ज्वार-बाजरा: बढ़ रहा है मोटे अनाज का चलन
खेती-किसानी के जानकार बीते कुछ सालों से यह करते आए हैं। बीते कुछ सालों में कई ऐसी फसलें खेतों में और ऐसा खाना प्लेटों में लौट आया है जिन्हें कुछ वक्त पहले तक बिल्कुल भुला दिया गया था।
इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी एरिड ट्रॉपिक्स की डायरेक्टर जनरल डॉ. जैकलीन हॉग्स के अनुसार, मोटे अनाज को खेत में और प्लेट में वापस लाने के लिए और इस पर लगे ‘भूली हुई फसल’ के टैग को हटाने के लिए ठोस वैश्विक प्रयास की जरूरत है। साल 2018 को भारत में ‘ईयर ऑफ मिलेट्स’ के रूप में मनाया गया। इसके अलावा भारत के प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए संयुक्त राष्ट्र ने साल 2023 को ‘इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स’ के रूप में मनाने का फैसला किया है। रिपोट्र्स के मुताबिक, इस साल लोगों को मोटे अनाज से होने वाले स्वास्थ्य लाभ के बारे में जागरुक किया जाएगा। साथ ही खेती के लिए उनकी उपयोगिता के बारे में भी लोगों को बताया जाएगा।
मोटे अनाज खऱाब मिट्टी में भी उपज सकते हैं और उन्हें तुलनात्मक रूप से कीटनाशक की भी उतनी ज़रूरत नहीं होती है। डॉ. हॉग्स के मुताबिक, मोटे अनाज तेज़ी से चलन में लौट रहे हैं। इन्हें स्मार्ट फ़ूड के तौर पर पहचाना जा रहा है क्योंकि वे धरती के लिए, किसानों के लिए और आपकी सेहत के लिए अच्छे हैं। इन्हें बहुत अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती है और ये अधिक तापमान में आसानी से बढ़ते हैं। ये फसल किसानों के लिए अच्छी है क्योंकि इनकी पैदावार दूसरी फसलों की तुलना में आसान है और साथ ही ये कीट-पतंगों से होने वाले रोगों से भी बचे रहते हैं। मोटे अनाज स्वास्थ्य के लिए अच्छे हैं क्योंकि इनमें पौष्टिक तत्व अधिक मात्रा में होते हैं। अध्ययनों के मुताबिक, बाजरे से मधुमेह को नियंत्रित करने में मदद मिलती है और कोलेस्ट्रॉल लेवल में सुधार होता है। ये कैल्शियमए जि़ंक और आयरन की कमी को दूर करता है। और सबसे ज़रूरी बात यह कि यह ग्लूटेन-फ्री होता है।
इस बात में अचरज नहीं है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ मोटे अनाजों को लेकर दिलचस्पी दिखा रहे हैं। भारत में करीब 8 करोड़ डायबिटीज़ के मरीज़ हैं। हर साल कऱीब 1.7 करोड़ लोग हृदय रोग के कारण दम तोड़ देते हैं और देश में 33 लाख से अधिक बच्चे कुपोषण का शिकार हैं जिनमें आधे से अधिक गंभीर रूप से कुपोषित हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने एक संबोधन में देश से कुपोषण को ख़त्म करने के लिए मिलेट रवोल्यूशन की बात कही थी। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए यह असंभव काम नहीं होगा क्योंकि सालों से मोटा अनाज भारतीयों के लिए भोजन का मुख्य स्रोत रहा है।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मिलेट रिसर्च के निदेशक विलास टोनपी के मुताबिक, मानव जाति को पुराने वक्त से जिन खाद्यान्नों के बारे में जानकारी रही है वो जौ और बाजरा जैसे मोटे अनाज हैं। वह कहते हैं, सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान भी बाजरे आदि की पैदावार होती थी। 21 राज्यों में इसकी खेती की जाती है और हर राज्य और क्षेत्र के अपने कि़स्म के अनाज हैं जो ना सिर्फ उनकी खाद्य संस्कृति का हिस्सा हैं बल्कि उनके धार्मिक अनुष्ठानों का भी हिस्सा हैं।
