नाथपंथ और हरियाणा: गोरखनाथ को हिंदू परंपरा में महान योगी माना जाता है

 नाथपंथ और हरियाणा: गोरखनाथ को हिंदू परंपरा में महान योगी माना जाता है

नाथ-पंथ भारतीय आध्यात्मिक इतिहास का एक ऐसा अध्याय है जिस पर शोध अभी भी अंतिम निष्कर्षों पर नहीं पहुंच पाया। पूर्वोत्तर से लेकर पश्चिमोत्तर भारत तक यह पंथ और उसके प्रमुख हस्ताक्षर गुरु गोरखनाथ चर्चा में बने रहे हैं। उन पर शोध की प्रक्रिया भी आचार्य अभिनव गुप्त और उनसे भी पूर्व गुरु मत्स्येंद्र नाथ के हवाले से चलती है। मगर कडिय़ों को जोडऩे का सिलसिला अभी भी अधूरा है।

अभी तक प्राप्त विवरणों के अनुसार गोरखनाथ या गोरक्षनाथ 11वीं से 12वीं शताब्दी के नाथ योगी थे। गुरु गोरखनाथ जी ने पूरे भारत का भ्रमण किया और अनेकों ग्रन्थों की रचना की। गोरखनाथ का मन्दिर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर नगर में स्थित है। उन्हीं के नाम पर इस जिले का नाम गोरखपुर पड़ा है। गुरु गोरखनाथ जी के नाम से ही नेपाल के गोरखाओं ने नाम पाया। नेपाल में एक जिला है गोरखा, उस जिले का नाम भी इन्हीं के नाम से पड़ा। माना जाता है कि गुरु गोरखनाथ सबसे पहले यहीं दिखे थे। गोरखा जि़ला में एक गुफा है जहां, गोरखनाथ का पग चिह्न है और उनकी एक मूर्ति भी है। यहाँ हर साल वैशाख पूर्णिमा को एक उत्सव मनाया जाता है जिसे रोट-महोत्सव कहते हैं और यहाँ मेला भी लगता है।

गुरु गोरखनाथ का समय

मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ के समय के बारे में इस देश में अनेक विद्वानों ने अनेक प्रकार की बातें कही हैं। वस्तुत: इनके और इनके समसामयिक सिद्ध जालंधर नाथ और कृष्णपाद के संबंध में अनेक दंतकथाएँ प्रचलित हैं।

गोरखनाथ और मत्स्येंद्रनाथ-विषयक समस्त कहानियों के अनुशीलन से कुछ बातें स्पष्ट रूप से जानी जा सकती हैं। प्रथम यह कि मत्स्येंद्रनाथ और जालंधरनाथ समसायिक थे। दूसरी यह कि मत्स्येंद्रनाथ, गोरखनाथ के गुरु थे और जालंधरनाथ कानुपा या कृष्णपाद के गुरु थे। तीसरी यह कि मत्स्येंद्रनाथ कभी योग-मार्ग के प्रवर्तक माने जाते थे, फिर संयोगवश ऐसे एक आचार में सम्मिलित हो गए थे जिसमें वामाचारी साधना थी। चौथी यह कि शुरू से ही जालंधरनाथ और कानिपा की साधना-पद्धति मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ की साधना-पद्धति से भिन्न थी। यह स्पष्ट है कि किसी एक का समय भी मालूम हो तो बाकी सिद्धों के समय का पता आसानी से लग जाएगा। समय मालूम करने के लिए कई युक्तियां दी जा सकती हैं। एक-एक करके हम उन पर विचार करें।

सबसे प्रथम मत्स्येंद्रनाथ द्वारा लिखित 'कौल ज्ञान निर्णय' ग्रंथ (कलकत्ता संस्कृत सीरीज में डॉ. प्रबोधचंद्र वागची द्वारा 1934 ई. में संपादित) का लिपिकाल निश्चित रूप से सिद्घ कर देता है कि मत्स्येंद्रनाथ ग्यारहवीं शताब्दी के पूर्ववर्ती हैं।

