हरियाणा की सभ्यता-गतांक से आगे...
इस विषय पर प्रदेश के प्रख्यात छायाकार एवं लेखक-पत्रकार राजकिशन नैन ने भी विशेष शोध किया है। हरियाणा-संवाद में वर्ष 2007 में प्रकाशित एक शोधपरक आलेख में ‘नैन’ बताते हैं देश के अन्य अंचलों की भांति हरियाणवी अंचल के स्त्री-पुरुषों ने भी आत्मोन्नति की खातिर बुद्ध की शरण ली। बुद्ध ने शांत भाव से यहां के निवासियों को प्रवज्या देते हुए कहा- तो आर्यो, मेरे साथ-साथ इस प्रकार कहो-
बुद्धं सरणं गच्छामि।
सब-बुद्धं सरणं गच्छामि।
संघं सरणं गच्छामि।
सब-संघं सरणं गच्छामि।
धन्मं सरणं गच्छामि।
सब-धम्मं सरणं गच्छामि।
उपस्थित जनों ने पृथ्वी पर घुटने टेक कर उपर्युक्त पंक्तियों को दोहराया। यह सत् ज्ञान गौतम बुद्ध ने हरियाणावसियों को कुरुक्षेत्र में प्रदान किया था। ईसा से 600 वर्ष पूर्व कुरुक्षेत्र तत्कालीन सोलह महाजनपदों में से एक था तथा कुरु जनपद के नाम से प्रसिद्ध था। गौतम बुद्ध ने एक बार कुरु जनपद का भ्रमण किया था। इसका उल्लेख पाणिनी की अष्टाध्यायी में मिलता है। कुरुक्षेत्र में सम्राट अशोक द्वारा निर्मित बौद्धस्तूप के अवशेष आज भी दृष्टिगोचर हैं। इससे पता चलता है कि बौद्धों के लिए भी यह पवित्र धार्मिक स्थान था। चीनी यात्री ह्यून-त्सांग ने इस स्तूप का विशेष वर्णन किया है। उनके अनुसार इसमें तथागत की अस्थियों का एक अंश सुरक्षित था। अशोक ने यहां धर्म-महाराजाओं की नियुक्तियां कीं और अपने एक अभिलेख में इस संबंध में विशेष आदेश जारी किए। ईसा के जन्म से 249 वर्ष पूर्व अशोक ने देश के अनेक पवित्र स्थानों का भ्रमण किया था। इन सब स्थानों पर अशोक ने स्तूपों का निर्माण काया तथा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए विहार-चैत्य, संस्थाएं और पाठशालाएं खुलवाई। एक किंवदंती के अनुसार अशोक ने देशभर में 80 हजार स्तूपों का निर्माण कराया था। इन स्तूपों के अतिरिक्त अनेक नगरों, भवनों, सडक़ों, तालाबों तथा कुओं का निर्माण अलग से कराया। इनमें से सांची, सारनाथ, बखीरा और नवनगढ़ के स्तूप सर्वाधिक विख्यात हैं। बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अशोक ने दक्षिणी एशिया, पूर्वी यूरोप और उत्तरी अफ्रीका के प्रदेशों में अपने प्रतिनिधि भेजे। श्याम, लंका, तिब्बत, चीन, जापान एवं बर्मा में बौद्ध धर्म के प्रचार का मुख्य श्रेय अशोक को ही है। अशोक ने देश भर में 256 बार भ्रमण करके बौद्ध धर्म का प्रचार किया। अशोक के बाद कट्टर हिंदुओं के तीव्र विरोध के बावजूद एक हजार वर्ष तक बौद्ध धर्म का झंडा भारत और अन्य देशों में गड़ा रहा। पीले वस्त्र पहने बौद्ध भिक्षुओं की टोलियां ज्ञान और शांति का संदेश देकर देश-विदेश के कोने-कोने में जाती रहीं।
इनमें से कितने भिक्षु कितनी बार हरियाणवी अंचल में आए, इसका कोई प्रमाणिक ब्यौरा उपलब्ध नहीं है। पर हरियाणा में पुरानी बस्तियों व नगरों के खण्डहरों से बौद्ध काल की काफी सामग्री प्राप्त हुई है। चीनी यात्री ह्यून त्सांग ने अपनी पुस्तक में हरियाणा के सुघ नगर का जिक्र किया है। त्सांग लिखते हैं- ‘जगाधरी के पूर्व में सुघ नाम का एक बड़ा राज्य था। यह जमना नदी के दोनों ओर पसरा हुआ था। इसकी राजधानी जमना के पश्चिमी तट पर थी। उस समय सुघ में एक हजार बौद्ध भिक्षु रहते थे। नगर में साधुओं के रहने के पांच आश्रम थे। बुद्ध धर्म में इन्हें संघाराम कहते थे। यहां बौद्ध साधु पढऩे-पढ़ाने का काम करते थे। नगर में बौद्ध संतों की कई समाधियां भी थीं जिन्हें स्तूप कहते थे। ये मिट्टी, ईंट और पत्थर के बने ठोस स्मारक थे। इनके बीच में बौद्ध संतों की अस्थियां या फूल रखे जाते थे। लोग इन स्तूपों की परिक्रमा करते थे और इन्हें पूजते थे। किंवदंती है कि बहुत पहले महात्मा बुद्ध यहां आए थे। सुघ का वर्तमान स्तूप उनके सुघ आने की स्मृति में बनाया गया था। पुराने नगरों की खोज करते हुए कनिंघम भी सुघ पहुंचे थे। हरियाणा के माहिर पुरातत्वेत्ता डॉ. सूरजभान ने सुघ नगर की कहानी लिखी है। सुघ में स्तूप के खंडहर अभी भी हैं, पर गांववासी अपनी इस धरोहर को भुलाए बैठे हैं। पाणिनी की ‘अष्टाध्यायी’ में सुघ को ‘सुघ्न’ कहकर पुराना जाता है।’
