दोनों हाथों से तलवार चलाने में माहिर
महान योद्धा सूरजमल
महाराजा सूरजमल उत्तर मध्यकालीन भारतीय राजनीति के गौरव-गिरि थे। वे अपने समय के सर्वश्रेष्ठ नीतिज्ञ और रमणिक कुशल योद्धा थे। उनका जन्म 13 फरवरी, 1707 को भरतपुर के संस्थापक राजा बदन सिंह के घर में हुआ था। उन्होंने बचपन से ही युद्धों में भाग लेना आरम्भ कर दिया था। उनका बचपन का नाम सुजान सिंह था लेकिन बाद में उसके प्रचण्ड प्रताप को देखकर ही राजपुरोहित ने इस तेजस्वी बाल रवि समान शिशु का नामकरण सूर्यमल्ल उपाख्य सूरजमल किया था।
भारत की शान भरतपुर के महाराजा सूरजमल का कद 7 फीट 2 ईंच तथा 150 किग्रा भारी भरकम शरीर के स्वामी थे। महाराजा सूरजमल विश्व में अकेले ऐसे योद्धा थे जोकि दोनों हाथों से तलवार चलाने की कला के धनी थे। 20 अगस्त 1748 ई. में बागरू की लड़ाई में भारी बारिश के बीच शरीर पर 50 घाव होने के बावजूद अकेले ही 160 दुश्मनों को मौत के घाट उतार दिया था। एशिया के बहुत से देश इनसे मदद मांगने आते थे। इन्होंने अपने पूरे जीवन काल में 80 युद्ध लड़े और सभी में ये विजयी रहे। मुगल, मराठे, राजपूत व अंग्रेज ये सभी इनसे खौफ खाते थे। इन्हें कोई भी नहीं हरा पाया। पीछे खड़े इनके उत्तराधिकारी बेटे महाराजा जवाहर सिंह ने दिल्ली जाकर मुगलों को बेरहमी से पीटा और मुगलों का सुरक्षा कवच कहे जाने वाले लालकिले के दरवाजे को उखाड़ कर भरतपुर में ला पटका जो अब भी भरतपुर के लोहागढ़ किले में रखा है।
युवाकाल में ही सूरजमल ने अलीगढ़ कौल के संस्थापक फतेहअली की मान-रक्षा सैन्य-सहायता करके की थी। उसी काल में वे उसके सबल समर्थक बनकर दिल्ली की शाही-सेना के विरूद्ध तनकर खड़े हो गये थे। कौल अलीगढ़ की छोटी सी रियासती सेना के साथ मिलकर उन्होंने दिल्ली की शाही सेना का सबलता के साथ सामना किया था। तभी प्रथम बार उनकी कीर्ति कौमुदी सारे ही ब्रजक्षेत्र में फैल गई थी। फतेहअली और भरतपुर राज्य की संयुक्त सैन्य-वाहिनी ने युवराज सूरजमल के नेतृत्व में शाही-सेना के दांत खट्टे कर दिये थे और विजय-वैजयन्ती ने उनका ही वरणीय वरण किया था। इधर विजय पाताका फहराने के कारण जहां एक ओर भरतपुर-राज्य की पहचान एक सशक्त राजनीतिक शक्ति के रूप में हुई वहीं पर उसकी सीमाओं का विस्तार भी अब अलीगढ़-आगरा और एटा-मैनपुरी तक हो गया था।
अपने सर्वश्रेश्ठ रणकौषल का पूर्णत: परिचय महाराज सूरजमल ने जयपुर के गृह-युद्ध में किया था। जब माध्व सिंह राज्यधिकार से वंचित होकर राजद्रोही बन गया था। वह अपने साथ मेवाड़-मारवाड़ और अजमेर तथा बीकानेर-कोटा-बूंदी और मराठाओं की संयुक्त सेना के साथ आक्रान्ता के रूप में जयपुर पर चढ़ाई कर बैठा था। ऐसी विषम परिस्थिति में ईश्वरी सिंह नितान्त एकाकी और असहाय था। तभी उसने अपने पिता के पुराने मित्र राज्य भरतपुर से सैन्य सहायता की याचना कवि के निम्नांकित शब्दों में की थी।
