सड़क चलने की चीज है, लिखने की नहीं। पर ऐसी कोई बंदिश भी नहीं है, इसलिये सड़क पर ही लिखने की ठान ली। पता नहीं चला कि यह सड़क शब्द बना कैसे? सरकने या सटकने से तो नहीं? संस्कृत में गाड़ी को शकट भी कहते हैं, उससे सड़क पर चलने वाली कई गाडिय़ों को छकड़ा तो कहा जाता है, पर सड़क की जननी शकट है या नहीं यह अभी पता नहीं। कम से कम मुझे तो नहीं। चलो छोड़ते हैं, सड़क के पूर्वज शब्द की तलाश। खोज नहीं करते हैं। आदमी ने अपने पूर्वज की खोज शुरू की थी। वह खोज बंदर पर समाप्त हो गई। यह खोज नहीं की गई कि बंदर का पूर्वज कौन था? शायद वैज्ञानिकों को पता चल गया होगा कि बंदर का पूर्वज आदमी ही होगा? बंदरों के आत्म-सम्मान को ठेस न पहुँचे, इसलिये इस खोज को दबा दिया होगा। अरे, बात सड़क की करने जा रहा था, कहाँ प्रयोगशाला में घुस गया।
आजकल सड़क सब जगह होती है। दुनिया के सबसे ऊंचे क्षेत्र तिब्बत लद्दाख में सड़क है। समुद्र की गहराइयों में पहाड़ों के पेट में, नदी के पाट पर भी सड़क हैं। वह कहीं सुरंग में है तो कहीं पुल पर। शहर में सड़क है, गांव में सड़क है। शहर की सड़क और गाँव की सड़क में उतना ही अंतर है, जितना शहर के चिकने चुपड़े आदमी और गांव के खुरदरे आदमी में होता है। शहर की सड़क दिन रात भीड़ का बोझ ढोती है तो देहात की अकेलेपन को ढोती है। कुछ शहरों की कुछ सड़कों की हालत तो यह है कि वे जन्म से आज तक एक क्षण के लिये भी सो नहीं पाई हैं, उन्हें तन्हाई के सुखदुख का भी आभास तक नहीं हुआ। हर वक्त आमदरफ्त की शिकार बनी रहती हैं। उधर गांव में, दो गाँवों के बीच की सड़क वह बेचारी बरसों तरस जाती किसी का मुंह माथा देखने के लिये। सोई रहती है, अलसाये अजगर सी पसरी रहती है। कभी कोई बैलगाड़ी या उससे भी ज्यादा चरकचूं करने वाली साइकल उस पर से गुजरती है तो उसकी नींद टूटती है। नींद टूटती है तो जम्हाई लेती है। उसके खुले मुंह को देखकर सड़क से गुजरने वाला कहता है-देखो, किसी किसान ने इस खेत के पानी को उस खेत में ले जाने के लिये सड़क ही तोड़ दी। ऐसी सड़कें साइकलों से कुछ ज्यादा ही मोह दिखाती है। अनघिसी सड़क पर साइकल पंचर हो जाती है, ऐसे में साइकिल फुई से नहीं जा पाती, सड़क के आगोश में खरामा खरामा अपना सफर पूरा करती है।
शहर की सड़क! बाबा रे बाबा! उस सड़क पर चलने वाले तो मिलते ही नहीं. भागने वाले होते हैं या उडऩे वाले। किसी को यह देखने की फुरसत ही नहीं कि उसके पाँवों के नीचे क्या है। वह आगे, वह उससे भी आगे। पहिये ही पहिए गोल पहिये, किसी के पाँव हों तो रुके, पाँव हों तो थके। पहिये हैं इसलिये लुढकते रहो।
सड़क बनती कैसे है? कुटाई-पिटाई से। यदि कहीं से कूटापिटी में कमी रह जाए तो सड़क कच्ची रह जाती है। कहा जाता है कि सड़क बनाना निहायत ही बेशरमी का खेल है। सड़क तब तक पूरी नहीं होती जब तक मुँह काला न हो जाये। किसका मुँह? सड़क का या बनाने-बनवाने वालों का? लगता है कालिख से कोई नहीं बचता। ठेकेदार और तकनीकी अधिकारी के कपड़े सफेद होते हैं, पर अक्सर उसके दामन में कलंक के काले टीके लगते रहते हैं। सड़क पर उड़ती कंकरिया, कोलतार का अभाव, बनते बनते ही बनने वाले गड्ढे तरेड़ सब कुछ चुपचाप के सौदे की चुगली करते से लगते हैं। उधर सड़क मजदूर भी काले-कलूटे हो जाते हैं। सड़क पर कोलतार डालने के मामले में रामला सिद्धहस्त है। रामले का रंग काला है। उसकी रामली का रंग गोरा है। वह जिप्सम के ढेर पर काम करती है। शाम को जब दोनों डेरे पर आते हैं तो एक-दूसरे को देखकर हँसते हैं। रामला की चुहुलबाजी होती है, धंधा हम दोनों को निखार रहा है, तुझे गौरी से सफेद और मुझे काले से कलूटा बना रहा है' रामली भी दार्शनिक हो जाती है 'मन काला नहीं होना चाहिए, मन पर गरद नहीं जमना चाहिए, तन का क्या है।]
