अब तक करीब 10 लाख यूक्रेनी दूसरे शहरों/देशों में शरण ले चुके हैं। यह संख्या 40 लाख तक जा सकती है। ऐसी स्थिति में यह नि:संदेह इस सदी का सबसे बड़ा शरणार्थी संकट होगा। अब तक उजड़े 55 प्रतिशत लोगों ने पोलैंड में शरण ली है। इनमें वे शरणार्थी भी शामिल हैं जिन्होंने सीरिया, यमन और अ$फगानिस्तान से भागकर यूक्रेन में शरण ली थी।
24 वर्षीय सीरियाई छात्र ओवरा स्टैफ एक ऐसे ही शरणार्थी हैं जो 2013 में अपने देश में छिड़ी जंग के बाद यूके्रन आए थे। स्टै$फ के अनुसार, खारकीव में जब गोलाबारी-धमाकों और तबाही का मंजूर दिखा तो महसूस हुआ कि मैं फिर से नौ साल पुराने सीरिया में खड़ा हूं। राजधानी दमिश्क में पले-बढ़े ओरवा का कहना है कि उस दौरान वहां ऐसे हालात थे और मेरे लिए यह बुरे अतीत के फिर से ताजा हो जाने जैसा है।
खारकीव में रह रहे स्टैफ रूसी हमलों से बचकर अन्य यूक्रेनियों के साथ पोलैंड पहुंचे हैं। उनका कहना है कि '2013 मे तब हमारे परिवारों को सीरिया छोडऩे पर मजबूर होना पड़ा था। जहां से हम लेबनान चले गए थे। वर्ष 2019 में खराब सुरक्षा-आर्थिक स्थिति के कारण फरवरी 2020 में यूके्रन आना पड़ा। एक तरह से जि़ंद$गी दस वर्षों से एक सीमा से दूसरी सीमा में भटकते हुए ही कटी है।
यूक्रेन में वैसे भी 60 प्रतिशत अस्पताल, 80 प्रतिशत स्कूल-कॉलेज, अधिकांश विश्वविद्यालय और 70 प्रतिशत औद्योगिक इकाइयां बर्बाद हो चुकी हैं। बचे खुचे लोग कहां जाएंगे, क्या खाएंगे, इस बात का जवाब न जेलेंस्की के पास है न पुतिन ही जवाबदेही ओटने को तैयार हैं।
आज यूक्रेन छोड़कर महफूज ठिकाने तलाशते नागरिकों को देखकर पलायन, विस्थापन और शरणार्थियों का दर्द फिर नज़र आया है। भारत को जब स्वाधीनता की कीमत बंटवारे के तौर पर चुकानी पड़ी थी तब किसी को वो दर्द इस तरह नहीं दिखाई दिया। अपना घर छोडऩे के घाव, पीढिय़ों की दुश्वारियां और लापता मरहम, ये सब हासिल हुआ था ब्रिटिश जज रैडक्लिफ को बंटवारे की रेखा खींचने के लिए मिली 40 दिन की मोहलत की बदौलत। बंटवारे के दर्द को 'पार्टीशन हॉरर रिमेंबरेंस डेÓ की तरह मनाया जाना भारत का हासिया फैसला है। बंटवारे में मारे गए दस लाख लोग, बेघर हुए डेढ़ करोड़ और अपनी अस्मत पर आंच सहने वाली 83 हज़ार औरतों और बच्चियों के अलावा जो करीब चार लाख लोग भारत लौटकर आए जिन्हें अपने ही देश में शरण लेनी पड़ी। इसी देश ने 90 के दशक में कश्मीर में मचे कत्लेआम के बाद पलायन के लिए मजबूर किए चार लाख हिंदुओं का अपने ही देश में शरणार्थी की तरह कैंपों में रहना पड़ा। जिस दर्द के संग्रहालय हमने नहीं बनाए उसने अपने ही देश में पराए की तरह वक्त गुजारा। मजहब के नाम पर प्रताडि़त इस आबादी के लिए न विश्व मंच से आवाज उठी और न ही मानव अधिकारों के झंडे लहराए गए।
