क्या होता है काले ब्रीफ-केस में?

इन दिनों 'परमाणु-बटन' चर्चा में है। क्या वाकई कोई ऐसा 'ब्रीफ-केस' होता है जिसमें परमाणु-बम का बटन होता है? यह 'ब्रीफ केस' परमाणु शक्ति सम्पन्न देश का राष्ट्राध्यक्ष, सत्ता परिवर्तन के समय अपना पद भार नए राष्ट्राध्यक्ष को देते समय सौंपता है। कई बार ऐसा भी होता है कि राष्ट्राध्यक्ष अपना यह कथित 'ब्रीफ केस' अपने किसी उच्चाधिकारी को भी सौंप देता है और कई बार विदेश-यात्राओं पर जाते समय भी अमेरिका के राष्ट्रपति इसे साथ ले जाते हैं ताकि आपातकाल में इसका प्रयोग हो सके।

अमेरिका, फ्रांस, रूस और चीन व कुछ अन्य देशों में यह 'ब्रीफ केस' राष्ट्राध्यक्षों के पास ही रहता है।

भारत थोड़ा अलग है। हमारे यहां ऐसा कोई ब्रीफ केस नहीं होता। हमारे देश में एक 'न्यूक्लीयर कमांड अथॉर्टी' (एनसीए) होती है और उसकी एक राजनैतिक सलाहकार समिति भी होती है। इस राजनैतिक सलाहकार समिति का अध्यक्ष स्वयं प्रधानमंत्री होता है जबकि कार्य परिषद की अध्यक्षता राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार करता है। इन मामलों में डोभाल साहब का विशेष दायित्व है।

प्राय: आपने देखा होगा कि जब भी हमारे प्रधानमंत्री किसी यात्रा पर जाते हैं तो उनके साथ-साथ एक काला ब्रीफ केस उठाए एक एसपीजी अधिकारी भी चलता है। पड़ौसी देश पाकिस्तान में प्रधानमंत्री इमरान खान के पास एक काले रंग का 'ब्रीफ केस' रहता है। गत 11 अप्रैल, 2019 को इस बात की पुष्टि बीबीसी ने भी की थी। उसके अनुसार ब्रीफ केस में वह 'कोड' होता है जिसके आधार पर इमरान खान इस एटमी-बटन का 'दुरुपयोग' कर सकते हैं। लेकिन यहां चर्चाएं यह भी रहती हैं कि इस 'कोड' की एक अनुकृति वहां के सेनाध्यक्ष के पास भी रहती है। 

रूस में इस ब्रीफ केस का कोड-नाम 'चेगेट' है और इनकी संचार-प्रणाली को 'काज़बेक* कहा जाता है। यद्यपि अधिकारिक तौर पर रूस की सरकार ने इस संबंध में कुछ नहीं कहा लेकिन अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी के अनुसार ऐसे काले ब्रीफ केस, प्रतिरक्षा मंत्री और 'ची$फ आ$फ जनरल स्टाफ' को भी दिए जाते हैं। मुख्य कोड राष्ट्रपति के पास रहता है।

यद्यपि इतिहास में ज़्यादा विवरण नहीं मिले लेकिन यह तो ऐतिहासिक तथ्य है कि अमेरिका ने 6 और 9 अगस्त, 1945 को जापानी नगरों हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम फैंके थे। इन दोनों में क्रमश: 1 लाख 29 हजार और दो लाख 26 हजार लोग मारे गए थे। वहां इतना प्रदूषण फैल गया था कि वनस्पति व जीव जंतु भी तबाह हो गए हैं। अब भी इन दो तारीखों को जापानी जनता बड़ी संख्या में वहां एकत्र होती है और मरने वालों की स्मृति में लाखों मोमबत्तियां जलाई जाती हैं।

अब इसी खेल में उत्तरी कोरिया के तानाशाह किम भी कूद पड़े हैं। वह 'बेगानी शादी में दीवाना अब्दुल्लाह' अक्सर बन जाते हैं। उन्होंने अपने 'काले ब्रीफकेस' हवा में लहराने आरंभ कर दिए हैं।

जहां एक ओर अमेरिका, चीन व रूस और कुछ हद तक ब्रिटेन एटमी हथियारों के मामलों में पूरी गंभीरता बरत रहे हैं, वहां इन दिनों की सरकारों को चुस्त-दुरुस्त जासूस, विरोधी नेताओं की मानसिकता का अध्ययन करने में भी जुटे हुए हैं।