हाँ, तन का क्या है, तन तो सड़क की तरह कुटने-पिटने की चीज है। सड़क भी पूरी तभी होती है जब उसकी अच्छी तरह से कुटाई-पिटाई हो जाती है और मुँह ही नहीं सारा शरीर काला हो जाता है।
सड़क न होती तो 'विकास हुआ' यह सिद्ध करना भी कठिन हो जाता। विकास के नाम पर भाषण देने वाले वक्ता इसका जिक्र जरूर करते हैं कि हमारे समय में इतने किलोमीटर सड़कें बनवाई गई हैं, सड़कें चौड़ी की गई हैं, सड़क को फोरलेन किया गया है, ऊँचा उठाया गया है, सड़क के बीचोंबीच फूल वाले पौधों की कतार या रेलिंग लगाई गई है, सड़क किनारे फुटपाथ और वृक्षारोपण की योजनाओं पर धन खर्च किया गया है। अफसोस यही है कि कोई भी वक्ता यह नहीं कहता कि अमुक सड़क को पैदल या साइकल पर चलने वालों के लिये सुरक्षित बनाया गया है। हर सड़क का विकास कार, बस, ट्रक को ध्यान में रखकर किया जाता है। पैदल चलने वाले कीड़े-मकोड़े की किसे परवाह है?
सड़क पर जुल्म ढाने वाले भी कम नहीं होते हैं। वैसे तो उसका जन्म ही भयंकर जुल्मों और दमन के बीच होता है। मिट्टी, ईंट, पत्थर, गरम कोलतार और वह भारी भरकम रोड रोलर। इनके घालमेल, दमन से बनी सड़क आधुनिक वाहनों के बोझ तले किसी तरह अपने दिन काटने को होती है कि जुल्मी पहुँच जाते हैं। जिसके घर के भीतर जगह नहीं होती है, वह सबसे पहले सड़क पर आता है। लोहे या लकड़ी का खंूटी गाड़ता है और अपनी गाय भैंस बाँध देता है। शरीर में गड़ा खंूटा और शरीर पर पशु का गोबर मूत्र! सड़क कैसे साँस लेती होगी। उसके बाद आते हैं, घर के सामने विवाह-शादी या अन्य समारोहों के मंडप बनाने वाले। लोहे के लंबे और तीखे खंूटे गाड़े जाते हैं। पानी, बिजली, टेलीफोन का कनेक्शन लेने वाले तो उसे आरपार तोड़ते हैं और अपनी पाइप या तार डालकर वैसा ही छोड़कर चले जाते हैं। सड़क के बीच बने टूटी सड़क के अवरोध से जब वाहन टकराकर जाते हैं तो दर्द सड़क को होता है और दुर्वचन निकलते हैं वाहन चालकों या उसमें बैठने वालों के मुँह से सड़क के लिये। इसी बीच यदि सीवरेज वाले आ जाते हैं तो सड़क के प्राण ही निकाल देते हैं, उसे पुनर्जन्म लेना पड़ता है।
घर के भीतर का कूड़ा, मरा चूहा, इन्हें फेंकने के लिये आदर्श जगह सड़क ही है। कभी कभी गंदे पानी की नालियों में अवरोध आ जाता है तो सड़के गंदे पानी का तालाब बन जाती है, उसकी बदबू तभी हटती है जब बरसात आती है। बरसात भी तो सड़क को कीचड़ और कहीं कहीं ठहरे बरसाती पानी का उपहार दे जाती है। कीचड़ और पानी देते हैं मच्छरों का उपहार। उनसे मिलता है मलेरिया, पीलिया, बी-हेपेटाइटिस वगैरह, सड़क का इलाज कौन करे यहाँ मनुष्यों का ही इलाज मुश्किल से हो पाता है। आदमी खुद ज्यादा ही मलेरिया ग्रस्त होने लगता है तो कभी कभी सड़क पर खड़े पानी को देखकर सड़क के नथूनों में मिट्टी का तेल या डीडीटी का पाउडर घुसेड़ देता है।
