आशु एक 7-8 साल का शरारती लेकिन होशियार बच्चा था। आशु का जब 8वां जन्मदिन आया तो उसके लिए उसकी मांग के अनुसार एक बढिय़ा सी साइकल गिफ्ट के तौर पर आई, जिसे देख आशु फूला नहीं समाया। आशु के पापा ने साइकल के साथ ही उसे एक सेफ्टी गियर किट भी दी - जिसमें एक हेलमेट, दो नी-पैड्स और दो एल्बो-पैड्स थे। और हिदायत दी कि जब भी वह साइकल चलाएं सेफ्टी गियर्स का इस्तेमाल जरूर करे।
| दिवि आनंद डिडवानिया | ,बैंगलोर |
फिर तो रोज शाम को स्कूल का होमवर्क समाप्त करने के बाद आशु कम से कम एक घंटा साइकल चलाने लगा। यह देख घर वाले भी बहुत खुश थे, क्योंकि साइकल आने से आशु ने फोन का इस्तेमाल कम कर दिया था।
कुछ दिनों तक तो वह रोज हेलमेट और बाकी सेफ्टी गियर्स का इस्तेमाल करता रहा। पर जैसे ही गर्मी बढ़ी उसने पहले नी पैड्स और एल्बो पैड्स छोड़े और कुछ दिन बाद हेलमेट भी लगाना छोड़ दिया। वह घर से तो हेलमेट वगैरह लेकर निकलता, पर पार्किंग में ही छोड़कर चला जाता था और वापस आते हुए घर ले आता।
कुछ दिनों बाद ही गर्मी की छुट्टियां शुरू होने वाली थी। सोसाइटी में अलग-अलग प्रकार की प्रतियोगिताओं की घोषणा हुई जिसमें साइकल रेस की भी एक प्रतियोगिता रखी गई थी। इस प्रतियोगिता के बारे में सुन आशु बहुत प्रसन्न हुआ और जमकर साइकल रेस की प्रैक्टिस करने लगा। वह सुबह शाम दोनों समय साइकल चलाने लगा।
एक दिन जब वह शाम को साइकल चला रहा था तो तो उसके पापा ऑफिस से लौट रहे थे और उन्होंने उसे साइकल चलाते हुए देखा। उसने भी पापा को देखा और उनके पास चला आया। वह दोनों घर साथ-साथ जाने लगे। आशु के पापा ने उसे फिर समझाया कि बेटा सेफ्टी गीयर्स को लगाकर ही साइकल चलानी चाहिए। पर आशु ने कहा कि अभी तो बहुत गर्मी रहती है और मैं सोसाइटी के अंदर ही तो साइकल चलाता हूं, वहां कोई बड़ी गाडिय़ां नहीं आती हैं। पर पापा ने फिर समझाया कि तुम नीचे तो गिर सकते हो ना। सुरक्षा जरूरी होती है। आशु ने गर्दन हिलाकर हामी तो भर दी थी पर उसने सेफ्टी गियर्स का इस्तेमाल शुरु नहीं किया।
अब तो प्रतियोगिता में केवल दो ही दिन शेष रह गए थे। आशु जमकर तैयारी कर रहा था। दिन के अधिकांश समय वह साइकल ही चलाता रहता था।
एक शाम जब वह साइकल तेजी से चला रहा था तो एक कुत्ता अपने मालिक से छुड़ाकर उसकी और भागने लगा। आशु को कुत्तों से बहुत डर लगता था। उसने कुत्ते को अपनी तरफ भागता देख साइकल का संतुलन खो दिया। साइकल बहुत तेज चल रही थी आशु उससे नीचे गिरा और कई दूर तक घिसटता हुआ चला गया, जिससे उसके घुटने बुरी तरह छिल गए थे और सिर भी जमीन पर पड़े एक छोटे पत्थर पर लगा, जिससे गहरी चोट आई। दर्द के मारे वह रोने लगा। उसके घर पर यह खबर पहुंचाई गई तो उसकी मम्मा दौड़ती हुई आई और उसे हॉस्पिटल ले जाया गया। वहां उसके सिर पर गहरी चोट लगने के कारण दो तीन टांके आए। पैरों पर भी पट्टियां बांध दी गई। आशु अब ज्यादा हिल डुल नहीं पा रहा था। उसे तेज दर्द हो रहा था। इतने में उसके पापा भी वहां आ गए तो आशु ने उन्हें देखते ही रोते हुए पूछा पापा यह चोट 2 दिन में ठीक हो जाएगी ना? मेरी साइकल रेस की प्रतियोगिता है। यह सुन उसके पापा ने उसे प्यार से समझाया कि नहीं बेटा यह चोट गहरी है। 2 दिन में तुम साइकल नहीं चला पाओगे, पर अगले साल अवश्य इस प्रतियोगिता में सफल आओगे। यह सुन आशु थोड़ा मायूस हो गया।
पापा, मैंने आपका कहा नहीं माना था। इससे आप नाराज तो नहीं? नहीं बेटा, मैं जानता हूं कि हम उपदेशों से कम, घटनाओं से ज्यादा सीखते हैं। मेरे से अच्छा काम तो उसे कुत्ते ने किया जिसने तुम्हें सिखा दिया कि सुरक्षा जरूरी है। यह सुनकर सभी हंस पड़े। इस हंसी से आशु का दर्द तो दूर नहीं हुआ, उदासी दूर हो गई।
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