चांदनी रात में ही क्यों तोड़ी जाती है दुनिया की सबसे महंगी चाय ‘सिल्वर टिप्स इम्पीरियल’

जन संदेश न्यूज नेटवर्कखेतीबाड़ी



हिमालय में स्थित कंचनजंगा दनिया की तीसरी सबसे ऊंची चोटी है। इसकी ढलानों पर समुद्र तल से करीब 2200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हैं कुछ ख़ास पहाडिय़ां। दार्जिलिंग की ये पहाडिय़ां देखें तो इनका प्राकृतिक सौंदर्य कुछ पलों के लिए आपकी सांसें रोक देगा। इन पहाडिय़ों में जंगली हाथी और बाघ मस्ती में घूमते हैं। पहाडिय़ों की ढलानों पर बौद्ध मठ हैं।

लेकिन दार्जिलिंग जिस बात के लिए सब से ज़्यादा मशहूर है, वो हैं यहां के हरे-भरे चाय के बागान। दार्जिलिंग की चाय की वजह से इसे दुनिया ‘शैम्पेन ऑफ टी’ के नाम से बुलाती है। दार्जिलिंग में चाय के 87 बागान हैं। हर एक बागान में अपने तरह की अनूठी, शानदार ख़ुशबू वाली चाय तैयार की जाती है। दुनिया भर में दार्जिलिंग टी मशहूर है। अगर आप दार्जिलिंग से 33 किलोमीटर दक्षिण की तरफ जाएं, तो आपको वहां दुनिया की सबसे पुरानी चाय की फैक्ट्रियों में से एक मिलेगी। यहां पर आप को दुर्लभ किस्म की चाय की पत्ती और कली मिलेगी।

चाय भी ख़ास, तोडऩे वाले भी ख़ास: इसे सिल्वर टिप्स इम्पीरियल के नाम से जाना जाता है। इस चाय की कलियों को कुछ खास लोग ही तोड़ते हैं जिनका ताल्लुक़ मकाईबाड़ी चाय बागान से है। सिल्वर टिप्स इम्पीरियल चाय को पूर्णमासी की रात में ही तोड़ा जाता है। रहस्य की परतों में लिपटी ये चाय किसी और दुनिया की चीज मालूम होती है। जितना गहरा इसका राज है, उतनी ही ज़्यादा इसकी कीमत है। 2014 में सिल्वर टिप्स इम्पीरियल एक लाख 36 हजार रुपए किलो से भी ज़्यादा दाम पर बिकी थी। भारत में पैदा हुई ये किसी भी चाय की अब तक की सबसे ज़्यादा कीमत का रिकॉर्ड है।

दुनिया की सबसे महंगी इस चाय यानी सिल्वर टिप्स इम्पीरियल की कलियों को साल के कुछ ख़ास दिनों में ही, कुल चार या पांच बार तोड़ा जाता है। पूर्णमासी की रात को हाथ में मशाल लिए हुए मकाईबाड़ी के बागान मज़दूर इसकी कलियां चुनते हैं। स्थानीय लोग कहते हैं इस चाय में धरती का हर जादू, ब्रह्मांड का हर राज और मिट्टी की सारी ताकत समाई हुई है। चटख़ चांदनी रातों में बागान मज़दूरों की हंसती-गाती टोलियां इस चाय की कलियां चुनती हैं। मानो वो चाय नहीं, ब्रह्मांड के रहस्य को जुटा रही हों। सिल्वर टिप्स इम्पीरियल की बेहद ख़ास चाय पत्ती को भोर होने से पहले ही पैक कर दिया जाता है। माना जाता है की सूरज की किरणें पडऩे से इसकी आभा, इसकी ख़ुशबू पर असर पड़ता है।

चाय का दीवाना है ब्रिटेन का शाही परिवार: मकाईबाड़ी चाय बागान के संजय दास कहते हैं कि हर साल सिल्वर टिप्स इंपीरियल चाय केवल 50 से 100 किलो के बीच ही पैदा होती है। इसे ज़्यादा जापान, ब्रिटेन और अमरीका के खऱीदार ले लेते हैं। संजय दास कहते हैं कि ब्रिटेन का शाही परिवार इस चाय का बहुत शौक़ीन है। दार्जिलिंग के 87 चाय बागानों में हर साल कऱीब 85 लाख किलो चाय तैयार होती है। ये कई किस्मों में बांटी जाती है।

सिल्वर टिप्स इम्पीरियल चाय को तोडऩे की प्रक्रिया देखने के लिए सैलानी दूर देशों से दार्जिलिंग आते हैं। संजय दास, इस चाय को पूर्णमासी को तोडऩे की वजह बताते हैं। वो कहते हैं कि समुद्र में इस वक्त ज्वार आता है। जो बहुत ताक़तवर होता है। पूरे ब्रह्मांड की शक्ति धरती पर असर डालती है। ऐसे मौक़े पर जो चीज़ भी तैयार की जाती है, वो बहुत ताक़तवर होती है।

