पिछले 5 वर्षों में 60 फीसदी विधायकों ने गोवा में अपने दल बदले, रिकॉर्ड: रिपोर्ट
पणजी: एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स (एडीआर) ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि गोवा में पिछले पांच सालों में 60 फीसदी विधायकों ने अपनी सदस्यता से इस्तीफा दिया, ये रिकॉर्ड अपने आप में बड़ा रिकॉर्ड है। भाजपा के नेता और पूर्व सीएम लक्ष्मीकांत ने भी पार्टी बदल ली है। गोवा में विधानसभा चुनाव 14 फरवरी को होने हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान विधानसभा (2017-2022) के पांच साल के कार्यकाल में 24 विधायकों ने अपनी पार्टियों को बदला जो सदन की कुल संख्या का 60 फीसदी है। यह भारत में कहीं और कभी नहीं हुआ है। नैतिकता और अनुशासन के खिलाफ ये सबसे खराब स्थिति है। 24 विधायकों की सूची में विश्वजीत राणे, सुभाष शिरोडकर और दयानंद सोपटे के नाम शामिल नहीं हैं जिन्होंने 2017 में कांग्रेस विधायकों के रूप में इस्तीफा दे दिया था और इसके टिकट पर चुनाव लडऩे से पहले सत्तारूढ़ भाजपा में शामिल हो गए थे। 2019 में कांग्रेस के दस विधायक भाजपा में शामिल हो गए थे। इनमें विपक्ष के तत्कालीन नेता चंद्रकांत कावलेकर भी शामिल थे।
अन्य कांग्रेस विधायक जो भाजपा में शामिल हो गए थे, वे हैं- जेनिफर मोनसेरेट (तालिगाओ), फांसिस्को सिल्वरिया (सेंट आंद्रे), फिलिप नेरी रोड्रिग्स (वेलिम), विल्फ्रेड नाजरेथ मेनिनो डीश्सा (नुवेम), क्लैफसियो डायस (कनकोलिम), एंटोनियो कारानो फर्नांडीस (सेंट क्रूज), नीलकंठ हलारंकर (तिविम), इसिडोर फर्नांडीस (कैनकोना), अतानासियो मोनसेरेट (जिन्होंने मनोहर पर्रिकर की मृत्यु के बाद 2019 में पणजी उपचुनाव जीता था)।
पार्टी छोडऩे वाले भाजपा विधायक हैं- प्रवीण जांटे (मैम) जो अब एमजीपी में शामिल हो गए हैं, माइकल लोबो (कैलंगुट) जो कांग्रेस में शामिल हो गए हैं, जोस लुइस कार्लोस अल्मेडा (वास्को डी गामा) कांग्रेस में शामिल हो गए हैं जबकि अलीना सलदान्हा (कोरटालिम) आम आदमी पार्टी में शामिल हो गई हैं। विधायकों के दलबदल और इस्तीफे के बाद सदन में कांग्रेस की वर्तमान सिर्फ दो सांसद रह गए हैं जबकि भाजपा की क्षमता अभी 27 है।
चुनाव गणित: गोवा के लिए चुनावी लड़ाई टीएमसी के प्रवेश और अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आप के आक्रामक प्रचार के साथ बहुकोणीय हो गई है। अब तक, क्षेत्रीय एमजीपी और टीएमसी और कांग्रेस और जीएफपी के बीच चुनावी गठजोड़ बना हुआ था। वहीं, 2017 के चुनावों में, कांग्रेस गोवा में 40 सदस्यीय सदन में 17 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी लेकिन सत्ता में नहीं आ सकी, क्योंकि भाजपा ने 13 पर जीत हासिल की, साथ ही कुछ निर्दलीय और क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन किया और सरकार बनाई थी।
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