बालकथा— मनचला नोट और बुलंद सिक्का

एक ऐसी कहानी जो कभी किसी ने नहीं सुनी। लो तुम भी सुन लो वही कहानी। मनचले नोट और बुलंद सिक्के के जुबानी।

'लल्लू, मैं पांच रुपए का नोट एकदम नया और कड़क करेंसी नोट। जेब में लेकर बाबू जब सड़क पर चले तो उसकी चाल ही बदल जाए। मेरे हरियल रंग को देखकर तो उसके आंखों की रंगत ही बदल जाए। एकदम नया और कड़क करेंसी मैं हूं 5 रूपये का नोट।' 'बहुत हो गया बच्चू मियां मिठूं' अब चुप कर जा वरना जो खींजकर तुझ से टकराया तो तेरा पेट की फट जाएगा। मेरी ताकत का अंदाजा है बच्चू।' 10 का सिक्का उछल कर गरजा।

'ए! तुम कौन हो बीच में कूदने वाले?' हरा नोट फिर से फडफडाया। 'पहले तुम बताओ कि तुम कौन हो? दस का सिक्का उछल कर खनखनाया।  अब तो छाप पर बने तीनों शेरों ने भी मुंह खोला। मैं 5 रूपये का नोट हूं भाई! यह पहले ही बता चुका हूं। नोट जरा नरम होते आगे बोला- मुझे भला कौन नहीं जानता? मेरा राज चलता है इस दुनिया में।

'लो फिर से शुरु हो गया बहकना। मेरी भी सुन ले मैं 5 रूपये के 2 सिक्के रखता हूं। तेरे ही परिवार का ताकतवर बंदा हूं। समझा?'

हें सिक्के! गोल-मटोल सिक्के! तू मेरी बराबरी कर रहा है। ज्यादा बढ़ चढ़कर बोलने से पहले जरा मेरी लंबाई चौड़ाई तो देख, फिर अपने पर इतराना। अगर सड़क पर गिर गया तो मिट्टी में दब जाएगा। फिर ढूंढे से भी नहीं मिलेगा बच्चू! हरे नोट ने उठकर गर्दन घुमाकर एक ठुमका लगाया।

तुझे अपनी पता है जो मेरी बात कर रहा है? यह लल्लू तुझे मुठ्ठी बंद कर दबा दे तो तेरी सूरत ही बदल जाए। मारे सिलवट के खुद ही शरमा जाए। फिर कोई नहीं पूछे तुझे बाजार में सब देख देख मुंह बिसूरता छोड़ जाए। मुझे लल्लू कितना भी दबाए मेरा कुछ नहीं बिगडऩे वाला। सिक्के पर बैठे शेर के मुंह गरजे।

मेरा कुछ नहीं बिगडऩे वाला देख लल्ला। तू सिक्का है ना तू नहीं समझ पाएगा। मेरी पूरी गड्डी बन जाती है। बैंक वाले 1 या 2 की नहीं बल्कि सौ नोट मिलाकर मेरी गड्डी बना देते हैं। फिर देख मेरी ताकत। उस समय तेरी क्या ताकत है? तेरी बनती है क्या गड्डी? यूं ही अकेला घूमता फिरता है ठनक ठनक गोपाल! इस जेब से उस जेब में। जा रे बहुत देखे तेरे जैसे। नोट ने सुस्ताते हुए कहा।

सिक्का भला कहां चुप रहने वाला था। बजना तो उसका स्वभाव है। नोट को अपनी औकात दिखाते हुए बोला- गड्डी से जुदा रहे या अकेला पड़ा रहे। तेरी पतली काया ज्यादा दिन जीने वाली नहीं। मेरा तो बरसो कुछ नहीं बिगड़ता। तुझे पानी में डाल दो तो गल जाएगा। आग छू ले तो जल जाएगा और लल्ला तिजोरी में बंद कर दे तो दीमक चट कर जाए। तेरा क्या है तुझे फाड़ कर दो टुकड़े में कर दे तो फिर तुझे कोई पूछने वाला भी नहीं।

'बस कर बड़बोले खोटे सिक्के!Ó नोट झल्लाया। खोटा किसको कहता है? टंच हूं मैं तो बिल्कुल खरा सिक्का। यह देख लल्लू ने मुझे उठाकर अपने पर्स के हवाले कर दिया। मेरे गुम हो जाने का उसको डर लगा रहता है हमेशा और तेरा क्या है यह ले दबा दिया ने कपड़े की तह के बीच में ताकि इधर-उधर न उड़ जाए। सिक्का पर्स में घुसते हुए बोला।

5 रूपये का नोट हा!हा! हा! हा!

10 के सिक्के जा जा जा...

दोनों की बोलती पर अब लग गया ताला।


डाॅ विमला भंडारी  
भंडारी सदन
 पैलेस रोड 
सलूंबर - 313027
914 581 5390

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