'दी कश्मीर -फाइल्स' पहले सात दिन में ही ११० करोड़ रुपए कमा चुकी है। अनुमान है कि अगले कुछ सप्ताहों में यह ऐसा कीर्तिमान बना लेगी जो शायद निकट भविष्य में भी कोई फल्म न बना पाए।
इसी कश्मीर और आतंकवाद पर आधारित नूरी (१९९५), 'बेमिसाल' (१९८२), 'रोज़ा' (१९९२), 'माचिस' (१९९५), 'मिशन कश्मीर' (२०००), 'हामिद' (२००९), 'हैदर' (२०१९) आदि फल्में भी बनी। अब मांग उठ रही है १९८४ के सिख दंगों पर भी फल्म बने। 'विभाजन का म्यूजि़यम' अमृतसर में बन ही चुका है।
'दी कश्मीर फाइल्स' देश के सैकड़ों सिनेमाघरों में चल रही है। देखने वालों में देश के प्रधानमंत्री भी हैं, राज्यों के मुख्य मंत्री भी, बड़े-बड़े विचारक भी, वामपंथी भी और दक्षिणपंथी भी, सभी देख रहे हैं। टीवी चैनलों पर निरंतर बहस और 'हल्ला बोल', 'शंखनाद' सरीखे विचारोत्तेजक बहस-मुबाहसों की भरमार है। निरंतर नफरत, हिकारत और उत्तेजना फैलाने वाले कार्यक्रमों से हम भी चिपकते हैं बिल्कुल वैसे ही जैसे युवा लोग 'जिम' में जाते हैं।
कश्मीरी पंडितों पर जो कहर टूटा था वह सबको मालूम है। उनके शिविर जम्मू व अन्य स्थानों पर अभी भी जारी हैं। उपन्यास, कहानियां, किस्से सब छप चुके हैं और कमोबेश उन सब ने पढ़ भी लिए हैं, जिन्हें इस त्रास्दी के कारणों के भीतर झांकना है।
मगर अब परिवेश बदल चुका है। इतना कुछ पढऩे, सुनने व देखने के बाद भी एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिसे इस सारे प्रकरण में साम्प्रदायिकता, न$फरत फैलाने की राजनीति और देश को दो वर्गों में बांटने की साजि़श दिखाई देती है।
अब किसी भी मुद्दे पर गंभीर बहस की कोई गुंजाइश नहीं बची। यानि घाव, क्रंदन, लाशें व उजडऩे-बसने की पीड़ादायी दास्तानें उन्हें 'प्रायोजित' लगती हैं। कैसे लोग हैं हमारे अपने ही देश में, जो आइना देखने व दिखाने में भी किसी साजि़श को ढूंढ रहे हैं?
यह सिलसिला पंजाब ने भी भोगा है, जिया है, शायद कश्मीर से भी थोड़ा ज़्यादा। मगर यहां ऑपरेशन ब्लूस्टार, १९८४ के दंगे, पत्रकारों, लेखकों, कवियों की व्यापक पैमाने पर मारकाट व हत्याओं के बाजवूद यदि अभी भी सामाजिक तानाबाना एक है तो उसका कारण सांझी विरासत का मर्म है। यह मर्म हमारे ज़ेहनों में रचा बसा है। किसी मोड़ पर अलगाव की बात कुनमुनाती है तो कभी बाबा $फरीद, तो कभी बाबा गुरु नानक देव और कभी कबीर-तुलसी आ जाते हैं हमें सांझी विरासत याद कराने के लिए।
कश्मीर में राजतरंगिनी, पंचतंत्र और शैव दर्शन की सैकड़ों मीमांसाओं ने इस वीभत्स नरसंहार व अमानुषिक घटनाओं को होने कैसे दिया? सरकारी तंत्रों व सियासी शिविरों के लिए ये सब नाम अजाने या अटपटे हो सकते हैं, मगर इतने बरस तक हम लोगों ने कभी इस मामले को पूरी गंभीरता से उठाया ही नहीं। यहां संवेदनहीनता का आरोप तो उन पर भी है जो आज जागे हैं। चलिए माना जब भी जागें, तभी सुबह। अब तो तात्कालिक रूप में इस समस्या का कोई ठोस समाधान निकालना चाहिए। 'शरणार्थी-शिविरों' को 'म्यूजि़यम' में भी नहीं बदला जा सकता।