करी काज जैसी करी गरूड़ ध्वज गजराज।
पत्र-पुष्प के लैंत ही थ।ं आज्यो ब्रजराज।।
अर्थात जिस प्रकार से जब जल सागर में गज और ग्राह मकर के मध्य में युद्ध हुआ था और भगवान भगत गजराज विपति में फंसकर नारायण का नाम स्मरण किया तो उन्होंने उसका तुरन्त उद्धार किया था, तुम भी मेरे सहायी बनो।
तभी नारायण बनकर सूरजमल स्वयं उस रणक्षेत्र में उतरे थे। महाराजा बदन सिंह की मृत्यु के बाद उसके पुत्र महाराजा सूरजमल जाट 1756 ई. में भरतपुर राज्य का शासक बना, राजनैतिक कुशलता और कुषलता और कुशाग्र बुद्धि के कारण उसे जाट जाति का प्लेटों भी कहा जाता है। आगरा, मेरठ, मथुरा, अलीगढ़ आदि उसके राज्य में सम्मिलित थे। महाराजा सूरजमल अन्य राज्यों की तुलना में हिन्दुस्तान का सबसे शक्तिशाली शासक था। इनकी सेना में 1500 घुड़सवार व 25 हजार पैदल सैनिक थे। उन्होंने अपने पीछे 10 करोड़ का सैनिक खजाना छोड़ा। मराठा नेता होलकर ने 1754 में कुम्हेर पर आक्रमण कर दिया। महाराजा सूरजमल ने नजीबुदौला द्वारा अहमद श्साह अब्दाली के सहयोग से भारत को मजहबी राष्ट्र बनाने को कोशिश को भी विफल कर दिया।
इन्होंने अफगान सरदार असंद खान, मीर बख्शी, सलावत खां आदि का दमन किया। अहमद शाह अब्दाली 1757 में दिल्ली पहुंच गया और उसकी सेना ने ब्रज के तीर्थ को नश्ट करने के लिए आक्रमण किया। इसको बचाने के लिए केवल महाराजा सूरजमल ही आगे आये और उनके सैनिको ने बलिदान दिया। अब्दाली पुन: लौट गया।
जब सदाशिव राव भाऊ अहमद शाह अब्दाली को पराजित करने के उद्देष्य से आगे बढ़ रहा था, तभी स्वयं पेशवा बालाजी बाजीराव ने भाऊ को परामर्श दिया कि उत्तर भारत में मुख्य शक्ति के रूप में उभर रहे महाराजा सूरजमल का सम्मान कर उनके परामर्श पर ध्यान दिया जाए लेकिन भाऊ ने युद्ध संबंधी इस परामर्श पर ध्यान नहीं दिया और अब्दाली के हाथों पराजित हो गया। 14 जनवरी, 1761 में हुए पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठा शक्तिओं का संघर्ष अहमदशाह अब्दाली से हुआ। इसमें एक लाख में से आधे मराठा सैनिक मारे गये। मराठा सेना के पास न तो पूरा राषन था और न ही इस क्षेत्र की उन्हें विशेष जानकारी थी। यदि सदाशिव भाऊ के महाराजा सूरजमल से मतभेद न होते, तो इस युद्ध का परिणाम भारत और हिन्दुओं के लिए शुभ होता।
उसके बाद भी महाराजा सूरजमल ने अपनी मित्रता निभाई और मराठा सेना को शरण दी। उन्होंने बचे घायल सैनिकों के अन्न, वस्त्र और चिकित्सा का प्रबंध किया। महारानी किशेरी ने जनता से अपील कर अन्न आदि एकत्र किया। ठीक होने पर वापस जाते हुए हर सैनिक को रास्ते के लिए भी कुछ धन, अनाज तथा वस्त्र दिये। अनेक सैनिक अपने परिवार साथ लाए थे। उनकी मृत्यु के बाद सूरजमल ने उनकी विधवाओं को अपने राज्य में ही बसा लिया। उन दिनों उनके क्षेत्र में भरतपुर के अतिरिक्त आगरा, धौलपुर, मैनपुरी, हाथरस, अलीगढ़, इटावा, मेरठ, रोहतक, मेवात, रेवाड़ी, गुडग़ांव और मथुरा सम्मिलित थे।