सुप्रसिद्ध कश्मीरी आचार्य अभिनव गुप्त ने अपने 'तंत्रालोक' में मच्छंद विभु को नमस्कार किया है। ये 'मच्छंद विभु' मत्स्येंद्रनाथ ही हैं, यह भी निश्चित है। अभिनव गुप्त का समय निश्चित रूप से ज्ञात है। उन्होंने 'ईश्वर प्रत्याभिज्ञा' सन् 1015 ई. में लिखी थी और 'क्रम स्रोत' की रचना सन् 991 ई. में की थी। इस प्रकार अभिनव गुप्त सन् ईस्वी की दसवीं शताब्दी के अंत में और ग्यारहवीं शताब्दी के आरंभ में मौजूद थे। मत्स्येंद्रनाथ इससे पूर्व ही हुए होंगे। जिस आदर और गौरव के साथ आचार्य अभिनव गुप्तपाद ने उनका स्मरण किया है उससे अनुमान किया जा सकता है कि उनके पर्याप्त पूर्ववर्ती होंगे।

राहुल सांकृत्यायन ने 'गंगा' के पुरातत्त्वांक में 84 वज्रयानी सिद्धों की सूची दी है। इसके देखने से मालूम होता है कि मीनपा नामक सिद्ध, जिन्हें तिब्बती परंपरा में मत्स्येंद्रनाथ का पिता कहा गया है, राजा देवपाल के राज्यकाल में हुए थे। राजा देवपाल 809-49 ई. तक राज करते रहे । इससे यह सिद्ध होता है कि मत्स्येंद्रनाथ नवीं शताब्दी के मध्य के भाग में और अधिक से अधिक अंतिम भाग तक वर्तमान थे।

गोविंदचंद्र या गोपीचंद्र का संबंध जालंधरपाद से बताया जाता है। वे कानिपा के शिष्य होने से जालंधरपाद की तीसरी पीढ़ी में पड़ते हैं। इधर तिरुमलय की शैल लिपि से यह तथ्य उद्धृत किया जा सका है कि दक्षिण के राजा राजेंद्र चोल ने मणिकचंद्र को पराजित किया था। बंगला में 'गोविंद चंद्रेर गान' नाम से जो पोथी उपलब्ध हुई है, उसके अनुसार भी गोविंदचंद्र का किसी दाक्षिणात्य राजा से युद्ध वर्णित है। राजेंद्र चोल का समय 1063-1112 ई. है। इससे अनुमान किया जा सकता है कि गोविंदचंद्र ग्यारहवीं शताब्दी के मध्य भाग में मौजूद थे। यदि जालंधर उनसे सौ वर्ष पूर्ववर्ती हों तो भी उनका समय दसवीं शताब्दी के मध्य भाग में निश्चित होता है। मत्स्येंद्रनाथ का समय और भी पहले निश्चित हो चुका है। जालंधरपाद उनके समसामयिक थे।

वज्रयानी सिद्ध कण्हपा (कानिपा, कानिफा, कान्हूपा) ने स्वयं अपने गायनों में जालंधरपाद का नाम लिया है। तिब्बती परंपरा के अनुसार ये भी राजा देवपाल (809-849 ई) के समकालीन थे। इस प्रकार जालंधरपाद का समय इनसे कुछ पूर्व ठहरता है।

कंथड़ी नामक एक सिद्ध के साथ गोरखनाथ का संबंध बताया जाता है। प्रबंध चिंतामणि में एक कथा आती है कि चौलुक्य राजा मूलराज ने एक मूलेश्वर नाम का शिवमंदिर बनवाया था। सोमनाथ ने राजा के नित्य नियत वंदन.पूजन से संतुष्ट होकर अणहिल्लपुर में अवतीर्ण होने की इच्छा प्रकट की। फलस्वरूप राजा ने वहां त्रिपुरुष-प्रासाद नामक मंदिर बनवाया। उसका प्रबंधक होने के लिए राजा ने कंथड़ी नामक शैवसिद्ध से प्रर्थाना की। उस नि:स्पृह तपस्वी को राजा ने मंदिर का प्रबंधक बनवाया। कहानी में सिद्ध के सभी लक्षण नागपंथी योगी के हैं, इसलिए यह कंथड़ी निश्चय ही गोरखनाथ के शिष्य ही होंगे। 'प्रबंध चिंतामणि' की सभी प्रतियों में लिखा है कि मूलराज ने संवत् 993 की आषाढ़ी पूर्णिमा को राज्यभार ग्रहण किया था। केवल एक प्रति में 998 संवत् है। इस हिसाब से जो काल अनुमान किया जा सकता है, वह पूर्ववर्ती प्रमाणों से निर्धारित तिथि के अनुकूल ही है। ये ही गोरखनाथ और मत्स्येंद्रनाथ का काल-निर्णय करने के ऐतिहासिक या अद्र्ध-ऐतिहासिक अधार हैं। परंतु प्राय: दंतकथाओं और सांप्रदायिक परंमपराओं के आधार पर भी काल-निर्णय का प्रयत्न किया जाता है।

