बंद करें असहिष्णुता का खेल

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 बंद करें असहिष्णुता का खेल

19वीं सदी के एक प्रख्यात संत श्री परमहंस के श्रद्धालुओं की संख्या लाखों में है और ये श्रद्धालु विश्व के अनेक देशों में फैले हुए हैं। पाकिस्तान के पख्तूनवा प्रांत के जि़ला करक के एक गांव ‘तेरी’ में मौजूद है श्री परमहंस स्वामी अद्वैतानंद की समाधि। वैसे इस बहुचर्चित संत का जन्म छपरा-बिहार में 1846 में हुआ था।

स्वामी अद्वैतानंद संस्कृत, हिंदी, अरबी के विद्वान थे और 16 वर्ष की उम्र में ही वर्ष 1883 में उन्होंने जयपुर में 90 वर्षीय संत स्वामी आनंदपुर जी से संन्यास की दीक्षा ले ली थी। उन्हीं से प्राणायाम और योग की परम शिक्षा प्राप्त की और अद्वैतवाद पर आधारित भक्ति मार्ग में लीन हो गए। उन्होंने देश के कोने-कोने में 300 से अधिक आश्रम स्थापित किए थे और अपने ही एक शिष्य स्वामी स्वरूपानंद को अपना उत्तराधिकारी भी घोषित कर दिया था। कालांतर में यही स्वामी स्वरूपानंद ‘श्री नागली निवास’ के नाम से लोकप्रिय हो गए।

अब भी इनके अनेक आश्रम अमेरिका, कनाडा व खाड़ी देशों में स्थापित हैं। स्वामी अद्वैतानंद को तेरी गांव में कुछ पुरानी सिद्ध-तपस्थलियों का अहसास होता था। वह चाहते थे उन्हें वहीं समाधि मिले। वहीं उन्हें विधिपूर्वक समाधि दे दी गई थी।

भारत-विभाजन के समय इस गांव से सभी हिन्दू-परिवार भी पलायन कर गए और सबसे अपने-अपने अंचल में समाधि स्थल की मिट्टी गांठ में अवश्य बांधकर लाए थे। इसी समाधि स्थल के साथ ही स्थापित था एक विशाल मंदिर, जिसे क्षति पहुंचाने का निरंतर प्रयास होता रहा।

अब भारत, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका के 250 हिंदू श्रद्धालुओं का एक समूह इसी सप्ताह पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में एक सदी पुराने उस समाधि स्थल का दौरा करने वाला है, जिसमें पिछले साल एक कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी ने तोडफ़ोड़ जारी रखी हुई थी।

‘डॉन’ अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान हिंदू परिषद (पीएचसी) के निमंत्रण पर भारत, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और अमेरिका से बड़ी संख्या में हिंदू श्रद्धालु एक जनरल को पेशावर पहुंचेंगे और टेरी स्थित संत की समाधि का दर्शन करेंगे। पीएचसी के संरक्षक डॉ. रमेश कुमार वंकवानी ने बताया, ‘यह दूसरी बार है जब परिषद ने दूसरे देशों के हिंदू श्रद्धालुओं को आमंत्रित किया है ताकि वे खुद पाकिस्तान में एक सहिष्णु और बहुलवादी समाज के अस्तित्व को देख सकें।’

रिपोर्ट में कहा गया है कि परिषद ने पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस के सहयोग से कार्यक्रम की व्यवस्था की है। पिछले महीने भारत, कनाडा, सिंगापुर, आस्ट्रेलिया और स्पेन से 54 हिंदुओं ने देश का दौरा किया था। समूह का नेतृत्व परमहंस जी महाराज के पांचवें उत्तराधिकारी श्री सतगुरु जी महाराज ने किया।

बीते साल दिसंबर में जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम फजल (जेयूआई-एफ) के कुछ स्थानीय मौलवियों के नेतृत्व में एक हजार से अधिक लोगों ने ग्रामीणों की समाधि स्थ्ल को ध्वस्त करने के लिए उकसाया था और परिणामस्वरूप स्थानीय मदरसा के छात्रों के नेतृत्व में लोगों ने उस पर धावा बोल दिया। 

पाकिस्तान के प्रधान न्यायाधीश के आदेश पर धर्मस्थल का जीर्णोद्धार कराया गया। शीर्ष अदालत ने अक्तूबर 2021 में खैबर पख्तूनख्वा प्रांतीय सरकार को सभी पुराने समाधि स्थल में तोडफ़ोड़ करने में शामिल दोषियों से 3.3 करोड़ रुपए (194161 अमेरिकी डॉलर) की वसूली करने का भी आदेश दिया था। 1997 में तीर्थस्थल पर पहली बार हमला किया गया था जिसमें यह स्थान बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया था। पीएचसी प्रमुख वंकवारी ने 2015 में शीर्ष अदालत का रुख किया था और धर्मस्थल के जीर्णोद्धार तथा वहां वार्षिक तीर्थयात्रा को फिर से शुरू कराए जाने का अनुरोध किया था।

