हरियाणवी-मखौल




बीमार सूं ओड़ैए धर दे...

एक जणा रेल मैं सारी सीट पै लेट्या पडय़ा था। इब एक आया अर बोल्या- भाई साब थोड़ा खड्या ओ ले नै, बैठ जाऊं मैं भी। अर वो पडय़ा-पडय़ा बोल्या- तों जाणदा नी मन्नैं मैं कोण सूं। इब उसकै डर सा बैठ ग्या अर सोच्या के बेरा भाई कोए घणा तकड़ा बदमाश हो तो वो चुपचाप एकानै सी ओग्या। थोड़ी आण पाच्छै एक और आया अर बोल्या भाई साब थोड़ा कष्ट कर ले नै मैं भी बैठ ज्यांगा। तो वो उसतै भी बोल्या- तों जाणदा नी मन्नैं मैं कोण सूं। तो वो भी डरकै एकानै ओ लिया। तीसरी बार एक पैलवान आया अर बोल्या- खड्या ओ रए बैठणा सै। तो उसनै फेर घणा करड़ा सा आंगा लाया अर बोल्या- तनै बेरी नी मैं कोण सूं। इतणा सुणते ही पैलवान नै उसका गला पकड़ कै वो ऊपर ठा लिया अर बोल्या- हां, बता तों कोण सै। तो वो पड़दाए बोल्या- भाई साब मैं कई दिनां तै बीमार सूं, मर ज्यांगा, मन्नै ओड़ैए धर दे।

नाम ए माम्मा सै...

रुल्दू अर उसकी घरवाली शहर मैं कल्ले रया करदे। तो एक दन रुल्दू दो-तीन दिनां खात्तर बाहर चल्या गया। तो उसकै घरां राम-राम, राजीखुशी करकै एक बूढ़ा आण बडय़ा। तो थोड़ी आण पाच्छै रुलदू की घरवाली बोल्ली- हां जी, थाम कोण। तो वो बोल्या मैं माम्मा। इब बूढ़ा की खूब खातिरदारी ओई। अर रुल्दू भी कई दिनां पाच्छै घरां आ ग्या। अर उसनै देख्या बूढ़ा बैठया सै तो वो राम-राम करकै भीत्तर जाकै घरआली तै बोल्या- यू कोण सै तो वा बोल्ली- माम्मा। तो रुल्दू नै सोच्ची चलो ठीक सै इसका (घरवाली) होगा। इब तीन-चार दिन तक फेर बूढ़ा ओड़ैए आच्छा खाणा-पीणा का आनंद ले ग्या। तो रुल्दू एक दिन सांझ नै घरआली तै बोल्या- के बात सै, तेरा माम्मा नै पूछ ले नै के ढंग सै, कद जावैगा यो। तो वा बोल्ली हैं... मेरा माम्मा कोन्या यो तेरा ओगा। मेरा माम्मा नै मरे तो तीन-चार साल ओगे। तो इब दोन्नूं बूढ़ा तै पूछण चले गए अर बोल्ले- जी, थाम किसके माम्मा सो। तो बूढ़ा पड़दाए बोल्या- भाई, मैं किस्से का माम्मा कोनी मेरा तो नाम ए माम्मा सै।

-सेवा सिंह रापड़िया 

  

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