महाभारतकालीन यक्ष-युधिष्ठिर संवाद अगर वर्तमान में होता तो उनके प्रश्न-उत्तर शायद आज ज़्यादा प्रासंगिक होते। यक्ष पूछता, 'युधिष्ठिर बताओ सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है तो युधिष्ठिर बताता, 'पुतिन, ज़ेलेस्की, बाइडन, फे्रंको सब जानते हैं कि युद्ध क्या होता है। पुतिन और बाइडन तो अपने जीवनकाल में तबाही के अनेक मंज़र देख चुके हैं। उन्होंने जलते हुए तबाह शहर भी देखे हैं। मलबे के ढेर में बदलती बहुमंजि़ली इमारतें भी देखी हैं, फिर भी आज भी उसी विभीषिका में अपनी-अपनी मिसाइलों व बमवर्षक विमानों, टैंकों से बारूदी आहुतियां डालने में लगे हैं। इससे बड़ा आश्चार्य क्या होगा? अतीत से कोई नहीं सीखता, न बाइडन, न पुतिन न ज़ेलेंस्की। उन्हें एक-दूसरे की हेंकड़ी तोडऩी है और हज़ारों लाखों दहशतज़दा नागरिकों के चेहरे नोचने हैं। कैसे खूंखार है ये बड़े लोग।'
पुतिन को इस बात के अहसास ने कभी नहीं सताया कि उसके पिता उस समय जंग के मैदान में थे जब शवों के बीच फंसी उसकी बेहोश मां ने पुतिन को जन्म दिया था। ज़ेलेंस्की को भी इस बात का कतई एहसास नहीं है कि कैसे उसके यूक्रेन वासियों ने उसे सिर्फ इसलिए चुन लिया था क्योंकि वह अपने अभिनय से कुछ मुस्कानें, कुछ राहतें बिखरने में समर्थ है। यूक्रेन के नागरिकों को क्या मालूम था कि उनके नेता की हठधर्मी के कारण लगभग बीस लाख लोगों को देश से पलायन पर मज़बूर होना पड़ा है। तबाही के जो मंज़र टीवी चैनलों पर दिखते हैं उनके आधार पर नहीं लगता कि यूक्रेन अगले बीस-तीस वर्षों में पुरानी हालत में लौट पाएगा। अभी तय नहीं कि वहां कितने यूक्रेनी मारे जा चुके हैं मगर प्रेक्षकों की मानें तो यह संख्या भी लाख का आंकड़ा पार कर सकती है। ऐसा नहीं कि तबाही सि$र्फ यूके्रेन में हुई है, रूस के नागरिक भी अपने नेता की हठधर्मी से बुरी तरह संतप्त हैं। वहां भी रूबल औंधे मुंह गिर चुका है। एटीएम बंद हैं। बाज़ार ठप्प हैं और यूके्रेन में मरने वाले रूसी सैनिकों की लाशों से कई बड़े शहरों में शोक फैला हुआ है। घायलों से अस्पताल अटे पड़े हैं और रूसी नागरिकों का एक वर्ग अपने ही राष्ट्रपति के खिला$फ सड़कों पर उतर आया है।
ऐसे माहौल में साहिर, फैज़, नीरज आदि ने जमकर लिखा। इन दिनों नीरज की एक कविता चर्चा में है...
मैं सोच रहा हूँ अगर तीसरा युद्ध हुआ तो
इस नई सुबह की नई फसल का क्या होगा।
मैं सोच रहा हूँ गर जमीं पर उगा खून
इस रंग महल की चहल पहल का क्या होगा।
क्या इन सब पर खामोशी मोत बिछा देगी
क्या धुंध धुआँ बनकर सब जग रह जायेगा।
क्या कूकेगी कोयलिया कभी न बगिया में
क्या पपीहा फिर न पिया को पास बुलायेगा।
क्या गोली की बौछार मिलेगी सावन को
क्या डालेगा विनाश झूला अमराई में।
क्या उपवन की डाली में फूलेंगे अँगार
क्या घृणा बजेगी भौंरों की शहनाई में।
चाणक्य माक्र्स एंजिल लेनिन गांधी सुभाष
सदियाँ जिनकी आबाजों को दुहराती हैं।
तुलसी बर्जिल होमर गोर्की शाह मिल्टन
चट्टानें जिनके गीत अभी तक गाती हैं।
मैं सोच रहा क्या उनकी कलम न जागेगी
जब झोपडिय़ों में आग लगायी जायेगी।
क्या करवटें न बदलेंगीं उनकी कब्रें जब
उनकी बेटी भूखी पथ पर सो जायेगी।
साभार: डॉ. चन्द्र त्रिखा
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