सड़क अतिक्रमण एक आम बीमारी है। इस रोग से शहर का मनुष्य ही कुछ ज्यादा ग्रस्त होता है। गाँव का कैसे हो? वहाँ सड़क होती नहीं, होती है तो ऐसी कि मारे शर्म के धूल, मिट्टी, कीचड़, गोबर के पीछे मुँह छिपाये बैठे रहती है। शहर वाले अक्सर गंदी नालियों के पास आकर अपने अतिक्रमण की गति को मन मसोसकर रोक लेते हैं। पर कुछ ऐसे दुस्साहसी, एवरेस्ट विजेता भी होते हैं कि नाली पारकर सड़क की जमीन पर कब्जा कर लेते हैं। कई बार सड़क वाले भी मजाक करते हैं। सड़क को चौड़ी करने के नाम पर, उसके सौंदर्य बरसों पहले बने मकान तोड़ देते हैं।
समय देश-सीमाओं, परपंराओं की तरह सड़क का बनना टूटना भी होता रहता है। टूटने बनने को छोड़े और सड़क को देखें तो लगेगा सड़क संस्कृति हमारी में की पहचान भी है। सड़क किनारे मंदिर बनाने की होड़ जारी है। सड़कों के किनारे लगे विज्ञापन पट, फिल्मों के पोस्टर, नशीली वस्तुओं की दुकानें, संस्कृति के पतन की कहानी सुनाते रहते हैं। सड़कों की उपमा किससे करें। पहले सनते रहे हैं पेरिस में सड़के ऐसी हैं कि जैसे रबड़ की हों। हमारे यहाँ? एक हँसोड़ जनप्रतिनिधि का कहना है कि हमारी वर्तमान सड़कें फिल्मों के उस चरित्र अभिनेता की तरह है जिसका चेहरा चेचक के दागों से भरा पड़ा है। यदि मेरा शासन चलता रहा तो सड़कों को आज की नम्बर वन हीरोइन के गालों जैसा बना दूंगा। सड़क की तुलना फिर नर-नारी के देह से हो गई।
सड़क साहित्य भी होता है। सड़कछाप साहित्य भी होता है। सड़क पर साहित्य बिकता भी है। कुछेक साहित्यकारों को छोड़ दें तो अधिकांश सड़क पर ही नजर आते हैं। अनेक साहित्यकारों ने सड़क पर कथा-कविता भी लिखी है। चित्रकारों और चलचित्रकारों ने भी सड़क को नहीं छोड़ा है। कितनी ही किताबों, फिल्मों का नाम सड़क से जुड़ा है। कुछ सड़कों के नाम भी किताबों-फिल्मों से लिये गये हैं।
कुछेक सड़कों को छोड़ दें तो अधिकांश सड़कों के नाम होते हैं। कई सड़कों के नाम तो बारबार बदले जाते रहे हैं। कागजों में सड़क का नाम कुछ और होता है, जबान पर कुछ और होता है। नाम वही ज्यादा चलता है जो लोग रखते हैं।
सड़क चलती रहती है, जबान चलती रहती है। सड़क भी फिसलने वाली होती है, उस समय हड्डियां टूटती हैं। जबान भी फिसलने वाली होती है, जबान फिसले तो पता नहीं क्या-क्या टूटता है। महाभारत बन जाता है। ---सड़क के रंग बदलते रहते हैं। सड़क सौंदर्यकरण के नाम पर कितने ही रुपये खर्च दें, सड़क तब तक सुंदर नहीं लगेगी जब तक उस पर गोलगप्पों की रेहडिय़ाँ नहीं होंगी। गोलगप्पे वाला होगा तो वहाँ सुंदरियों का हुजूम होगा, सड़क अपने आप सुंदर सड़क कहलाने लगेगी। वहाँ सड़कीले लोग भी आ जाएंगे। सड़कीला नया शब्द लगा न! जब तड़क-भड़क वाले को भड़कीला कहते हैं तो सजीला बनकर सड़क पर आने वाले को सड़कीला क्यों नहीं कहेंगे।
| गोविन्द शर्मा |
कुछ भी कहें, पर जरा सड़क का ध्यान रखें। कीलों, खूंटों, कस्सी, कुदालों से उसका तन-मन न छेदें, आवश्यक हो तो उसके जख्मों को बिना मरहम पट्टी के न छोड़ें, विवाह का तमाशा दिखाकर बाद में उसे न रुलायें, कुछ ऐसा न हो कि न्याय की माँग करने वाली जनता पर आँसू गैस और गोलियाँ बरसें और सड़क रोये भी और खून से नहाये भी। माना कि सड़क पैरों के नीचे होती है, पर उसे पददलित घोषित न करें, जब आप सड़क पर ठोकर खाते हैं तो सिर्फ अपना ही नहीं, सडक का दर्द भी महसूस करें और ठोकर से बचें। चौकीदार बनकर चाहे रात में सड़क की शांति भंग करें पर चोर बनकर नहीं। सड़क को बेजान नहीं, जीवंत मानकर महसूसें।
गोविन्द शर्मा
ग्रामोत्थान विद्यापीठ संगरिया - 335063
जिला हनुमानगढ़ (राजस्थान)
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