बहुत से ऐतिहासिक संत गोरखनाथ के साक्षात् शिष्य माने जाते हैं। उनके समय की सहायता से भी गोरखनाथ के समय का अनुमान लगाया जा सकता है। ब्रिग्स ने (गोरखनाथ एंड कनफटा योगीज़-कलकत्ता, 1938) इन दंतकथाओं पर आधारित काल को चार मोटे विभागों में इस प्रकार बाँट लिया है-

कबीर, नानक आदि के साथ गोरखनाथ का संवाद हुआ था, इस पर दंतकथाएं भी हैं और पुस्तकें भी लिखी गई हैं। यदि इनसे गोरखनाथ का काल-निर्णय किया जाए, जैसा कि बहुत से पंडितों ने भी किया है तो चौदहवीं शताब्दी के पूर्व या मध्य में होगा।

'गूगा की कहानी', पश्चिमी नाथों की अनुश्रुतियां, बंगाल की शैव-परंपरा और धर्मपूजा का सम्प्रदाय, दक्षिण के पुरातत्व के प्रमाण, ज्ञानेश्वर की परंपरा आदि को प्रमाण माना जाए तो यह काल 1200 ई0.के उधर ही जाता है। तेरहवीं शताब्दी में गोरखपुर को मठ ढहा दिया गया था। इसका ऐतिहासिक सबूत है इसलिए निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि गोरखनाथ 1200 ई. के पहले हुए थे। इस काल के कम से कम सौ वर्ष पहले तो यह काल होना ही चाहिए। नेपाल की शैव-बौद्ध परंपरा के नरेंद्रदेव, के बाप्पाराव, उत्तर-पश्चिम के रसालू और होदो, नेपाल के पूर्व में शंकराचार्य से भेंट आदि आधारित काल 8वीं शताब्दी से लेकर नवीं शताब्दी तक के काल का निर्देश करते हैं।

कुछ परंपराएं इससे भी पूर्ववर्ती तिथि की ओर संकेत करती हैं। ब्रिग्स दूसरी श्रेणी के प्रमाणों पर आधारित काल को उचित काल समझते हैं, पर साथ ही यह स्वीकार करते हैं कि यह अंतिम निर्णय नहीं है। जब तक और कोई प्रमाण नहीं मिल जाता तब तक वे गोरखनाथ के विषय में इतना ही कह सकते हैं कि गोरखनाथ 1200 ई. से पूर्व, संभवत: ग्यारहवीं शाताब्दी के आरंभ में, पूर्वी बंगाल में प्रादुर्भूत हुए थे।  परंतु सब मिलकर वे निश्चित रूप से ज़ोर देकर कुछ नहीं कहते और जो काल बताते हैं, उसे अन्य प्रमाणों से अधिक युक्तिसंगत माना जाए, यह भी नहीं बताते।

परंतु उपरोक्त के प्रमाणों के आधार पर नाथमार्ग के आदि प्रवर्तकों का समय नवीं शताब्दी का मध्य भाग ही उचित जान पड़ता है। इस मार्ग में पूर्ववर्ती सिद्ध भी बाद में शामिल हुए हैं और इसलिए गोरखनाथ के संबंध में ऐसी दर्जनों दंतकथाएं चल पड़ी हैं जिनको ऐतिहासिक तथ्य मान लेने पर तिथि-संबंधी झमेला खड़ा हो जाता है।

गुरु गोरखनाथ (उन्हें गोरक्षनाथ के रूप में भी जाना जाता है) भारत में नाथ हिंदू मठ आंदोलन के एक प्रभावशाली संस्थापक थे। उन्हें मत्स्येंद्रनाथ के दो उल्लेखनीय शिष्यों में से एक के रूप में माना जाता है। उनके अनुयायी भारत के हिमालयी राज्यों, पश्चिमी और मध्य राज्यों और गंगा के मैदानी इलाकों के साथ ही नेपाल में पाए जाते हैं। इन अनुयायियों, योगियों को दर्शनी या कनफटा कहा जाता है।

