जैसा कि कुछ बुद्धिजीवी यानी भाषणजीवी करते हैं, मैंने भी किया। भाषण देने के लिये बुलाने वालों से हवाई जहाज का किराया वसूल करते हैं और ट्रेन से सफर करते हैं, किराया टैक्सी का वसूल करते हैं और सफर बस से करते हैं।
मैं वृद्धों की सहायता पर भाषण देकर बस से लौट रहा था। बस में कुछ भीड़ थी। मेरे ठीक आगे की दोनों सीटों पर दो मुश्टंडे बैठे थे। बदन का पसीना उनकी कमीजों से बाहर आ रहा था, दाँत पीले पड़ चुके थे, उन्हें शेव करने का शऊर भी नहीं था। ऊपर से धीरे-धीरे बात कर चुहलबाजी कर रहे थे। हँस रहे थे। जरूर उनकी भाषा अश्लील होगी। ऐसे लोग ही समाज को खराब करते हैं, अनपढ़... जाहिल कहीं के...।
मेरी सोच पर मेरे द्वारा दिया गया भाषण हावी हो रहा था। समाज में वृद्धों की दशा पर कोई ध्यान नहीं देता है। वरिष्ठ नागरिक या महिलाओं वाली सीटों पर पुरुष कब्जा कर लेते हैं। कंडक्टर भी उन्हें कुछ नहीं कहता है। कौन झगड़ा मोल ले। मुझे ऐसे लोगों पर गुस्सा आ रहा था। अचानक देखा बस में एक वृद्धा और युवा लड़की चढ़ी है। उन्होंने महिला सीटों पर काबिज पुरुषों से सीट देने के लिये आग्रह किया, पर वे टस से मस नहीं हुए। वे दोनों निराश खड़ी रहीं। उन्होंने मेरी तरफ देखना शुरू किया। मैं समझ गया कि मुझे सुदर्शन नहीं मान रही है, उनकी निगाह मेरी सीट पर है। मैंने आँख बंद कर ली। मेरे आगे बैठे दोनों देहाती दुनिया जहान से बेखबर एक-दूसरे से बतिया रहे थे, हँस रहे थे। अचानक उनमें से एक बोला, अरे देख, वह बुढिय़ा और उसकी छोकरी खड़े हैं...।
उनके द्वारा वृद्धा को बुढिय़ा और लड़की को छोकरी कहना मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। ऐसा तो बोलेंगे ही अनपढ़, जाहिल, देहाती, जो ठहरे।
वे दोनों एक साथ खड़े हो गये। उनमें से एक बोला- अम्मा तु यहां मेरी सीट पर बैठ जा... दूसरा बोला ऐ छोरी तू यहाँ...।
कैसे बदतमीज हैं? इन्हें बोलना भी नहीं आता। पर वृद्धा और उसके साथ की लड़की उनकी सीट पर बैठ चुकी थी। वृद्धा ने आशीर्वादों की झड़ी लगा दी थी। वे दोनों अब खड़े-खड़े मस्ती कर रहे थे और मैं कुछ पिटा हुआ महसूस कर रहा था।
गोविंद शर्मा
संगरिया, राजस्थान

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