चर्चा यही है कि अमेरिका ने अपने लगभग एक हजार जासूसों को पुतिन व उनके मुख्य सहायकों पर नज़र रखने के लिए तैनात किया है। ये जासूस पुतिन की नवीनतम तस्वीरों के हावभाव का भी सूक्ष्म अध्ययन करते रहते हैं। इनके अब तक के निष्कर्ष यही बता रहे हैं कि पुतिन बौखलाए हुए हैं और जेलेंस्की हताश हैं। वह समर्पण करने की स्थिति में भी नहीं है। यदि वह ऐसी कोई घोषणा करते हैं तो निश्चित है कि उनका कोई अपना सहयोगी ही उन्हें गोली मार सकता है। जितनी जासूसी अमेरिका करा रहा है, उतने ही शातिर जासूस पुतिन ने भी पोलैंड व अन्य उन सभी देशों में तैनात कर रखे हैं जो 'नाटो' के सदस्य हैं। किसी भी नाटो-देश ने रूस की ओर टेढ़ी आंख से देखा तो पुतिन के ये जासूस ऐसे किसी नाटो-हमले से पहले ही कोई कार्रवाई कर सकते हैं। पुतिन वैसे भी दो दशक तक  रूसी एजेंसी केजीबी के जासूस के रूप में काम कर चुके हैं। आज के माहौल में यह भी बखूबी दोहराया जा सकता है कि 'मैं किसके हाथ पे अपना लहू तलाश करूं/तमाम शहर ने पहने हुए हैं दस्ताने'।

चारों तरफ बहुमंजि़ली इमारतों का मलबा, लाशों के ढेर, कराहते घायल लोग, न बिजली, न पानी, न खाने का सामान। भागते हुए बच्चे, औरतें, बूढ़े व लाचार लोग। अब तक लगभग २२ लाख लोग थोड़े कपड़े-लत्ते बगल में दबाए, आस पड़ौस के देशों में बदहवासी के आलम में शरण ले चुके हैं। उनकी जि़ंदगी में फिलहाल कुछ नहीं बचा।

लगभग ६ लाख ३५०० वर्ग किलोमीटर में फैला यह देश कभी ४.३५ करोड़ की आबादी वाला भरा पूरा देश था। इसे कुछ भाषाओं में यूक्रेनिया भी कहा जाता था। यूरोप का यह ८वां सर्वाधिक आबादी वाला देश था। वैसे इसका इतिहास ३२००० वर्ष पुराना है। वर्ष १९३९ में इस पर सोवियत संघ ने कब्ज़ा कर लिया था। इस कब्ज़े से उसे १९९१ में तब मुक्ति मिली थी जब सोवियत संघ कई देशों में बंट गया था।

इस लम्बे-चौड़े हरे भरे देश के लगभग सभी २५ महानगरों में चारों तरफ ऐतिहासिक इमारतों का मलबा फैला है। लाखों की संख्या में लाशें इन मलबों के तले दबी हैं। जो लोग आसपास के देशों में पनाह ले सकते थे वे पलायन कर चुके। अब तक कितने मरे, कितने पलायन कर चुके यह आंकड़ा वहां की सरकार के पास भी नहीं है। इतिहास के पास ढेरों सबक हैं। मगर इतिहास से सबक सीखने को कोई भी तैयार नहीं।

पुतिन को कुछ भी याद नहीं, सिवाय तबाही के। वह टालस्टास, तुर्गनेव, चेखव, दास्थत्यावस्की, सोल्ज़ेनित्सिन, सबको भूल गए। वह यह भी भूल गए कि उनका जन्म किन परिस्थितियों में हुआ था। वह भले ही पूरी तरह न भूल पाए हों लेकिन वह कमोबेश यह तो भूल ही गए कि उनकी मां उस समय गंभीर घायल अवस्था में लाशों के ढेर के नीचे दबी थी, तब पुतिन उस घायल मां के गर्भ में थे।

पुतिन के पिता युद्ध में लड़ रहे थे। उनको जब खबर मिली कि उनके अपने गांव में अधिकांश लोग मारे गए थे तो वह अपने अधिकारियों से विशेष अनुमति लेकर वापिस अपने तबाह हो चुके गांव लौटे थे। गांव के बाहर उन्होंने शवों से लदे $फौजी ट्रक देखे तो वह कांप गए थे। लाशों के उस ढेर के नीचे उन्होंने एक जिस्म दबा देखा जिसके पांवों में वही सैंडिल थे जो उन्होंने अपनी पत्नी को विदेश से लाकर भेंट किए थे। वह कांप उठे थे। उन्होंने वहां तैनात फौजी अधिकारियों से आग्रह किया कि उस दबे जिस्म को बाहर निकलवाने में मानवीय आधार पर उनकी मदद की जाए। जब दबे हुए जिस्म को लाशों के ढेर से निकाल गया तो उसमें अभी भी कुछ सांसें सुनाई दे रही थीं। आनन फानन में उसे वहां के एक फौजी अस्पताल में ले जाया गया, जहां ब्लादिमीर पुतिन का जन्म हुआ। साभार: डॉ. चन्द्र त्रिखा

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