गोरखनाथ को हिंदू परंपरा में एक महा-योगी (या महान योगी) माना जाता है। उन्होंने एक विशिष्ट आध्यात्मिक सिद्धांत या एक विशेष सत्य पर जोर नहीं दिया था लेकिन कहा था कि सत्य और आध्यात्मिक जीवन के लिए खोज मूल्यवान भी है और आदमी का एक सामान्य लक्ष्य है।

प्रख्यात समीक्षक आचार्य रामचंद्र शुक्ल की मान्यता है कि गोरखनाथ के नाथपंथ का मूल भी बौद्धों की वज्रयान शाखा है। चौरासी सिद्धों में गोरखनाथ भी गिन लिए गए हैं। पर यह स्पष्ट है कि उन्होंने अपना मार्ग अलग कर लिया। योगियों की इस हिंदू शाखा ने वज्रयानियों के अश्लील और वीभत्स विधानों से अपने को अलग रखा, यद्यपि शिव शक्ति की भावना के कारण कुछ शृंगारमयी वाणी भी नाथपंथ के किसी-किसी ग्रंथ (जैसे शक्ति संगम के तंत्र) में मिलती है। गोरख ने पतंजलि के उच्च लक्ष्य, ईश्वर प्राप्ति को लेकर हठयोग का प्रवर्तन किया। वज्रयानी सिद्धों का लीला क्षेत्र भारत का पूर्वी भाग था। गोरख ने अपने ग्रंथ का प्रचार देश के पश्चिमी भागों में राजपूताने और पंजाब में किया। पंजाब में अपने ग्रंथ का प्रचार देश के पश्चिमी भागों में राजपूताने और पंजाब में किया। पंजाब में नमक के पहाड़ों के बीच बालनाथ योगी का स्थान बहुत दिनों तक प्रसिद्ध रहा। जायसी की पद्मावत में भी 'बालनाथ का टीला' न जि़क्र आया है।

गोरखनाथ के समय का ठीक पता नहीं। राहुल सांकृत्यायन ने वज्रयानी सिद्धों की परंपरा के बीच उनका जो स्थान रखा है, उसके अनुसार उनका समय विक्रम की दसवीं शताब्दी आता है। उनका आधार वज्रयानी सिद्धों की एक पुस्तक 'रत्नाकर जोपम कथा' है, जिसके अनुसार मीननाथ के पुत्र मत्स्येेंद्रनाथ, कामरूप के मछवाहे थे और चर्पटीपा के शिष्य होकर सिद्ध हुए थे। पर सिद्धों की अपनी सूची में सांस्कृत्यायन ने ही मत्स्येंद्र को जलंधर का शिष्य लिखा है, जो परंपरा से प्रसिद्ध चला आता है। गोरखनाथ के गुरु मत्स्येंद्रनाथ (मछंदरनाथ) थे, यह तो प्रसिद्ध ही है। सांकृत्यायन ने मीननाथ या मीनपा को पालवंशी राजा देवपाल के समय में अर्थात संवत 900 के आसपास माना है। यह समय उन्होंने किस आधार पर स्थिर किया, स्पष्ट नहीं। यदि सिद्धों की उक्त पुस्तक मेें मीनपा के राजा देवपाल के समय में होने का उल्लेख होता तो वे उसकी ओर विशेष रूप से आकर्षित करते। चौरासी सिद्धों के नामों में हेरफेर होना बहुत संभव है। हो सकता है कि गोरक्षपा और चौरंगीपा के नाम पीछे से जुड़ गए हों और मीनपा से मत्स्येंद्र का नामसाम्य के अतिरिक्त कोई संबंध न हो। ब्रह्मानंद ने दोनों को बिलकुल अलग माना भी है। (सरस्वती भवन स्टडीज)। संदेह यह देखकर और भी होता है कि सिद्धों की नामावली में और सब सिद्धों की जाति और देश का उल्लेख है, पर गोरक्ष और चौरंगी का कोई विवरण नहीं। अत: गोरखनाथ का समय निश्चित रूप से विक्रमी की दसवीं शताब्दी मानते नहीं बनता।

महाराष्ट्र के संत ज्ञानदेव ने, जो अलाउद्दीन के समय (संवत् 1358) में थे, अपने को गोरखनाथ की शिष्य परंपरा में कहा है। उन्होंने यह परंपरा इस क्रम से बताती है-