सुघ के समीप ही चनेटी गांव बाद है। इस गांव में भी एक प्राचीन बौद्ध स्तूप विद्यमान है। यह समाधि नुमा स्मारक पक्की ईंटों द्वारा निर्मित है। इस गांव के नाम से यह बात प्रमाणित होती है कि पुरानी समय में यहां बौद्ध ‘चैत्य’ अवश्य रहे होंगे। चैत्य का अपभ्रंश ही चनेटी है। असंध का बौद्ध स्तूप भी भारी महत्व का है। लेकिन ग्रामवासियों की घोर लापरवाही के चलते इस स्तूप का ऊपरी और मध्य भाग बरसों पहले ढह चुका है। हरियाणा में असंध की भांति कुछ अन्य प्राचीन स्थलों पर भी स्तूपों की परंपरा रही होगी। पर वे तमाम काल के गाल में समा गए हैं। हथीन तथा भादसा नामक स्थलों पर बौद्ध स्तूप होने की पुष्टि बुजुर्ग करते हैं। लेकिन उनकी कोई पहचान अब शेष नहीं है।
गौतम बुद्ध की कुछ मूर्तियां भी हरियाणा में मिली हैं। बुद्ध की एक अतीव सुंदर प्रतिमा झज्जर से प्राप्त हुई थी जो कुषाण कालीन गांधार कला की द्योतक है। झज्जर के गुरुकुल में कुषाणकाल की कई मृणमूॢतयां सुरक्षित हैं, जिनका संबंध बौद्ध धर्म से है। आदिबद्री से प्राप्त अत्यन्त घिसी हुई कुछ मूर्तियों में से एक बुद्ध-सिर-गुप्तकालीन माना जाता है। आदिबद्री से ही पद्मासन बुद्ध एवं धर्मचक्र प्रवर्तनमुद्रा में बुद्ध की दुर्लभ मूर्ति मिली है। थानेसर से भी बुद्ध की मूर्ति मिली थी। रोहतक, सतकुंभा, सिरसा तथा सीवन में बुद्ध की मध्यकालीन प्रतिमाएं प्राप्त हुई थीं। लेकिन देश के अन्य अंचलों की भांति हरियाणवी अंचल की बेशकमती मूर्तियां ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी पानी के जहाजों में भर-भरकर लंदन ले गए। ब्रिटेन के विक्टोरिया एंड एल्बर्ट म्यूजिम के हाल नम्बर-47 बी के गांधार शैली में तीसरी शती ईस्वी में उत्कीर्ण वह पत्थर का फलक है, जिसमें महात्मा बुद्ध का महा परिनिर्वाण अंकित है। कलात्मकता की दृष्टि से यह मूर्ति विश्व में अपनी विशिष्ट पहचान रखती है।
फतेहाबाद और हिसार में खड़े अशोक कालीन स्तंभ इस बात को प्रमाणित करते हैं कि अपने शासन के दौरान अशोक सम्राट कुरु जनपद में आए होंगे। स्तंभ स्थापना के समय राजा की उपस्थिति अनिवार्य समझी जाती थी। कनिंघम का मत था कि फतेहाबाद और हिसार स्थित अशोक स्तंभ हांसी अथवा अग्रोहा से लाए गए होंगे जबकि देवेंद्र हांडा ने इनका संबंध ‘कुणाल’ गांव से बताया है। ज्ञात रहे कि अशोक के पुत्र कुणाल के नाम पर बसा कुणाल गांव फतेहाबाद से मात्र नौ मील दूर है। बाहरी लुटेरों द्वारा की गई क्रमिक लूट-खसूट के कारण इन स्तंभों को कल्पनातीत क्षति पहुंची। मुस्लिम बादशाहों ने भी इन स्तंभों के साथ मनमाने तरीके से छेडख़ानी की। इन स्तंभों पर उत्कीर्ण मूल साक्ष्यों को मिटाकर उन्होंने इन पर कुरान की आयतें खुदवाई ताकि भारत की भावी पीढिय़ां अपने गौरवपूर्ण अतीत का परिचय न पा सकें। इन दोनों स्तंभों में सक अब कोई भी सम्पूर्ण दशा में नहीं है। अत्यधिक घिस-पिट जाने के बाद भी मौर्यकालीन कला की छान इन पर स्पष्ट दिखाई पड़ती है। स्तंभों को ध्यान से देखने पर मालूम होता है कि इस जगह स्थापित होने से पहले ये कहीं अन्यत्र प्रतिष्ठित थे। बौद्ध धर्म के पतन के कारण भी बुद्ध से संबंधित स्मारकों का काफी नुकसान हुआ। विदेशी आक्रमण बौद्ध धर्म के पतन का एक प्रमुख कारण था। बुद्ध को भगवान का अवतार घोषित करने के बाद उनकी महिमा प्राय: नष्ट सी हो गई, क्योंकि राम और कृष्ण की श्रेणी में उनका स्थान नगण्य-सा हो गया। पर बौद्ध धर्म की प्राय: सभी श्रेष्ठ चीजों को हिंदुओं ने अपना लिया। बुद्ध अपने श्रेष्ठ आचरण और उच्च कद के कारण आज भी हमारे बीच हैं।
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