वैदिक मंत्र का जाप: मार्च में पडऩे वाली पूर्णमासी से इसकी शुरुआत होती है। माना जाता है कि जब ज्वार आता है तो पौधों में पानी की मात्रा कम हो जाती है। मकाईबाड़ी के लोग मानते हैं कि हवा में उस वक्त ज़्यादा ऑक्सीजन होती है। इस दौरान आबो-हवा में ऊर्जा ज़्यादा होती है। इसकी वजह से नरम और चिकनी चाय की पत्तियां तैयार होती हैं। जब सूरज डूबने लगता है तो चाय बागान के मज़दूर एक ख़ास आयोजन की तैयारी करते हैं। ये आयोजन धार्मिक भी है और मनोरंजन का साधन भी।

पूरे सीजऩ में सिल्वर टिप्स इम्पीरियल चाय की पत्तियां केवल चार या पांच बार तोड़ी जा सकती हैं। हर फ़सल के पहले मकाईबाड़ी के सैकड़ों कार्यकर्ता सज-धज कर बागान के ढलानों पर जमा होते हैं। नाचते-गाते हैं। अच्छी किस्मत और हिफाजत के लिए वैदिक मंत्र पढ़े जाते हैं। इस आयोजन को देखने के लिए जमा हुए लोग हाथों में मशाल लिए होते हैं। मशाल का मक़सद सिर्फ़ बुरी आत्माओं को ही नहीं, आस-पास रहने वाले जंगली जानवरों को भी भगाना होता है। रात आठ बजे के बाद जब पूर्णमासी का चांद सबसे चमकीला होता है, तब कुशल मज़दूर बड़ी तेजी से चाय की केवल दो पत्तियां और कली तोड़ते हैं।

सूरज की रोशनी का प्रभाव: माना जाता है कि अगर इस चाय की पत्तियों पर सूरज की रोशनी पड़ती है, तो उसका स्वाद ही नहीं, रंग-रूप भी बदल जाता है। इसीलिए मज़दूरों की कोशिश होती है कि आधी रात से पहले ज़्यादा से ज़्यादा पत्तियां और चाय की कलियां जमा कर ली जाएं। इसके बाद इस चाय की प्रॉसेसिंग की जाती है। ये काम भी सुबह होने से पहले पूरा करना होता है। 50 किलो सिल्वर टिप्स इम्पीरियल चाय तैयार करने के लिए 200 किलो ताज़ा पत्तियों की ज़रूरत होती है। मज़दूर इससे ज़्यादा पत्तियां नहीं तोड़ते। खऱीदार आम तौर पर मार्च से मई के बीच तोड़ी गई पत्तियों की सबसे ज़्यादा क़ीमत देते हैं। कहते हैं कि इस दौरान तोड़ी गई चाय में ज़्यादा चमक और ख़ुशबू होती है। इतनी कम तादाद में होने की वजह से ही शायद सिल्वर टिप्स इम्पीरियल की क़ीमत इतनी ज़्यादा होती है। मगर इसके जादुई स्वाद का ब्रह्मांड से कनेक्शन खोजना जरा मुश्किल है।

गुरबत का बसेरा: मगर, दुनिया की बेहतरीन और महंगी चाय पैदा करने वाले इस इलाके के लोगों की हालत बहुत खऱाब है। ख़ास तौर से मकाईबाड़ी बागान के इर्द-गिर्द तो गुरबत का बसेरा है। मकाईबाड़ी बागान के ढलान बड़े तीखे हैं। मॉनसून के सीजऩ में बहुत मिट्टी कट कर बह जाती है। आज इस बागान के केवल 33 फीसद हिस्से पर ही चाय की खेती होती है। बाक़ी में पेड़ लगा दिए गए हैं।

159 साल तक एक ही परिवार के पास रहने के बाद मकाईबाड़ी का बागान और इसकी चाय एक नए सफर पर चलने की तैयारी कर रहे हैं। इसी साल राजा बनर्जी ने एलान किया था कि वो 47 साल के कार्यकाल के बाद कंपनी के चेयरमैन का पद छोड़ देंगे। वो इसके शेयर मकाईबाड़ी में काम करने वाले 600 लोगों में बांट देंगे। मकाईबाड़ी को सिल्वर टिप्स इम्पीरियल का राज खोलने में कई दशक लग गए थे। अब इस ख़ुशबू को दुनिया तक पहुंचाने वाले ही इसके मालिक होंगे। 

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