एक बात और भी हमें अपने ज़ेहन में बैठानी होगी कि विस्थापित लोग न तो 'बेचारे' होते हैं न ही 'रहम की भीख मांगने वाले।' भारत-पाक विभाजन के समय लगभग डेढ़ करोड़ उजड़े थे और १० से १५ लाख मरे थे। बलात्कार, लूट, मार, नृशंसता तब भी चरम पर थी। मगर जब जूझे तो सारे घाव स्वयं ही भर लिए। यह भी एक हकीकत है कि भारत-पाक विभाजन के मध्य विस्थापित हुए डेढ़ करोड़ लोगों में कोई आतंकवादी नहीं बना। कश्मीरी पंडितों की पीड़ा भी आतंकवाद में नहीं बदली। वे जूझे और स$फल रहे।
अब थोड़ा अतीत में झांक लें। उस एक रात के अंधेरे में हज़ारों की संख्या में परिवारों को छिपते-छिपाते अपना घर बार छोडऩा पड़ा था। परिवारों के सदस्यों को यह भी हिदायत की थी कि वे ज़ोर से न तो रोएं, न ही चीखें। दहशत की यह दस्तक सितम्बर, १९८९ में बिछी थी जिस दिन कश्मीरी पंडित एवं राजनैतिक विश्लेषक टीका लाल की उसके घर से बाहर ही हत्या की गई थी। थोड़ा विरोध का स्वर मुख हुआ तो जनवरी, १९९० में सैकड़ों मार दिए गए थे।
१९ जनवरी, १९९० की घटनाएं अधिक पीड़ादायी थी। उस दिन मस्जिदों से घोषणाएं भी की गई थी 'सभी कश्मीरी पंडितकाफिर हैं। सभी मर्द कश्मीरी पंडित कश्मीर छोड़ जाए या मौत के लिए तैयार हो जाएं।' कश्मीरी मुस्लिमों को भी हिदायत दी गई थी कि वे अपना पसंदीदा मकान चुन लें या निशानदेही कर लें ताकि उन्हें 'पंडितों के पलायन के बाद वे मकान रहने को मिल सकें।'
आंकड़े अलग-अलग हैं, मगर सर्र्व स्वीकार्य आंकड़ा यही है कि पलायन से पहले उनकी संख्या लगभग दो लाख थी जिनमें से लगभग एक लाख ९ हज़ार लोगों ने पलायन किया था। इससे पूर्व इनके परिवारों की औरतों के अपहरण व बलात्कारों के बाद हत्याओं की खबरें भी निरंतर आ रही थीं।
जम्मू में अभी भी पिछले ३० बरस से रहने वाले अनेक शरणार्थी गवाह हैं उस भीषण नरसंहार के। वर्ष २०१० में जम्मू कश्मीर की सरकार द्वारा की गई जांच में तथ्य उभरा कि अभी भी ८०८ परिवार, जिनकी जनसंख्या ३४४८ है, घाटी में ही टिके हुए हैं लेकिन वे भयग्रस्त भी हैं और आशंकाग्रस्त भी।
वर्ष १९९० से वर्ष २०११ की अवधि के मध्य हिंसा में मरने वालों की संख्या ३९९ बताई गई थी। सरकारी आश्वासनों के बावजूद शरणार्थी वापिस नहीं लौट पा रहे। वर्ष २०१६ तक १८०० युवक हिम्मत जुटा कर लौटे थे। केंद्रीय आश्वासन और वित्तीय मदद के मद्देनज़र वे लौट पाए थे, मगर धमकियों का सिलसिला थम नहीं पा रहा था। उन्हें अब भी वह सम्पत्ति वापिस नहीं मिल पा रही जिन पर १९९० में मुस्लिम परिवारों ने कब्ज़े कर लिए थे।
इन उजड़े हुए लोगों की व्यथा-कथा के बयान और उनके हितों की रक्षा के लिए अनेकों संगठन भी गठित हुए हैं लेकिन इनमें 'पनुन कश्मीर' और 'कश्मीर समिति' प्रमुख हैं। 'पनुन-कश्मीर' के प्रवक्ताओं के अनुसार, भारत के विभाजन के तुरंत बाद ही कश्मीर पर पाकिस्तान ने कबाइलियों के साथ मिलकर आक्रमण कर दिया था और बेरहमी से कई दिनों तक कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार किए गए। सेना को आदेश देने में बहुत देरी हुई थी। इस देरी के कारण जहां पाकिस्तान ने कश्मीर के एक तिहाई भू-भाग पर कब्जा कर लिया, वहीं उसके एजेंटों ने बड़ी संख्या में तब भी कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम कर दिया था। अब इस अध्याय का पटाक्षेप होना ही चाहिए।
साभार: डॉ. चन्द्र त्रिखा
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