कविता—मंजिल पाओ खुशी-खुशी।

 चंचल मन की चाहत होती

मंजिल पहुँच सफल हो जाना।

ऊँची-सी पहचान बनाकर

सबकी आँखों में बस जाना।

एक मंजिल पाने की खातिर

साथी खुद को भूल न जाना।

आसपास के सभी खास हैं 

सबसे मिलना और बतियाना।

अनजानी-सी एक खुशी पर

बाकी खुशियाँ मत वारो।

हँसी-खुशी रखे रोमांचित

गुमशुम जीना क्या यारो !

उमंग-तरंग साहस-सम्बल

मन में सच्ची लगन लगी।

नित्य कर्मरत रहने वालों

मंजिल पाओ खुशी-खुशी।।


नरेन्द्र सिंह नीहार

नई दिल्ली

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