राजनीतिज्ञ शाप नहीं देते जया जी!

जन संदेश न्यूज नेटवर्क

वर्ष 2004 से अब तक राज्यसभा की सदस्य चली आ रही जया बच्चन ने गत दिवस राज्यसभा के पटल से सत्तारूढ़ भाजपा को शाप दे डाला तो अनायास ही शाप देने वाले पौराणिक पात्र याद आ गए। इनमें गान्धारी भी थीं, भगवान परशुराम भी थे, दुर्वासा मुनि भी और भृगु ऋषि भी। गान्धारी ने जहां एक ओर योगेश्वर कृष्ण को ही क्रोधवश शाप दे डाला था, वहां अपने भाई गांधार-नरेश शकुनि को भी शाप दिया था। गान्धारी के भाई शकुनि ने छल-कपट से बहन के पूरे कुल का ही विनाश करवा दिया था इसलिए उसने शकुनि को श्राप दिया था कि ‘जैसे तुमने अपनी द्यूत-विद्या और छल से मेरे कुल का नाश कराया, तेरे कुल का भी विनाश होगा, तुम्हारे राज्य में भी कभी शांति नहीं रहेगी’। ज़ाहिर है कि आज गांधार (अफगानिस्तान) में निरंतर अशांति बनी हुई है।

चौथी बार राज्यसभा की सदस्य जया उस समय में आवेश में आकर यह भी भूल गईं कि ‘गुड्डी’, ‘अनामिका’, ‘मिली’ और ‘हज़ार चौरासी की मां’ शाप नहीं देतीं। ये सभी ऐसे पात्र हैं जो जया बच्चन ने अपनी गौरवशाली $िफल्मी जि़ंद$गी में निभाए हैं। ‘शाप’ देने वाली उनकी मुद्रा, इन भूमिकाओं को निभाने वाली अनूठी अभिनेत्री के $िफल्मी संस्कारों के भी अनुकूल नहीं हैं। बेहतर होगा यदि जया अपनी ही इन $िफल्मों को अपने किरदारों को एक बार फिर देख लेती।

शाप-दिवस पर किसी एक उच्छृंखल सांसद की किसी गरिमाविहीन टिप्पणी पर जया का क्षुब्ध होना स्वाभाविक था। उच्छृंखल सांसद की गरिमाविहीन टिप्पणी तो संंसद की कार्यवाही से $खारिज़ हो गई, मगर जया का ‘शाप’ संसद की कार्यवाही में दर्ज रहा और दर्ज रहेगा।

जया की शाप-मुद्रा के दो कारण थे। पहला कारण उनकी पुत्रवधू ऐश्वर्या राय को ईडी द्वारा पूछताछ के लिए बुलाया गया था, दूसरा कारण राज्यसभा में उस दिन किसी सांसद द्वारा की गई गरिमाविहीन टिप्पणी, थी। मगर उस दिन जया को यह भी स्मरण नहीं रहा कि आरोपों-प्रत्यारोपों का वर्तमान ज़हरीला माहौल ‘ज्यों के त्यों धर दीन्ही चदरिया’ का माहौल नहीं है। जया जिस दल की ओर से चौथी बार राज्यसभा की सदस्य हैं, उस दल के एक इत्र-विक्रेता से भी उसी दिन आयकर छापे में 160 करोड़ की अघोषित नगदी बरामद हुई थी।

सांसद जया बच्चन जी यह भी भूल गई कि उनके पति अभिताभ बच्चन को कई बार अग्नि परीक्षाएं देनी पड़ी थीं, लेकिन अमिताभ ने आपा नहीं खोया। छन छन कर आने वाली जानकारियों के अनुसार कभी भी इस परिवार के कुछ अन्य सदस्य घोर अनियमितताओं के आरोपों में $फंस सकते हंै।