आदिनाथ, मत्स्येंद्रनाथ, गोरखनाथ, गैगीनाथ, निवृत्तिनाथ और ज्ञानेश्वर।

इस महाराष्ट्र परंपरा के अनुसार गोरखनाथ का नाथ, महाराज पृथ्वीराज के पीछे आता है। नाथ परंपरा में मत्स्येंद्रनाथ के गुरु जलंधरनाथ माने जाते हैं। भोट के ग्रंथों में भी सिद्ध जलंधर आदिनाथ कहे गए हैं। सब बातों का विचार करने से हमें ऐसा प्रतीत होता है कि जलंधर ने ही सिद्धों से अपनी परंपरा अलग की और पंजाब की ओर से चले गए। वहां कांगड़ा की पहाडिय़ों तथा और स्थानों में रमते रहे। पंजाब का जलंधर शहर उन्हें का स्मारक जान पड़ता है। नाथ संप्रदाय के किसी ग्रेथ में जलंधर को बालनाथ भी कहा है। नमक के पहाड़ों के बीच 'बालनाथ का टीलाÓ बहुत दिनों तक प्रसिद्ध रहा मत्स्येंद्र, जलंधर के शिष्य थे, नाथपंथियों की यह धारणा ठीक जान पड़ती है। मीनपा के गुरु चर्पटीनाथ हो सकते हैं पर मत्स्येंद्र के गुरु जलंधर नाथ ही थे। राहुल सांकृत्यायन ने गोरख का जो समय स्थिर किया है वह मीनपा का राजा देवपाल का समसामयिक और मत्स्येंद्र का पिता मानकर किया है। मत्स्येंद्र का मीनपा से कोई संबंध न रहने पर उक्त समय मानने कोई आधार नहीं रह जाता और पृथ्वीराज के समय के आसपास ही, विशेषतया कुछ पीछे-गोरखनाथ के होने का अनुमान दृढ़ होता है। 

जिस प्रकार सिद्धों की संख्या चौरासी प्रसिद्ध है, उसी प्रकार नाथों की संख्या नौ है। अब भी लोग 'नवनाथ' और 'चौरासी सिद्ध' कहते सुने जाते हैं। 'गोरक्षसिद्धांतसंग्रहÓ में मार्ग प्रवर्तनों के नाम गिनाए गए हैं-

नागार्जुन, जुड़भरत, हरिश्चंद्र, सत्यनाथ, भीमनाथ, गोरक्षनाथ, चर्पट नाथ, जलंधर नाथ और मलयार्जुन नाथ। 

इन नामों में नागार्जुन, चर्पट और जलंधर सिद्धों की परंपरा में भी हैं। नागार्जुन (सं. 702) प्रसिद्ध रसायनी भी थे। नाथपंथ में रसायन की सिद्धि का विशेष महत्व है। नाथपंथ सिद्धों की परंपरा से ही छंटकर निकला है, इसमें कोई संदेह नहीं।

महंत चौरंगीनाथ

यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि हरियाणा में नाथपंथ की परम्परा महंत चौरंगी नाथ से आरम्भ होती है। चौरंगीनाथ गुरु गोरखनाथ के गुरुभाई थे और गुरु मच्छेंद्रनाथ के शिष्य थे।

पंजाब, हरियाणा व राजस्थान और हिमाचल में प्रचलित लोक आख्यानों व लोकनाट्यों में चौरंगीनाथ का वास्तविक नाम पूरण भगत बताया जाता है। वह अविभाजित पंजाब के सियालकोट के राजा शालिवाहन की संतान थे और उनकी मां का नाम रानी इच्छरां था। ज्योतिषियों ने पूरण भगत की भावी जि़न्दगी एक संन्यासी के रूप में बीतने की भविष्यवाणी की थी और साथ ही यह आशंका भी जताई थी कि वह किसी षड्यंत्र का शिकार भी हो सकते थे। ज्योतिषियों के ही परामर्श पर पूरण भगत को राजमहल से दूर एक तहखाने में रखा गया। वहीं प्राथमिक शिक्षा भी दी गई। जब ज्योतिष-गणना की अवधि पूर्ण हो गई तो उन्हें औपचारिक रूप से वापिस राजमहल लाया गया।

प्रचलित किंवदंती व लोकश्रुति के अनुसार पूरण जब राजमहल लाए गए तो उनकी सौतेली मां लूणा उनके सौंदर्य एवं तरुणाई पर मोहित हो गई। उसने पूरण को अपने समीप रखने के लिए भरसक प्रयास किए लेकिन अलग ढंग व अलग वातावरण में संस्कारित पूरण उसके जाल में नहीं फंस पाया।

