सावधान: आसान नहीं हैं आने वाले दिन
हमारे देश में कुछ भी सामान्य तौर-तरीके से नहीं होता। जब असमंजस हो तो हम सिक्के उछालकर निर्णय करते हैं। मगर उसमें भी गुंजाइश रखते हैं। सिक्के के दोनों पहलुओं पर दावेदारी हमारी ही होती है। ‘चित भी मेरा, पट भी मेरा, अंटा मेरे बाबा का।’ इसी को पंजाबी बोली में ‘हैड-चेन’ कह देते हैं। मोदी यदि फिरोज़पुर में रैली कर जाते, करोड़ों की योजनाएं पंजाब को दे जाते तो भी चन्नी साहब या सिद्धू जैसे महारथी खामोश नहीं बैठते। वे ढंग से नाचना नहीं जानते, इसलिए ‘आंगन’ को टेढ़ा बताने के इलावा उनके पास कोई चारा नहीं होता। वे प्रधानमंत्री की घोषणाओं को चुनावी दहलीज पर ‘लॉलीपॉप’ बांटने की संज्ञा दे देते। कुछ भी हो जाता वे प्रधानमंत्री के प्रति आभार व्यक्त नहीं करते। उनके लिए कृतज्ञता-ज्ञापन या प्रशंसा के दो शब्दों का उच्चारण कड़ी मशक्कत वाला काम होता।
‘सुरक्षा-चक्र’ में सेंध के परिणाम हमारा देश तीन बार भुगत चुका है। गांधी-हत्या के समय, इन्दिरा-हत्याकांड के समय, राजीव-हत्याकांड के समय। मगर सबक सीखने का तौर तरीका हमारी जीवनशैली का हिस्सा नहीं है। हमें सिर्फ आरोपों-प्रत्यारोपों को उछालने की कला आती है।
एक पल के लिए मान भी लें कि फिरोज़पुर-प्रकरण में षड्यंत्र के सूत्र भी नहीं मिले तो भी यह तो तय है कि सुरक्षा चक्र में सेंध लगी। यह भी स्पष्ट है कि परम्परागत रूप में राज्य के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री की यात्रा के मध्य राजनैतिक मतभेद एक तरफ रख कर देश के प्रधानमंत्री की अगवानी करनी होती है। मगर मुख्यमंत्री ने इतना कर्तव्य भी नहीं निभाया। डीजीपी वहां नहीं थे। मुख्य सचिव नहीं थे। हर कोई ‘सुरक्षा तंत्र में सेंध’ की गवाही से भी कतरा रहा था। यह स्थिति सुखद नहीं है। आने वाले 40-45 दिन में पंजाब, उत्तरप्रदेश व तीन अन्य प्रदेशों में चुनावी बुखार चरम पर होगा। हमारे यहां यह भी माना जाता है कि युद्ध, पे्रम और चुनावों में सब कुछ जायज़ है।
यह तय है कि चुनावों के समय पंजाब के कुछ कांग्रेस नेता यूपी भी जाएंगे, उत्तराखंड भी जाएंगे। वहां से भाजपा के नेता पंजाब भी आएंगे। अभी चुनावों की सूचनाएं जारी नहीं हुई और अभी से ज़हर उगलने का सिलसिला ज़ोरों पर शुरू है। यह भी एक दुखद पहलू है कि हमारे देश में पारस्परिक सम्मान और सौहार्द इस समय तार-तार है। सिरफिरे लोग हर जगह हैं। पंजाब में भी हैं, यूपी में भी हंै और उन तीनों अन्य प्रदेशों में भी हैं, जहां चुनाव होंगे। सभ्य भाषा तो हम कब की भूल चुके, अब सामाजिक व सियासी सौहार्द की धज्जियां भी उड़ाई जा सकती हैं। यूपी व पंजाब में चुनावों के दिनों में कोई भी अप्रिय घटना कहीं भी हो सकती है। ऐसे अति-संवेदनशील व ज्वलनशील माहौल में क्या कोई भी चुनावी सभा या प्रचार शांतिपूर्ण ढंग से हो पाएगा?
