"हरियाणा को इस बात का विशिष्ट गर्व है कि इस महान कवि का जन्म इसी प्रदेश के फरीदाबाद शहर के सेक्टर-8 में हुआ था जो कि उस समय ‘सीही ग्राम’ के नाम से एक गांव था "
अपने समय के महान संत कवि ‘सूरदास’ को हिन्दी साहित्य का ‘सूर्य’ कहा जाता है। एक प्रचलित दोहा है-
‘सूर ‘सूर’ तुलसी ससी
उडुगन केशवदास/
अन्य कवि खद्योत सम
इत उत करत परकास/’
अर्थात् सूर, हिन्दी साहित्य के सूर्य हैं, तुलसीदास चंद्रमा हैं, केशवदास नक्षत्र हैं और शेष कवि जुगनू के समान हैं जो इधर-उधर प्रकाश फैलाते रहते हैं। हरियाणा को इस बात का विशिष्ट गर्व है कि वात्सल्य रस, करुण रस, श्रृंगाररस और अद्वैतवाद एवं वैष्णव सम्प्रदाय के इस महान कवि का जन्म इसी प्रदेश के फरीदाबाद शहर के सेक्टर-8 में हुआ था जो कि उस समय ‘सीही ग्राम’ के नाम से एक गांव था।
अब उसी जन्मस्थली पर एक विशाल ‘सूरदास मंदिर’ स्थित है। अब भी कभी उधर से गुज़रें तो आपको कुछ श्रद्धालु मग्न भाव से सूरदास के पदों पर गायन करते मिल जाएंगे। इसी स्थान से सटा हुआ एक ‘सूरदास-स्मृति पार्क’ है जो उतना ही व्यापक है जितना कि इस महाकवि का काव्यांचल। हरियाणा सरकार के एक वरिष्ठ आईएएस के प्रयासों से अब मेट्रो स्टेशन का नाम भी सूरदास के नाम पर ही होगा। हरियाणा साहित्य अकादमी के प्रयासों से ही वर्ष 2001 से ‘सूरदास-सम्मान’ की पुरस्कार परम्परा आरम्भ हुई।
स्वीकृत मान्यता यही है कि यह महाकवि जन्मांध था। अनेक विद्वान सूरदास का संबंध बिल्वमंगल की कथा से जोड़ते हैं और कुछ का कहना है कि वात्सल्य रस व करुणा रस, श्रृंगार रस का जो अद्भुत निरूपण इस कवि ने किया वह कोई जन्मांध कर ही नहीं सकता। लेकिन अब यह स्वीकार कर लिया गया है कि वह जन्मांध थे और विलक्षण प्रतिभा से सम्पन्न थे। चर्चित ग्रंथ ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ में यद्यपि उनके जन्मांध होने या न होने की कोई चर्चा नहीं है लेकिन गोस्वामी हरिराम ने उन्हें न केवल जन्मांध माना है, बल्कि यह भी कहा है कि उनके तो नेत्रों का आकार ही नहीं था, केवल भौहें थी। सूरदास के एक अन्य समकालीन श्रीनाथ भट्ट ने तो स्पष्ट कर दिया था, ‘जन्मांधो, सूरदाउसोभूत’ एक अन्य कवि प्राणनाथ ने भी इस बात की पुष्टि की थी-
‘बाहर नैन विहीन से
भीतर नैन बिसात,
जिन्हें न जग कहु देखिबो
लखि हरि रूप निहाल’
इस महान कवि का जन्म सम्वत् 1535 की वैशाख शुक्ला पंचमी के दिन सीही ग्राम के ही एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में हुआ। जन्मांध थे, वात्सल्य-पे्रम से भी वंचित थे, इसलिए मात्र छह वर्ष की आयु में ही विरक्ति जगी और वह गांव को छोडक़र एक तालाब के किनारे एक पीपल के वृक्ष के नीचे कुटिया बनाकर रहने लगे। वह 18 वर्ष की आयु तक वहीं रहे और उसके पश्चात एक दिन वैराग्य जगा और अपना इकतारा, जोगिया वस्त्र, लाठी व दो-चार बर्तन आदि सब कुछ समेटकर वह मथुरा और आगरा के मध्य स्थित चौघाट पर रहने लगे।
वहीं उनकी भेंट स्वामी वल्लभाचार्य से हुई और उन्हीं से अद्भुत अन्तर्दृष्टि मिली। उन्हीं के साथ सूरदास गोकुल चले आए। वहीं पुष्टि सम्प्रदाय में विधिवत दीक्षा ली और गुरु के ही आदेश से वह श्रीनाथ मंदिर में प्रमुख के रूप में रहने लगे। इसी मध्य उनकी भेंट तत्कालीन मुगल सम्राट अकबर से भी हुई। सम्राट ने एक बार अपने संगीत नवरत्न तानसेन से सूरदास का चर्चित भजन, ‘मन रे तू कर माधव सों प्रीति’ सुना था। तब से उसके मन में सूरदास के मुख से वही भजन सुनने की उत्कट इच्छा थी। प्राप्त साक्ष्यों के अनुसार अकबर सम्वत 1623 में मथुरा आए थे, तभी वह तानसेन को साथ लेकर ‘सूरदास’ से मिलने गए। सम्राट के विनम्र अनुरोध पर उन्होंने कुछ भजन सुनाए। कुछ दरबारियों ने सूर से सम्राट की प्रशंसा में एकाध पद गाने का आग्रह किया, मगर सूरदास निरंतर कृष्ण रस में ही डूबे रहे। उन्होंने एक ही पद में सारे आग्रहों का उत्तर दे दिया-
नाहिंन रहयो मन में ठौर/
नंद-नंदन अछत कैसे आनिए
डर और?
