हरियाणा: धान का कटोरा करनाल, शाहबाद मारकंडा
| File Pic- Church in Karnal |
‘धान का कटोरा’ कहा जाने वाला शहर करनाल महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। किवदंती यही है कि इसे महाभारत के चर्चित पात्र सूर्यपुत्र अंगराज अंगराज कर्ण ने बसाया था। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार यह शहर वर्ष 1739 ईस्वी में चर्चा में तब आया जब नादिरशाह ने यहां मुगल बादशाह मुहम्मद शाह को पराजित किया था। वर्ष 1863 में जींद के राजा गोपाल सिंह ने इस पर आधिपत्य जमाया। उन्हीं वर्षों में यहां मराठों व सिख सेनाओं के मध्य छोटे-मोटे युद्ध भी होते रहे। वर्ष 1795 में अंतत: यहां मराठा सेनाओं ने जींद-सम्राट राजा भाग सिंह हराकर आधिपत्य जमा लिया। उन्होंने इसे जार्ज थॉमस को सौंप दिया। इसी मध्य लाडवा के राजा गुरदित्त सिंह ने यहां कब्ज़ा जमाया, लेकिन वर्ष 1805 में यहां ब्रिटिश सेनाओं ने उससे यह क्षेत्र छीनकर यहां सैनिक छावनी स्थापित कर दी। उन्होंने उन्हीं दिनों जींद के शासक राजा गजपत सिंह द्वारा निर्मित किले को काबुल के अमीर दोस्त मुहम्मद खान के आवास के रूप में बदल दिया। बाद में वर्ष 1862 में इसी स्थल को शिक्षा विभाग के सुपुर्द कर दिया गया।
यमुना नदी के पश्चिमी मुहाने पर स्थित इस शहर की वर्तमान आबादी लगभग नौ लाख है और यह लगभग 1967 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ एक समृद्ध जि़ला है। इसी शहर में प्रथम अक्तूबर 1895 को पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री लियाकत अली खान का जन्म हुआ था। लियाकत अली खान के पिता नवाब रुस्तम अली खान को ‘नवाब बहादुर’ व ‘रुकन-अल-दौला’, ‘शमशेरजंग’ आदि का खिताब भी हासिल था। नवाब रुस्तम अली खान इने गिने बड़े ज़मींदारों में से थे, जिनकी ज़मींदारी पूर्वी पंजाब (भारतीय पंजाब) और यूपी तक फैली हुई थी। उनके पास करनाल क्षेत्र के लगभग 300 गांवों की ज़मींदारी थी। लियाकत अली के दादा नवाब अहमद अली खान ने 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दौरान ब्रिटिश सेना की भरपूर मदद की थी। उसके एवज़ में भी लम्बी-चौड़ी जागीरें पुरस्कार स्वरूप मिल गई थीं, हालांकि पहले भी ज़मीनें कम नहीं थीं।
भारत-पाक विभाजन के समय जहां से भी बड़ी संख्या में मुस्लिम जनसंख्या ने पाकिस्तान की ओर पलायन किया था। उधर, से यानि कि पाकिस्तानी क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में हिन्दू-सिख शरणार्थी यहां व आसपास के कस्बों, नीलोखेड़ी, तरावड़ी, पानीपत, घरौंडा आदि शहरों में बस गए थे। इस समय यह शहर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘स्मार्ट-सिटी योजना’ में शामिल शहरों में से एक है।
सुघ टीला
ईसा से लगभग पांच हजार वर्ष पुरानी सभ्यता के अवशेष जगाधरी तहसील के गांव अमदलपुर-दयालगढ़ के समीप से मिले हैं। यमुना नदी के दक्षिणी किनारे पर बाढ़-प्रभावित क्षेत्रों के रूप में चर्चित एक विशाल टीला है जिसका वृत्त लगभग पांच किलोमीटर में फैला है। इसी टीले में मौजूद हैं एक पुराने शहर ‘श्रुघ्न’ की जि़न्दगी के अवशेष, जिनका जि़क्र चीनी यात्री ह्यूनत्सांग ने भी अपने यात्रा-संस्मरणों में किया था। इसी श्रुघ्न को अब ‘सुघ’ कहा जाता है। इसी टीले की खुदाई में पंजाब विश्वविद्यालय के प्राच्य भारतीय इतिहास के डॉ. सूरजभान ने मुख्य भूमिका निभाई थी। बाद में हरियाणा सरकार के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभगा के डॉ. डीएस मलिक और श्री एम आचार्य ने इस उत्खनन को आगे बढ़ाया।