प्रतिशोध की अग्नि में जलती हुई लूणा ने अपने पति राजा शालिवाहन के समक्ष पूरण पर दोषारोपण का सिलसिला शुरू कर दिया और एक बार तो यह भी आरोप लगाया कि पूरण ने उससे बलात्कार का प्रयास किया था। राजा शालिवाहन उन दिनों लूणा के प्रेम पाश में बंधा हुआ था। उसने बिना किसी व्यापक जांच के पूरण के हाथ-पांव कटवाकर  कुएं में फैंकने के आदेश दे दिए।

उन्हीं दिनों महंत मच्छेंद्रनाथ उधर से गुज़रे। उनकी दृष्टि जब कुएं में तड़पते पूरण पर पड़ी तो उन्होंने वहां से उसे निकालकर उसकी सेवा सुश्रुषा कराई और बाद में उसे नाथ पंथ में दीक्षित कराया गया। नवदीक्षित को सिद्ध चौरंगीनाथ का नाम दिया गया। यद्यपि कुछ विद्वान इस कथानक को मान्यता नहीं देते लेकिन सिद्ध चौरंगीनाथ द्वारा ही रचित 'प्राण सांकलीÓ में इस घटना का उल्लेख है। 'प्राण सांकलीÓ के अतिरिक्त श्रीनाथ अष्टक व हठयोग प्रदीपिका आदि कृतियां, सिद्ध चौरंगीनाथ के नाम से ही जुड़ी हैं।

इस महान नाथपंथी सिद्ध ने समाज में अंधविश्वास व पाखण्डी साधुओं, जोगियों की भी भरपूर निंदा की। उन्हीं का एक दोहा है-

टूका खाया, मगर मचाया, जैसा सहर का कूत्ता/

जोग जुगति की खबर न जाणी, कान $फड़ाई बिगता//

इस तथ्य की भी पुष्टि होती है कि सिद्ध चौरंगीनाथ ने 12 वर्ष तक हरियाणा के अस्थल बोहर में कठोर तप किया था और उन्होंने पागल-पंथ का भी प्रवर्तन किया था। उनके कठोर तप एवं हठयोग-साधना से वह तपस्थली योग मंदिर कहलाने लगी।

इस संबंध में हरियाणा के ही एक प्रखर विद्वान डॉ. पूर्णचंद शर्मा ने विशेष विवरण दिया।

'सिद्ध चौरंगीनाथ के पश्चात हरियाणा की नाथ-परम्परा को समृद्ध करने का श्रेय सिद्ध शिरोमणि बाबा मस्तनाथ जी को जाता है। इन्होंने अस्थल बोहर के शापग्रस्त मठ का जीर्णोद्वार करवाया। इनका समय विक्रम संवत् 1764 से 1864 तक माना जाता है। इनके जन्म के विषय में कबीर की भांति ही एक जनश्रुति प्रचलित है कि ये किसरेटी (रोहतक) के एक निस्संतान रहबारी (ऊंट पालने वाले) को मार्ग में पड़े मिले थे। अत: ये उन्हीं के पुत्र कहलाए। संवत् 1776 में इन्होंने बाबा नरमाई का शिष्यत्व ग्रहण किया, जिसका उल्लेख मस्तनाथ जीवन-चरित्र में हुआ-

बहुरि सकत निज ग्रामें आए, तहां एक योगेश्वर आए।

बाबा नाथ नाम नरमाई, जिनका पंथ कहाब आई।।

मास पक्ष शुभ तिथि विचारा, लग्न नक्षत्र योग वर वरवारा।

चोटी ले मुण्डन करवाया, मंत्रविधि सहित गुरु सुनाया।।

सत्तरा सै छेहत्तर संवत् वीरा, मस्तनाथ भए शिष्य गंभीरा।

मस्तनाथ जी आरम्भ में 12 वर्ष तक औघड़ रूप में रहे। तदुपरांत कान फड़वा कर दर्शनी सिद्ध कहलाए। इनके दर्शनी और औघड़ दोनों रूपों की जानकारी इनके जीवन चरित्र में इस प्रकार दी गई है-