यदि चुनाव स्थगित नहीं होते तो रैलियों पर पूरी पाबंदी लगानी होगी। जब पूरी जि़ंदगी ‘ऑनलाइन’ उपायों पर टिकी है तो ज़हर उगलने पर कड़े प्रतिबंध क्यों नहीं लग सकते? यदि रैलियां हुईं तो पूरी-पूरी आशंका है कि हिंसा हो सकती है। पंजाब ने पूरे दो दशक तक यह हिंसा झेली है और अभी भी ज़ख्म भरे नहीं। यूपी में भी सभी जानते हैं कि सत्ता के गलियारे में कब्ज़ा करने के लिए जमकर धक्कमपेल होगी। संसाधन सभी के पास हैं। पैसा भी है, तमंचे भी और पेशेवर अपराध-तंत्र भी। ऐसे तनाव में विकास की बातें कैसे होंगी? लोकतांत्रिक मर्यादाओं की रक्षा कैसे होगी? ये सब मसले गंभीर हैं और इन पर तात्कालिक कार्यवाही, न्यायपालिका भी करेगी, सुरक्षा एजेंसियां भी ‘प्रोफैशनल’ प्रशासनिक अधिकारी भी।
पंजाब विशेष रूप में सीमावर्ती इलाका है। जहां से प्रधानमंत्री को लौटना पड़ा, वहां से भारत-पाक सीमा भी कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सीमा पार आतंकी घुसपैठ की आशंकाएं सदा बनी रहती हैं। यह कुल ‘रूट’ 40 किलोमीटर का ही था। पाक-सीमा मात्र 18-20 किलोमीटर की दूरी पर। ड्रोन-हमले की भी ज़द में था यह सारा क्षेत्र। वैसे भी अब विस्$फोटक-सामग्री सीमा पर मौजूद व तैनात रहती है।
गंभीर संकट था। टल गया। यदि एसपीजी ने तात्कालिक निर्णय न लिया होता तो शायद खतरे बने रहते। इस बारे में पूर्व आईबी प्रमुख अरुण भगत का विश्लेषण सटीक है कि प्रधानमंत्री की यात्राओं से पहले आमतौर पर चार-पांच दिन पहले एक बैठक होती है जिसमें एसपीजी के साथ राज्य सरकार से संबंधित आला अधिकारी मौजूद होते हैं। बैठक में राज्य की खुफिया एजेंसी, प्रभारी डीआईजी के साथ-साथ उन जिलों के डीएम और एसपी भी होते हैं, जहां से होकर प्रधानमंत्री को गुजरना है या जहां प्रधानमंत्री को जाना है। विस्तार से सब अधिकारी मिलकर कार्यक्रम बनाते हैं। तमाम आशंकाओं को देखते हैं कि क्या-क्या चुनौती आ सकती है? कहां-कहां कैसी-कैसी रुकावट आ सकती है? क्या किसी राजनीतिक आंदोलन या प्रदर्शन से कोई खतरा है या किसी तरह का व्यक्तिगत जोखिम है? स्थानीय हालात को देखते हुए पूरा अध्ययन किया जाता है। अगर प्र्रधानमंत्री को किसी सीमा के करीब या किसी उपद्रवग्रस्त इलाके में जाना है तो वहां पहले से ही सक्रिय उग्र या आतंकी संगठनों पर कड़ी निगाह रखी जाती है। ऐसी बैठकों के मिनट्स रिकॉर्ड किए जाते हैं और जितने भी अधिकारी वहां होते हैं, उनकी मौजूदगी व मत को दर्ज किया जाता है। रिकॉर्ड की कॉपी वहां मौजूद तमाम एजेंसियों को सौंपी जाती है। यह बड़ी आजमाई हुई चाक-चौबंद व्यवस्था है।’
अभी पंजाब में जो हुआ है, कोई शक ही नहीं है कि यह राज्य सरकार की लापरवाही ही नहीं, व्यापक लापरवाही है। प्रधानमंत्री को कहीं जाना होता है तो उनका वैकल्पिक रूट या पथ भी पहले से बन जाता है। मौसम संबंधी जानकारी भी पहले ही मिल जाती है। अगर प्रधानमंत्री अचानक हवाई मार्ग से नहीं जाएंगे तो फिर यह पहले से ही तय रहता है कि किन सडक़ों से होकर निकलेंगे। पूरी घटना आने वाले कल के लिए पूर्णतया जागरूक रहने की चेतावनी है।
साभार: डॉ. चन्द्र त्रिखा
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