भारत प्रतिवर्ष कऱीब 1.4 करोड़ टन बाजरे की पैदावार करता है। इतना ही नहीं भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजरा उत्पादक देश भी है। विलास टोनपी के मुताबिक, लेकिन बीते 50 सालों में कृषि योग्य भूमि घटकर 3.8 करोड़ हेक्टेयर से 1.3 करोड़ हेक्टेयर ही रह गयी है और इसी के साथ 1960 के दशक में होने वाले बाजरे की पैदावार घटकर के मुक़ाबले आज पैदावार 6 फीसद पर आ गयी है। डॉक्टर टोनपी के अनुसार देश में बाजरे की पैदावार में गिरावट 1969-70 के समय में शुरू हुई थी।
विलास टोनपी बताते हैं, उस समय तक भारत खाद्य सहायता प्राप्त कर रहा था और अपनी एक बड़ी आबादी के पोषण के लिए अनाज का आयात करता था। खाद्य क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने के लिए और कुपोषण पर काबू पाने के लिए भारत में हरित क्रांति हुई और उसके परिणामस्वरूप चावल और गेंहूं की अधिक पैदावार वाली किस्मों को उगाया जाना शुरू किया गया।
भारत में 1960 और 2015 के बीच गेहूं का उत्पादन तीन गुना से भी अधिक हो गया और चावल के उत्पादन में 800 फीसदी की वृद्धि हुई लेकिन इस दौरान बाजरा जैसे मोटे अनाजों का उत्पादन कम ही बना रहा। डॉ. हॉग्स के अनुसार, बीते सालों में चावल और गेहूं की उपज बढ़ाने पर बहुत अधिक ज़ोर दिया गया और इस दौरान बाजरा और कई दूसरे पारंपरिक खाद्य की उपेक्षा हुई और जिसकी वजह से उनका उत्पादन प्रभावित हुआ। वह कहती हैं, इन्हें पकाना इतना आसान नहीं है और आज के समय में किसी के पास इतना वक्त भी नहीं है। दशकों से इनका बेहद कम इस्तेमाल किया जा रहा है। बाज़ार ने भी इनकी उपेक्षा ही की है लेकिन आपको ये जानना चाहिए कि आपकी प्लेट में अलग-अलग स्वाद और अलग-अलग तरह के पोषक तत्वों होना बहुत ज़रूरी है। ऐसा करने के लिए जिन फसलों को भुला दिया गया उन पर भी चावल-गेहूं और दूसरी व्यवसायिक फसलों की तरह ही ध्यान देना होगा। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं ज्वार-बाजरा अब धीरे-धीरे चलन में लौट रहे हैं।
बाजरे की मांग बढ़ाने की कोशिशें
कृषि वैज्ञानिकों इन मोटे अनाज को दोबारा से चलन में लाने के लिए कई तरह के उपाय सुझाए थे और उनकी सुझाए रणनीति के परिणाम भी अब दिखने भी लगे हैं। डॉ. टोनपी के अनुसार, पिछले दो सालों में बाजरे की मांग में 146 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गयी है। मोटे अनाज जैसे बाजरा आदि से बने कुकीज, चिप्स, पफ और दूसरी चीज़ें सुपरमार्केट और ऑनलाइन स्टोर्स में बेचे जा रहे हैं।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से लाखों लोगों को एक रुपये प्रति किलो की दर से बाजरा और मोटा अनाज दिया जा रहा है। कुछ राज्यों में दोपहर के खाने में में भी इन मोटे अनाजों से बने व्यंजन परोसे जा रहे हैं। मोटे अनाज के लिए लोगों में बढ़ा दिलचस्पी तेलंगाना राज्य के आदिवासियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।
साभार: मीडिया
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