

इधर, अंग्रेजी के भारतीय लेखकों को अवश्य अब अच्छा पारिश्रमिक मिलने लगा है। विक्रम सेठ को उनकी कृतियों के लिए पारिश्रमिक करोड़ों में मिला है। रामचंद्र गुहा को महात्मा गांधी पर एक पुस्तक के लिए एक करोड़ रुपए की अग्रिम राशि मिली है। वेद मेहता को भी 50 लाख मिले थे। अरुन्धति राय को भी राशि लाखों में ही मिलती है।

इधर, अमीश त्रिपाठी, चेतन जगत, अमिताव घोष, देवदत्त पटनायक आदि की लेखन-कमाई भी लाखों का आंकड़ा कब की पार कर चुकी।

लेकिन हिंदी का लेखक अब भी इस मामले में पीछे है। बिक्री का आंकड़ा भले ही लाखों को पार कर जाता है, मगर उसे हज़ारों रुपए भी नहीं मिल पाते। दिनकर जी की ‘उर्वशी’, ‘रश्मिरथी’, ‘कुरुक्षेत्र’ और ‘संस्कृति’ के चार अध्याय’ जैसी कृतियां लाखों की संख्या में उनके जीवनकाल में ही बिकीं थीं। लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति के बारे में खबरें अच्छी नहीं थीं। ‘बच्चन’ भी अपने समय में खूब बिके। मगर उन्हें अपनी ज़्यादा कमाई या तो सरकारी नौकरी से हुई या फिर कवि सम्मेलनों से।

यह तथ्य भी कम दुखद नहीं है कि हिन्दी के स्थापित लेखकों को भी अब तक समुचित पारिश्रमिक नहीं मिल पाता। ऐसा नहीं है कि हिन्दी में ‘बेस्ट सेलर’ नहीं लिखे गए। लेकिन या तो मार्केटिंग के अभाव में कोई रिकार्ड नहीं बन पाया या फिर प्रकाशक बेईमानी कर गए। मेरे एक मित्र हरबंस सिंह प्राय: कहते हैं, कमोबेश हर प्रकाशक, ‘रहमान’ (गुरुदत्त की $िफल्म ‘प्यासा’ का प्रकाशक) ही निकलता है।

बिक्री की दृष्टि से गीता पे्रस गोरखपुर के प्रकाशन अभी भी सबसे आगे हैं लेकिन स्थिति यह है कि उस संस्थान में हर चौथे दिन हड़ताल हो जाती है। कई बार तालाबंदी की नौबत भी आई है। ऐसा नहीं है कि इस संस्थान ने सिर्फ धार्मिक किताबें ही छापी हों। साठ के दशक में एक पुस्तक छपी थी, ‘रामराज्य और माक्र्सवाद’। वह पुस्तक लाखों की संख्या में बिकी थी। लेखक थे स्वामी करपात्री जी। उन्हें उन दिनों सम्मान रूप में 5100 रुपए की राशि व अंगवस्त्र मिले थे। उन्हें पारिश्रमिक के रूप में कोई निश्चित राशि नहीं मिल पाई।

इधर, $फैज़ अहमद $फैज़, हबीब जालिब, इकबाल, $िफराक सरीखे प्रख्यात उपमहाद्वीपीय शायरों को क्या मिला, इसे जानेंगे तो शर्मिंदगी होगी। हबीब जालिब की क्रांतिकारी शायरी भारत व पाकिस्तान दोनों देशों में बार-बार छपी, बिकी, लेकिन हबीब के पल्ले कुछ नहीं पड़ा। मंटो इस उपमहाद्वीप के सर्वाधिक लोकप्रिय लेखक थे। लेकिन उनकी बेटियों को भी पारिश्रमिक के नाम पर कुछ हज़ार ही थमाए गए थे। हिंदी के प्रकाशक, उनकी व $फैज़ की बेटियों से सर्वाधिकार ले आए थे, मगर अदायगी इतनी कम कि हम शर्मिंदा होंगे।

शुक्र है टैगोर इस शोषण से बच गए। उनकी कृतियों की सारी आय अब शांति निकेतन को मिलती है। लेकिन ‘रहमान-संस्कृति’ में इस बारे में भी कितना सच बोला जाता होगा, मालूम नहीं।

यदि प्रकाशकीय ईमानदानी स्थापित हो जाए तो शायद निकट भविष्य में कुछ चौंकाने वाली बातें इधर के लेखन जगत में भी आ जाएं।

अब हिंदी व उर्दू के भारतीय कवि अवश्य महंगे हुए हैं। लेकिन कवि सम्मेलनों की संख्या बेहद घट गई है। महंगे कवियों में भी नीरज, वसीम बरेलवी, कुंवर बेचैन, सुरेंद्र शर्मा आदि गिने-चुने नाम ही तो हैं।   -डॉ. चन्द्र त्रिखा

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