महाराजा सूरजमल के समय में परिस्थितियां बदल गई थी। यहां के वीर व साहसी पुरूष किसी हमलावर से स्वयसुरक्षा में ही नहीं बल्कि उस पर हमला करन में खुद को काबिल समझने लगे। सूरजमल द्वारा की गई दिल्ली की लूट का विवरण उनके राजकवि सूदन द्वारा रचित ‘सुजान चरित्र- में मिलता है। सूदन ने लिखा है कि महाराजा सूरजमल ने अपने वीर एवं साहसी सैनिकों के साथ सन् 1753 के बैसाख माह में दिल्ली कूच किया। मुगल सम्राट की सेना के साथ राजा सूरजमल का संघर्ष कई माह तक होता रहा और कार्तिक के महिने में राजा सूरजमल दिल्ली में दाखिल हुआ। दिल्ली उस समय मुगलों की राजधानी थी। दिल्ली की लूट में उसे अथाह सम्पत्ति मिली, इसी घटना का विवरण काव्य के रूप में ‘सुजान-चरित्र’ में इस प्रकार किया है।
महाराजा सूरजमल का यह युद्ध जाटों का ही नहीं वरन् ब्रज के वीरों की मिलीजुली कोशिश का परिणाम था। इस युद्ध में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के अलावा गुर्जर, सैनी और अहीरों ने बहुत उल्लास के साथ भाग लिया। सूदन ने लिखा है। इस युद्ध में गोसाईं राजेन्द्र गिरि और उमराव गिरि भी अपने नागा सैनिकों के साथ षामिल थे। महाराजा सूरजमल को दिल्ली की लूट में जो अपार धन मिला था, उसे जनहित कार्यों और निर्माण कार्यों में प्रयोग किया गया। दिल्ली विजय के बाद महाराजा सूरजमल ने गोवर्धन जाकर श्री गिरिराज जी की पूजा थी और मानसी गंगा पर दीपोत्सव मनाया।
25 दिसम्बर, 1763 को नवाब नजीबुद्दौला के साथ हुए युद्ध में गाजियाबाद और दिल्ली के मध्य हिंडन नदी के तट पर महारााजा सूरजमल छल-बल से षहीद कर दिये गये। उनके युद्धों एवं वीरता का वर्णन सूदन कवि ने ‘सुजान चरित्र’ नामक रचना में किया है। अब भी हर वर्ष शहादरा के विश्वास नगर में स्थित उनकी समाधी पर 25 दिसम्बर को उनका बलिदान दिवस मनाया जाता है। उनका उत्सर्ग अमर और अविस्मरणीय है। लेखक का भारत सरकार तथा तमाम राज्य सरकारों से पूर जोर अनुरोध है कि समाज के प्राचीन योद्धाओं जैसे की मजाराजा सूरजमल, राजा महेंद्र प्रताप, महाराजा रणजीत सिंह और राजा नाहर सिंह की वीर-गाथाओं को शैक्षणिक स्तर के प्रत्येक पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाए। ऐसा करना राष्ट्रीय एकता, अखण्डता और स्वतंत्रता बनाए रखने में कारगर सिद्ध होगा। ऐसे कीर्तिपुरुष योद्धा को लेखक शत: शत: नमन करता है।
लेखक
डॉ. महेंद्र सिंह मलिक
आईपीएस (सेवानिवृत)
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