अभिमन्युपुर से बना अमीन

 

अभिमन्युपुर से बना अमीन

हरियाणा के पुरातात्विक महत्व को लेकर अमीन भी चर्चा में रहा है। जिला कुरुक्षेत्र के इस कस्बे का पुराना नाम अभिमन्युपुर बताया जाता है। यह स्थल कुरुक्षेत्र से केवल 8 किलोमीटर की दूरी पर है। कस्बे में सबसे ऊंचे स्थल पर एक किला है जिसके बारे में किवदंती यही है कि यह किला महाभारत के बहुचर्चित पात्र एवं अर्जुन पुत्र अभिमन्यु के लिए बनाया गया है। किवदंतियां व लोकगीत इस बात की भी उल्लेख करते हैं कि महाभारत युद्ध के अंतिम चरण में पांडव सेनाओं का पड़ाव यही क्षेत्र था। अमीन में मुख्य रूप रोड़ व ब्राह्मण जातियों का बाहुल्य है। रोड़ अपनी वंश परम्परा को पृथ्वीराज चौहान से जोड़ते हैं जबकि ब्राह्मण अपने कुल गोत्र पाराशर और वत्स मानते हैं। सन् 1947 में भारत-पाक विभाजन के समय भी अनेक शरणार्थी इसी गांव में बस गए थे।

वैसे इस गांव को भी तीर्थस्थल का दर्जा प्राप्त है। यहां के सूर्यकुण्ड के विषय में प्रचलित मान्यता यही है कि माता अदिति ने इसी स्थल पर सूर्यदेव को जन्म दिया था। पौराणिक आख्यानों में दिए विवरण के अनुसार इसी क्षेत्र में 86 हज़ार ऋषि-मुनियों ने घोर तप किया था जिसके पुण्य फल स्वरूप इस क्षेत्र के अधिकांश परिवार अपने दिवंगत सगे संबंधियों के अस्तिकलश यहीं के ‘पावन’ सरोवर में प्रवाहित कर देते हैं जबकि सामान्य रूप से अस्थि प्रवाह हरिद्वार में ही किया जाता है। यह भी मान्यता है कि अमीन के सरोवर में गर्भवती स्त्रियां यदि स्नान कर लेती हैं तो उनकी संतान ऊर्जावान एवं शक्तिशाली ही होंगी। पहले पहल यह मान्यता भी थी कि गर्भवती स्त्री यदि यहां स्नान कर ले कि उसे सूर्य के समान तेजस्वी पुत्र प्राप्त होगा। ज़ाहिर है ऐसी मान्यताएं जनश्रुतियों पर आधारित होती हैं जो काला-बदलाव के साथ-साथ अपना महत्व भी खो देती है।

अभिमन्यु किले से थोड़ी ही दूरी पर एक और टीला है जिसे ‘चक्रव्यूह’ का षड्यंत्र स्थल माना जाता है। किवदंती एवं जनश्रुति यही है कि इसी स्थल पर महाभारत युद्ध के कौरव-यौद्धा जयद्रथ ने अभिमन्यु पर अंतिम मारक प्रहार किया था और अगले ही दिन इसी स्थल पर उसे लाकर अर्जुन ने जयद्रथ-वध किया था। सूर्यकुण्ड वाला टीला उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर लगभग दो हज़ार फीट लम्बा है और लगभग 800 फीट चौड़ा है। इसकी ऊंचाई भी 20 से 30 फीट तक आंकी जाती है। कुछ वर्ष पूर्व कुछ बाहरी लोगों ने रात्रि के अंधेरे में यहां अवैध रूप से खनन भी किया था। कहा जाता है कि उन्हें यहां से कुछ पुराने सिक्के भी मिले थे। अगले दिन तत्कालीन प्रशासन-तंत्र से शिकायतें भी दर्ज कराईं गईं लेकिन जब प्रशासन ने कोई दिलचस्पी नहीं ली तो गांव वालों ने अपनी ओर से इस धरोहर की रक्षा के लिए समितियां बनाईं और अब भी बाहर से आने वाले अनाधिकृत लोगों पर कड़ी नज़र रखी जाती है। 

मेवात: शास्त्रीय संगीत में मेवाती घराने की अपनी विशिष्ट पहचान 

उत्तर पूर्व भारत के हरियाणा व राजस्थान राज्यों का एक महत्वपूर्ण अंग है मेवात। इस क्षेत्र में हरियाणा के नूंह, पलवल जिले व राजस्थान के जिला अलवर व भरतपुर के इलाके आते हैं। प्राप्त ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार मेवात की स्थापना 5वीं शताब्दी में हुई थी। वैसे इसे प्राचीन मत्स्य साम्राज्य से भी जोड़ा जाता है। यहां की संस्कृति व बोली हरियाणवी व राजस्थानी बोली का एक मिश्रित या स्वरूप है लेकिन उसकी एक अलग पहचान भी है। शास्त्रीय संगीत में मेवाती घराना अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। इस क्षेत्र के हसन खां मेवाती को एक वीर पुरुष के रूप में इस क्षेत्र का महानायक माना जाता है। वर्ष 1527 में हसन खान ने बाबर के विरुद्ध युद्ध लड़ा था। मुगल शासन में मेवात राजपूतों के आधिपत्य में अ गया था।

मेवात का नामकरण मत्स्य साम्राज्य से भी कुछ लोग जोड़ते हैं लेकिन मान्यता यही है कि इसका नामकरण मेव-मुस्लिमों के नाम से ही हुआ। मेव मुस्लिम वस्तुत: 13वीं शताब्दी में सू$िफयों के प्रभाव में हिन्दू से मुस्लिम बने और बाद में अलाउद्दीन खिलजी ने भी धर्मांतरण में प्रमुख भूमिका निभाई थी। मेव-संस्कृति दरअसल अपना वैशिष्ट्य कई अर्थों में बनाए हुए हैं। अब भी मेवों में कुछ हिन्दू क्षत्रिय गोत्रों का चलन है। मेव प्रकृति एवं स्वभाव में विद्रोह का पुट बना रहा है और दिल्ली के शासकों के साथ उनका टकराव प्राय: चलता रहा है। मेव समुदाय समग्र रूप से 52 गोत्रों व 13 पालों में बंटा हुआ है। इनमें से मीरासी गायक अपने मौखिक लोक-इतिहास की अलग पहचान रखते हैं।

हरियाणा का मुख्य मेवाती नगर नूंह राष्ट्रीय राजमार्ग 248ए अर्थात दिल्ली-अलवर हाईवे पर स्थित है। यह गुडग़ांव से लगभग 45 किलामीटर की दूरी पर है। यहां की पुरानी इमारतों मसलन ‘मूसा की मज़ार’ की निर्माण कला पर राजपूती व मुस्लिम दोनों के स्थापत्य का प्रभाव है। इस जि़ला नूंह में नगीना, तावड़ू, पुन्हाना और $िफरोज़पुर झिरका के शहर व लगभग 431 गांव शामिल हैं। इसका कुल क्षेत्रफल 1499 वर्ग किलोमीटर है और आबादी लगभग 11 लाख है।

मेवाती क्षेत्र का दूसरा जिला पलवल है जिसमें हथीन सब-डिविजन शामिल है। मेवाती लोग स्वयं को क्षत्रिय मानते हैं। अब भी कई सीधे सादे मुस्लिम मेवातियों के घरों में गणेश की प्रतिमा भी देखने को मिल जाती है। हालांकि वे रोज़े भी रखते हैं। यहां की आर्थिकता मुख्य रूप से कृषि पर ही आधारित है और पशु पालन भी मुख्य व्यवसायों में शामिल है।

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