अभय दान दीना गुरु नाथा, शिष्य नवायो गुरु पद माथा।

द्वादस वर्ष लौं औघड़ राखा, सेवा टहल परम रस चाखा।।

नगर पहेवा कान फड़ाए, फेर दरसनी नाथ कहलाए।

सत्तरा सै अठासी संवत वीरा, मस्तनाथ ने लीना चीरा।।

सरस्वती नदी के तट पर ही नाथ-पंथी सिद्धों का प्रमुख केंद्र था, जहां इनके बारह के बारह पंथ प्रचार के लिए जुड़ते थे। इसका वर्णन मस्तनाथ चरित्र में इस प्रकार मिलता है-

धूना बारह पंथ का, रहा बहुत गंभीर।

एक सहस्र जोगी तपैं, नदी सरस्वती तीर।।

बाबा मस्तनाथ के जीवन को रेखांकित करते हुए डॉ. देवेंद्र सिंह विद्यार्थी ने लिखा है कि चौरंगी की परम्परा में अस्थल बोहर के महंत मस्तनाथ जी भी अच्छे कवि हुए हैं। इनका समय 18वीं शताब्दी का उत्तराद्र्ध माना जाता है। इनकी ख्याति एक समाज सुधारक के नाते लोकमानस में गहरी पैठी हुई है। इनका रचा कोई भी ग्रंथ नहीं मिलता। गिनती के पद लोगों को याद हैं। इनकी भाषा और अभिव्यक्ति पर हरियाणवी लोक साहित्य की गहरी छाप है।

बाबा मस्तनाथ ने अपने पंथ का प्रचार करने के लिए देश के विभिन्न प्रदेशों का भ्रमण किया और दूर-दूर तक अपने संदेश को पहुंचाया। अपनी महासमाधि से पूर्व इन्होंने अस्थल बोहर मठ के महंत की दीक्षा सिद्ध योगिराज तोतानाथ को दी। बाबा मेघनाथ, योगी मोहरनाथ, योगी चेतनाथ, बाबा पूर्णनाथ, महंत श्रेयोनाथ तथा महंत चांदनाथ आदि महंतों ने अपने पंथ को गतिमान रखा। इस समय योगी बालक नाथ इस गद्दी पर हैं।

इस मठ के अंतिम दो नाथों ने राजनीति के क्षेत्र में भी पदार्पण किया। महंत श्रेयोनाथ हरियाणा के मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री रहे और महंत चांदनाथ संसद सदस्य रहे। इन नाथों के अथक प्रयास के कारण अस्थल बोहर के मठ ने एक विशाल वट-वृक्ष का रूपधारण कर लिया है। सम्प्रति यह विविध प्रकार की शिक्षा का केंद्र बन गया है। यहां तक कि इसके तत्वावधान में बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय बहुआयामी शिक्षा लेकर लोक-कल्याण के क्षेत्र में अपना नाम कमा रहा है। 

इसके अतिरिक्त आज भी हरियाणा के कोने-कोने में नाथों के डेरे विद्यमान हैं। उनके पास अकूत सम्पत्ति है। कोथ (जींद), कोरड़पाई (करनाल), कनोह (फतेहाबाद), अम्बाला, पिहोवा, थानेश्वर, कैथल, सिरसा, हिसार, लेघां, भिवानी, बवानीखेड़ा, पेटवाड़, दादरी, नारनौल, रिवाड़ी, बालंद, बलम्बा आदि इनके प्रमुख ठिकाने हैं। 

हरियाणा के नाथों ने अपनी परवर्ती भक्ति-धाराओं को यथेष्ट रूप में प्रभावित किया है। यहां के सू$फी और संत कवियों ने नाथपंथ में प्रचलित प्रतीकात्मक शब्दावली, गूढ़ोक्तियों, उल्टबासियों आदि का प्रयोग करते हुए गुरु-महिमा को रेखांकित किया है। इन्होंने काम, क्रोध, मोह, माया आदि को त्यागपत्र दया, धर्म, संतोष, तप-त्याग आदि को अपनाने पर बल दिया है।

इन नाथपंथी सिद्धों ने हरियाणा के लोक साहित्य, संस्कृति व लोकमानस पर अमिट छाप अंकित की है। पूरण भगत व गोपीचंद-भरथरी द्वारा 'जोगÓ धारण करने की कथाएं हरियाणा के लोकगीतों, लोकनाट्यों तथा लोकगाथाओं में सर्वत्र गाई जाती है। इन्होंने हरियाणा में नव जागरण एवं लोक-चेतना का जो मंत्र फूंका है वह सदा अविस्मरणीय रहेगा।


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