छापे, भ्रष्टाचार के आरोप, अनियमितताएं हमारी सियासी जि़ंद$गी का उतना ही बड़ा सच हैं, जितना कि यह सच कि इतने घालमेल के बाद भी राजनैतिक गलियारे में रौनकें थम नहीं गईं। इस गलियारे में संतों के भी प्रवेश हुए और ‘डॉन’ छवि वाले लोगों के भी प्रवेश होते रहे हैं। संसद के गुम्बदों में मंत्र भी गूंजे हैं, शाप भी, आयतें भी और वैदिक ऋचाएं भी। संसद के गुम्बद इन सब गूंजों के गवाह हैं। सांसद जब शपथ लेते हैं, तब भी उन्हें अपने-अपने इष्ट चुनने और अपने-अपने ईमान एवं आस्था को साक्षी मानकर शपथ लेने की अनुमति होती है।

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के समय कहे गए शब्द अब भी समय की दीवार पर एक अमिट इबारत की तरह चस्पां हैं, ‘पार्टियां बनेंगी, पार्टियां टूटेंगी, सरकारें आएंगी, सरकारें जाएंगी। मगर यह देश रहना चाहिए।’

अमिताभ बच्चन भी राजनीति में रहे, लेकिन शीघ्र किनारा कर गए। बो$फोर्स-प्रकरण में भी वह और उनके भाई चर्चा में बने रहे।

इसी संदर्भ में 2008 की एक घटना का जि़क्र भी प्रासंगिक होगा। बम्बई में ‘द्रोण’ $िफल्म को संगीतमय ‘लांच’ हो रहा था। निदेशक गोल्डी बहल ने अंग्रेजी में भाषण दिया। जया ने अपने भाषण की शुरुआत इस कथन से की, ‘हम यूपी के लोग हैं, इसलिए हिंदी में ही बात करेंगे। महाराष्ट्र के लोग मा$फ करें।’ इस पर महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने कड़ी आपत्ति जताई थी। उन्होंने इसे मराठी लोगों का अपमान बताया था और जया से सार्वजनिक रूप में क्षमा मांगने के लिए कहा था। शिव सेना सांसद संजय राउत ने भी कहा था, ‘अपनी सारी कमाई, समूचा कैरियर, सारी सम्पत्ति महाराष्ट्र से बनाई और अब यह कहना है कि ‘हम यूपी के लोग हैं, आपत्तिजनक है’। इस पर अमिताभ ने स्वयं अपनी ओर से और जया की ओर से सार्वजनिक रूप में क्षमा मांगी थी।’

इसी वर्ष के आरंभ में जया पश्चिमी बंगाल में भाजपा के खिला$फ बहुत कुछ बोल कर आई हैं। उत्तर प्रदेश के सांसद दिवंगत अमर सिंह की बातें अब भी लोगों के ज़ेहन में हैं। अब उत्तरप्रदेश के चुनावों में भी जया सक्रियता से भाग लेंगी और अपने भाषणों में स्पष्टतया वह अपने अपमान को भी मुद्दा बनाएंगी। ऐसे माहौल में ‘न$फरत’, ‘क्षोभ’ और ज़हर की राजनीति से कौन व कैसे उबरेगा?

जया को अपनी ही पार्टी के अनेक ऐसे चर्चित दिग्गजों का भी अता पता मालूम है जो अपराध-जगत में भी सक्रिय रहे हैं। इस मारकाट, आरोप-प्रत्यारोप और गरिमाविहीन भाषा के ‘कैबरे-नृत्य’ में किसको, किस-किस का शाप लगेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। मगर यह यकीनन कहा जा सकता है कि अब न तो कोई कबीर, विवेकानंद हैं, न बुल्लेशाह है, न ही राममनोहर लोहिया, न दीनदयाल उपाध्याय, न मधुलिमये, न नाना देशमुख या कर्पूरी ठाकर। अब कमोबेश सभी ‘एक ही थैली’ के हैं और मुख्य लक्ष्य सत्ता के गलियारों में दनदनाना है, फिर उसके लिए साधन कोई भी हों, कैसे भी हों। और इस माहौल में अब ‘शाप’ भी कहां किसी को लगते हैं? साभार: डा. चन्द्र त्रिखा

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