समीक्षा- दादाजी की अंतरिक्ष यात्रा

नाम पुस्तक: दादाजी की अंतरिक्ष यात्रा
लेखक: गोविंद शर्मा
प्रकाशक: साहित्यगार, धम्माणी मार्केट की गली,चौड़ा रास्ता, जयपुर- 302003
वर्ष: 2022
मूल्य: 150/-

‘‘बाल साहित्य में विज्ञान के तथ्य पिरोती एक रोचक कृति’’

गोविंद शर्मा जी बाल साहित्य का एक जाना माना नाम हैं। जब भी बाल साहित्य की चर्चा होती है तो वह गोविंद शर्मा जी के साहित्य की चर्चा के बिना अधूरी होती है। यदि हम उनके  बाल लेखन की बात करें तो वह न केवल बच्चों को प्रभावित करता है बल्कि बड़े भी उससे बहुत कुछ सीख सकते हैं। आज उनके द्वारा प्राप्त नवीनतम बाल कृति ‘‘दादाजी की अंतरिक्ष यात्रा’’ मुझे समीक्षा प्राप्त हुई। पहले ही नजर में लगा कि यह कोई काल्पनिक कहानी होगी जिसमें बच्चों को किन्हीं काल्पनिक चीजों से बहलाया गया होगा । लेकिन जैसे-जैसे इसको अध्याय दर अध्याय पढ़ती गई तो पता लगा कि यह तो बहुत ही गूढ़ ज्ञान को, बल्कि विज्ञान को सरल भाषा में पिरो कर बच्चों के सामने रखा गया है जिसमें चाँद, तारे , ग्रह, उपग्रह ,सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण यानी कि हमारी सारी आकाशगंगा की चर्चा, वेधशालाओं की चर्चा बड़े ही रोचक ढंग से बच्चों को प्रस्तुत की गई है। इतना ही नहीं इस में वैज्ञानिक तथ्यों को बड़े ही रोचक ढंग से पिरोया गया है। दादाजी नामक पात्र बच्चों को एक-एक करके सभी ग्रहों की जानकारी देते हुए उनकी काल्पनिक आंतरिक्ष यात्रा के माध्यम से सुनाते हैं। वह सूरज से सभी ग्रहों की दूरियां, उनके उपग्रहों के नाम, उनकी विशेषताएं, उनका रंग, उनका आकार, उनकी खगोलीय स्थिति की विस्तृत जानकारी बड़े ही प्रभावी व रोचक ढंग से बच्चों को प्रस्तुत करते हैं। बीच-बीच में छोटे-छोटे संवाद बच्चों को आकर्षित करने के लिए, बच्चों को जोड़े रखने के लिए दादा जी ने जो हास्य के माध्यम से हल्के-फुल्के परिहास के लिए प्रयोग किए हैं वे वास्तव में प्रभावित ही नहीं करते बल्कि उसी वैज्ञानिक जानकारी को और अधिक विस्तार देने के लिए भी सहायक साबित होते हैं। जैसा कि पेज नंबर 45 पर लिखा है ‘‘दादा जी सूरज के इस उपकार या उपहार के बदले में हम अपनी तरफ से उनका क्या काम कर सकते हैं?’’, ‘‘बेटा जी सूरज का हमें कोई काम नहीं करना है। यदि कुछ करना है तो हम धरती के लिए करें। हमें पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए। हरियाली को बिल्कुल नष्ट नहीं करना चाहिए। धरती पर सीमित मात्रा में पेयजल है उसको हमें खराब नहीं करना चाहिए।’’ हमें सूर्य की धूप से क्या मिलता है? चंद्रमा क्या करता है? धरती हमारे लिए क्या करती है? सब की आकृतियां कैसी हैं? 

भूकंप, प्रदूषण, बाढ़- इन सब के बारे में बच्चों को बड़े ही प्रभावोत्पादक ढंग से समझाया गया है। बच्चे विज्ञान के साथ-साथ प्रकृति से जुड़ें और प्रकृति को समझते हुए विज्ञान के महत्व को स्वीकार करें- यही इस पुस्तक का महान मकसद है जिसमे यह पूर्णतया खरी साबित होती है। जैसे जयपुर की वेधशाला की बात करते हुए लेखक दादाजी के रूप में बताते हैं कि ‘‘यह मजे के लिए नहीं बनी थी। यह वेधशाला जिसे जंतर-मंतर के नाम से जाना जाता है, खोज के लिए बनी थी।’’ इस प्रकार की और भी जानकारियां देते हुए आगे बताते हैं कि मथुरा, वाराणसी, उज्जैन और दिल्ली में भी वेधशालाएं हैं। अंतिम अध्याय में लेखक किताबों के जादू की बात करता है। इसमें वह बड़ी ही सुंदरता से बच्चों को यह समझाते हैं कि अंतरिक्ष की यात्रा करने के लिए किसी जादू की या टाइम मशीन की जरूरत नहीं है बल्कि वह घर बैठे भी किताबों के माध्यम से, पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से इस दुनिया को, इस संसार को, बल्कि पूरे अंतरिक्ष को, धरती को, ग्रहों-उपग्रहों को, संसार की सारी सुंदरता को, इस सृष्टि के सारे रहस्यों को बड़ी आसानी से किताबों के माध्यम से जान सकते हैं। 

सबसे पहले तो यह किताब बच्चों की कल्पना को तर्क से जोड़ती हैं और उस तर्क के साथ तथ्य प्रस्तुत करती है। बहुत ही रोचकता व सरलता से आगे बढ़ते हुए बच्चों को एक-एक चीज की जानकारी देते हुए क्रम से उनके ज्ञान को बढ़ाते हुए विज्ञान की जटिलता को रोचकता में बदलते हुए अंत में उनको प्रकृति से, प्रेम से और सौंदर्य से जोड़ती है। बच्चों को किताबों का महत्व भी समझाती है और उन्हें किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित भी करती है। गोविंद शर्मा जी की यह बाल साहित्य की 40 वीं पुस्तक 

‘‘दादाजी की अंतरिक्ष यात्रा’’ सफलता के नए सोपान तय करेगी और निश्चित ही बच्चों को विज्ञान से जोड़ेगी। उनकी तार्किक क्षमता को बढ़ाएगी। बच्चों को किताबों से प्रेम करना सिखाएगी। इस खूबसूरत प्रयास के लिए मैं गोविंद शर्मा जी को बधाई प्रेषित करती हूं। 

 मीनाक्षी आहुजा, श्रीगंगानगर


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