स्यामगात सरोज-आनन
ललित अति मृदुहास/
सूर ऐसे रूप कारन मरत लोचन प्यास/
सम्राट अकबर ने जाते-जाते प्रश्न किया, ‘जब आपके लोचन ही नहीं हैं तो उन्हें रूप की प्यास कैसे हो सकती है? प्रश्न के उत्तर में सूरदास ने कुछ पंक्तियां कहीं थी जिनका मन्तव्य था-
‘सत्ता के मद में भक्ति की शक्ति पहचानी नहीं जा सकती।’
सूरदास व गोस्वामी तुलसीदास की भेंट सम्वत् 1613 में चित्रकूट में हुई थी। तुलसी उन दिनों अपने छोटे भाई नंददास से मिलने पारसोली आए हुए थे। वहां उन्होंने सूरदास के बारे में बहुत कुछ सुना तो उत्सुकता जगी कि ऐसे महान संत से मिलना चाहिए। सूरदास की सारी पदावली गेय पद शैली में ही है। यह गीतिशैली वही ंहै जिसे जयदेव विद्यापति और कबीर ने अपनाया था।
आश्चर्य इस बात का होता है कि जन्मांध होते हुए सूरदास लाखों की संख्या में पदों की रचना कैसे कर पाए? विभिन्न स्रोतों से प्राप्त सामग्री के अनुसार सूर से जुड़ी 25 कृतियों के नाम आते हैं इनमें सूरसागर, सूर सरावली, साहित्य लहरी, सूर शतक, सूर पचीसी, भ्रमरगीत, सूर-रामायण, विनय पदावली, गोवर्धन लीला आदि शामिल हैं। जन्म की ही तरह सूरदास की मृत्यु-तिथि भी विवादित है। निष्कर्ष रूप में स्वीकार्य तथ्य यही है कि उनका निधन सम्वत् 1640 में हुआ और उस समय उनकी उम्र लगभग 105 वर्ष थी।
मानव जीवन के विभिन्न अनुभूतिपूर्ण रंगों का प्रयोग जिस अनूठे एवं प्रभावशाली ढंग से सूरदास जी ने किया है वह विरला ही कोई कर सकता है । सूरदास जी के समस्त पद गेय हैं एवं साथ ही साथ संगीतात्मक भी। ये जो उनकी संगीत शास्त्र के प्रति बोध की पुष्टि करते हैं । आज भी सूरदास के पद हमारे भजनों व शास्त्रीय गायकी में विशेष रूप से प्रचलित हैं जो श्रोताओं को भावविभोर कर देते हैं।
सूरदास का संपूर्ण जीवन भगवान श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित था। दूसरे शब्दों में यदि हम उन्हें पूर्णतया कृष्णमय कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। सूरदास द्वारा रचित काव्य ‘सूरसागर’ उनकी हिंदी साहित्य जगत के लिए एक महान देन है । इसके अतिरिक्त सूर-सारावली, साहित्य लहरी, दृष्टिकूट, सेवाफल, नल-दमयंती आदि भी उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ हैं।
निस्संदेह कविवर सूरदास काव्य जगत के शिरोमणि कवि थे जिनकी काव्य प्रतिभा का आलोक आज भी प्रकाशमान है। आज भी उनकी रचनाएँ जनमानस को मंत्रमुग्ध करती हैं तथा हजारों लाखों को ईश्वर के प्रति भक्ति भाव से जोड़ती हैं । इस प्रकार सूरदास हिंदी साहित्य के ऐसे अनमोल रत्न हैं जिनकी महत्ता को हिंदी साहित्य के किसी भी कालखंड में घटाया नहीं जा सकता।
डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल के अनुसार सूरदास जी ने इसी प्रकार के अगाध भक्तिजल का एक सागर प्रस्तुत किया। सोलहवीं शताब्दी में जो वेगवती भावधारा देश के प्रत्येक भाग में बह निकलती थी, राम और कृष्ण दोनों ही उसके प्रतीक बने।