खुदाई के पहले चरण में काफी निचाई से रंग किए गए बर्तनों के टुकड़े मिले। बाद में दूसरे चरण में मौर्यकालीन मूर्तियां, छेद वाले सिक्के, एक ओर त्रिशूल व दूसरी ओर एक सांप व हाथी के चित्रों वाले कुछ सिक्के व कुछ पुरानी मूर्तियों के अवशेष भी मिले।
इस स्थल पर मिले अधिकांश अवशेष शुंग-कुशान शैली की मानव आकृतियों से मेल खाते हैं। एक भग्न मूर्ति में एक बच्चे को लकड़ी की एक तख्ती पर कुछ लिखते हुए दिखाया गया है। इनमें से कुछ अवशेष राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली में हैं तो कुछ हरियाणा के पुरातत्व संग्रहालय गुरुकुल झज्जर में मौजूद हैं। इनमें उत्तर भारत की तत्कालीन संस्कृति से मेल खाने वाले लोहे के बर्तनों के अवशेष भी हैं।
दूसरे चरण में 7वीं शताब्दी में सुघ नगर पर विदेशी आक्रांताओं के आधिपत्य के प्रमाण भी कुछ अवशेषों में मिले हैं। इनके अतिरिक्त छठी शताब्दी की कुछ मुहरें भी मिली हैं जिन पर व्याघ्रराज और ‘सुघ’ टंकित है। यह स्थल अमदलपुर गांव में स्थित सूर्यमंदिर के पास ही मौजूद है।
शाहबाद मारकंडा
अम्बाला-दिल्ली जीटी रोड पर स्थित शाहबाद मारकंडा अम्बाला से लगभग 21 किलोमीटर की दूरी पर है। यहां पहुंचने के लिए पंचकूला-रामगढ़ मार्ग का भी उपयोग होता है। हरियाणा के अनेक नगरों की तरह इस शहर का भी एक समृद्ध अतीत है। इसे रौंदने वालों में मुहम्मद गोरी भी था और बाबर भी। बाबर का कोप सिर्फ इसलिए इस कस्बे पर बसा था क्योंकि यहां के लोगों ने उसके विरुद्ध इब्राहीम लोधी का साथ दिया था।
शहर की स्थापना, वर्ष 1192 में तराई के युद्ध के बाद मुहम्मद गोरी के एक सेनापति ने की थी। उन दिनों यह मुस्लिम बहुल कस्बा था जबकि भारत-पाक विभाजन के बाद यह स्थिति पूरी तरह बदल गई है। ऐतिहासिक घटनाक्रम इस बात की भी पुष्टि करता है कि यहां बाबर व हुमायूं भी कुछ वर्ष रहे थे।। वर्ष 1710 में सिख योद्धा बाबा बन्दा सिंह बहादर ने इस शहर पर कब्जा कर लिया था। वर्ष 1757 में इस मराठा साम्राज्य का यहां पर अधिकार हो गया। धीरे-धीरे सिखों ने फिर से इस क्षेत्र को अपने अधिकार में लेना शुरू किया। वर्ष 1791 की 22 मई के दिन सिख योद्धाओं बघेल सिंह और कर्म सिंह निर्मला ने यहां के मुस्लिम किलेदार खलील खान व उसके 700 मुस्लिम सिपाहियों को मारकर पूरे क्षेत्र पर अधिकार कर लिया था। उन दिनों अफगान सेनाओं ने कई बार सिख सेनाओं के विरुद्ध धावे बोले, मगर वे सफल नहीं हो पाए।
वर्ष 1630 में यहां मुगल सम्राट शाहजहां ने भी एक मस्जिद बनवाई थी। उस स्थल पर आज एक भव्य गुरुद्वारा है। वर्ष 1850 तक यहां सिखों का अधिकार रहा मगर उसी वर्ष उन सब सिख-सेनानियों व जागीरदारों को अंग्रेजी सरकार ने अधिकार-मुक्त किया था।
कभी शाहाबाद संगीत के वाद्यों के निर्माण व कैंचियों के निर्माण के लिए भी जाना जाता था। यहां का प्राचीन शिवालय श्री मार्केण्डेय महादेव शिव मंदिर के रूप में आज भी हज़ारों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। मान्यता है कि महाभारत-काल में ऋषि मार्केण्डेय ने यही तप किया था।
क्रमश: हरियाणा की सभ्यता
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