75 बरस बीत गए न$फरत की $फसल उगाते हुए। अब यह सिलसिला थमना चाहिए। भारत में बाबरी-प्रकरण को छोड़ शेष सभी स्थानों पर अल्पसंख्यकों को अपनी धार्मिक आस्थाओं के अनुसार जीने का अधिकार है। गरीब नवाज़ का अजमेर शरीफ हो या दिल्ली की दरगाहें, सब का एहतराम हो रहा है। बाबरी ध्वंस की नौबत भी राज जन्म भूमि के कारण आई। यह भी एक अल्पसंख्यक-सम्मान का ही तकाज़ा है कि हमारी संसद में हर बार ईसाई धर्म से भी एक सदस्य का मनोनयन होता है।

अभी भी पाकिस्तान में कटासराज, शारदा पीठ, वरुण देव मंदिर या हिंगलाज मां के दरबार पर जाने की पुरानी छूट बहाल नहीं हुई। तक्षशिला क्षेत्र में प्राचीन संस्कृति विलाप की मुद्रा है। दो सौ से अधिक बौद्ध प्रतिमाएं ध्वस्त हैं। चाणक्य, पाणिनी की जन्मस्थली होने के इलावा एक लम्बी चौड़ी सांझी विरासत है मोहेन्जोदाड़ो और हड़प्पा की।

यूनेस्को के माध्यम से भारत और पाकिस्तान के बीच इन धर्म एवं पुरातत्व स्थलियों को लेकर किसी ‘प्रोटोकॉल’ की रूपरेखा संभव है। दुविधा यही है कि पहल कौन करे। वैसे भारत की ओर से चाहे वाजपेयी-बस यात्रा हो या नवाज़ शरी$फ के पारिवारिक समारोह में वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी की आकस्मिक यात्रा या फिर करतारपुर साहब-कॉरिडोर का मामला, पहलकदमियां हो चुकी हैं। उधर से ताली बजाने वाले हाथ में अभी भी हथियार हैं। हथियारों को हाथ में थामे, दोस्ती की थालियां कैसे बजेंगी। हम लोग सिंधु जलसंधि का नवीकरण तो कर लेते हैं पर बेहतर व सुखी जि़न्द$गी के पन्ने क्यों नहीं लिखते? कैसे होगा, पता नहीं, मगर होगा अवश्य। होगा इसलिए है कि संस्कृति, अदब, कला व विरासत में सांझेदारी है। यह सांझेदारी कुछ समय के लिए टाली तो जा सकती है, मगर संभावनाएं हैं कि नई नस्लें इस सांझी विरासत का मर्म समझेंगी और अपनी पिछली पीढ़ी यानी हमारी पीढ़ी पर हंसेंगी कि आखिर किस दम्भ के कारण हम लोग इतराते रहे 75 बरस तक।

खैबर पख्तूनख्वा इलाके में करीब छह हजार ऐतिहासिक स्थल हैं। उनमें से दो हजार तो गांधार सभ्यता से जुड़े हैं लेकिन कइयों का अब नामोनिशान नहीं बचा है तो कई जगहों पर लोगों ने कब्जा कर लिया है।

दरअसल, पाकिस्तानी हुक्मरानों ने अपनी आबादी के एक बड़े हिस्से को कट्टरता के ऐसे कुएं में धकेल रखा है कि वे ऐसी हरकतों को मजहब की आड़ में जायज बताने लगते हंै। ऐसे लोगों को पता ही नहीं है कि इस्लाम के आगमन से हजारों साल पहले की सिंधु घाटी सभ्यता और बौद्ध काल की क्या अहमियत है। पाकिस्तानी किताबों में इतिहास कुछ इस तरह पेश किया गया है, मानो वह 712 ईस्वी के आसपास शुरू हुआ, जब मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध के राजा दाहिर को हराया।

 इसके चलते पाकिस्तान की एक बड़ी आबादी को अपनी समृद्ध विरासत की जानकारी नहीं है। उन्हें नहीं पता कि वहां आज के पंजाब इलाके में ही राजा पोरस का जन्म हुआ था जिससे टकराकर सिकंदर की सेना का हौसला डावांडोल हो गया था। पोरस का साम्राज्य झेलम और चेनाब नदियों के बीच के दोआब में ही था। पोरस और सिकंदर का यह युद्ध ईसा पूर्व 326 ईस्वी में हुआ। यानी इस्लाम के आगमन के लगभग नौ सौ साल पहले। पाकिस्तानी जब पोरस को अपना हीरो मानने से इनकार कर चुके हैं तो चाणक्य को क्या तवज्जो देंगे, जिनका जन्म तक्षशिला में हुआ। वहीं उनकी पढ़ाई-लिखाई हुई। चाणक्य का पूरा जीवन भी इस्लाम के आगमन से पहले का है।


साभार: डॉ. चन्द्र त्रिखा

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