एक व्यक्ति अपने ही केंद्र में तपकर कितना तजस्वी बन सकता है, अपने मन की कल्याणी भावनाओं को कितना सरस बना सकता है और अपने तीव्र अनुभव से अखंड प्रवाह को किस प्रकार सबके लिए उंड़ेल सकता है, इसका अत्यंत उत्कृष्ट उदाहरण सूरसागर में मिलता है। भाषा और भाव, दोनों के जैसे भंडार खुल पड़े हैं। कृष्ण के रूप में हमारे लिए वात्सल्य, श्रृंगार और भक्ति के मनोभाव साकार हो उठे हैं। अपने ही जीवन का प्रतिबिम्ब हम उनमें पाते हैं। कृष्ण की बाल-लीलाओं के वर्णन को पढक़र हम अपने परिवार के बाल-जीवन के और भी निकट आ जाते हैं। जीवन को ऊंचा उठाना, सरस और सुसंस्कृत बनाना ही कृष्ण-चरित का प्रयोजन है। जो वस्तु हमारे अपने जीवन से दूर है वह हमारे लिए निष्प्रयोजन है। कृष्ण की वंशी व मधुर स्वर प्रत्येक व्यक्ति और गृहस्थ के जीवन में मिल जाता है और उसे मिठास प्रदान करता है।
सूर के काव्य के दो मर्मस्थल हैं, जिनके वर्णन में वह रस-स्रोत के अत्यधिक निकट पहुंच गए हैं- एक तो कृष्ण की बाललीला और दूसरे उद्धव-गोपी संवाद। इन दोनों के वर्णन में जो सफलता सूर को मिली वह अन्य किसी कवि को प्राप्त नहीं हुई। ‘मैया, मैं गाय न चराऊंगा, सारे ग्वाले मुझसे ही घिरवाते हैं, मेरे पांव दुखने लगते हैं, जो मेरी बात न माने तो अपनी सौंह दिलाकर बलराम दाऊ से पूछ देखो’, इस प्रकार के भाव मानव हृदय की उस सरलता के द्योतक हैं जो बाल रूप में फिर-फिर कर अपने को नई करती हुई त्रिकाल में भी नहीं छीजती।
भ्रमर-गीत तो सूर की बेजोड़ रचना है। विश्व-साहित्य में यह अद्वितीय वस्तु है। मानवीय बुद्धि और मन का अनंत संवाद इसमें हमें सुनाई पड़ता है। ऐसा जान पड़ता है मानो कृष्ण-रूपी अध्यात्मतत्व स्वयं इस संवाद से बाहर रहता हुआ उसे प्रभावित कर रहा है। उद्धव और गोपियों के वचनों में हम चैतन्य की कभी प्रकट, कभी ओझल हो जाने वाली छाया देखते हैं। सत्य तो यह है कि इस एक प्रसंग ने ही सूर के भक्ति-प्रधान दृष्टिकोण को दर्शन का रूप दे डाला है। भक्ति का यह दृष्टिकोण ठीक उसी प्रकार आत्मानुभव कर लक्ष्य करता है जिस प्रकार उपनिषद्-प्र्रतिपादित वेदांत।
सुनते हैं कि जब सूरदास का अंतिम समय आ गया और वे इस लोक से विदा लेने लगे तो उने विषय में कहा गया- ‘भक्ति को जहाज़ जात है, जाको कछु लेनो होय सो ले।’ निस्संदेह सूरसागर सूर के साधना-विकसित मन क साक्षात प्रतिनिधि है। यह भक्ति का एक जहाज है जिस पर चढक़र पाठक का मन रूपी पथिक अध्यात्म की यात्रा कर सकता है। जिस प्रकार तुलसीदास के आध्यात्मिक अनुभव मतवाद की चारदीवारी से ऊपर हैं, उसी प्रकार सूरदास का काव्य सरस, अत्यंत उदार और समस्त लोक के लिए है। उसमें कहीं भी चारदीवारी या मतवाद के घेरे नहीं दिखाई पड़ते। मनुष्य के मन को बार-बार धक्का देकर अध्यात्म तक पहुंचाने के लिए एक आकुल किन्तु सच्चा और सबल प्रयत्न सूरसागर के पदों में मिलता है।
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