भगवंत मान को सब याद है। याद रखेंगे तो निश्चित रूप से समय की दीवार पर एक अनूठी इबारत लिख जाएंगे। यदि छिपने-छिपाने या भूलने की कोशिश करेंगे तो जिस जनता ने बादल-परिवार, कैप्टन अमरेंदर, सिद्धू, बिक्रमजीत सिंह, आदेश प्रताप कैरों आदि को बेरहमी से बुहारा, उस जनता के सामने भगवंत मान नाचीज़ हैं।
मगर एक बात यह है कि यदि अपनी अतीत की कमज़ोरियों को याद रखेंगे और उन पर अपने मज़बूत इरादों, संकल्पों की परत चढ़ा लेंगे तो उनकी 'कुल्फी गरमागरम' भी खूब बिकेगी और लम्बी पारी खेलने का मौका भी मिलेगा। कुल २६ एलबम, १३ फल्में, पांच गानों के रिकार्ड, एक दैनिक समाचार-पत्र में स्तम्भ-लेखन आदि उनके खाते में उपलब्धियों के रूप में दर्ज हैं लेकिन कुछ अन्य बातें भी दर्ज हैं जो मान को सचेत करती रहेंगी और 'सियासत' एक 'कॉमेडी' ही नहीं, 'ट्रेजडी' भी सिद्ध होती। जो बातें मान भूल नहीं पाएंगे उनमें से चार मुख्य रूप से ऐसी हैं जो उन्हें 'हांट' करती रहेंगी।
१. २०१५ में फेसबुक पर पत्नी से तलाक की घोषणा की। इसका भी राजनीतिक लाभ लेने का आरोप लगा। पत्नी भी शराब के नशे में मारपीट करने और घरेलू हिंसा का आरोप लगा चुकी है।
२. २०१५ में संगरूर में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी के खिलाफ चल रहे संघर्ष में फायरिंग के दौरान युवकों की मौत हो गई। इसके खिलाफ प्रदर्शन के समय भी शराब पीने का आरोप लगा था।
३. २०१६ में गायक मनमीत अलीशेर के अंतिम संस्कार में शराब पीकर पहुंचने का आरोप लगा था। इसके अलावा कैप्टन अमरिंदर सिंह भी सदन में शराब पीकर आने का आरोप लगा चुके हैं। जुलाई २०१६ में संसद की कार्रवाई का फेसबुक लाइव वीडियो चला दिया। इस पर लोकसभा अध्यक्ष ने सत्र से निष्कासित कर दिया। बाद में इन्हें निलंबित भी किया गया।
४. यदि नए संकल्पों पर कायम रहेंगे और कड़ुवाहटों भरे अतीत को भी सत्कर्मों के 'झाड़ू' से बुहार देंगे तो वह निश्चित रूप से लम्बे अरसे तक आम आदमी के ज़ेहन पर सवार रहेंगे।
हर जनादेश कुछ ठोस सबक देता है। मगर सीखता कोई नहीं। सियासी नतीजे अर्थात् जनादेश इस बार बता रहे हैं कि पिछले सात दशक में भारतीय लोकतंत्र ने ठोस फैसले लेना सीख लिया है लेकिन सियासी नेताओं का एक वर्ग दो मुहावरे उछाल देता है-
१. पहला यह कि जनता की स्मरण शक्ति ज़्यादा लम्बी नहीं रहती। चार दिन बाद लोग भूल जाते हैं, चार दिन पहले क्या सीखा था।
२. भगवंत मान हों या केजरीवाल, सभी इसी मिट्टी के 'बावे' हैं। चार दिन का जोश है, मद्धम पड़ जाएगा।
मगर ये मुहावरे भी पुराने हो चुके। हार, जीत, मुद्दे, संकल्प, कस्में, वादे, ये सारे जुमले बुहारे जा चुके हैं।
भगवंत मान को अधिकार है कि वह शहीदे-आज़म भगत सिंह की समाधि पर जाकर शपथ लें या चंडीगढ़ के राजभवन में शपथ लें। वैसे भगत सिंह की समाधि से अपनी नई पार्टी की शुरुआत तो मनप्रीत बादल ने भी की थी। तब भगवंत मान भी साथ थे। मनप्रीत बादल 'मिस्टर-क्लीन' भी माने जाते रहे। हर सभा में, हर समारोह में फैज़ अहमद फैज़ की शायरी की चर्चा भी अवश्य करते थे। इस बार वह भी ६३५८१ वोटों से पिट गए। आप कितना भी ईमानदारी का ढोल बजा लें, आम आदमी बार-बार न तो इस ढोल का शोर पसंद करता है न ही यह 'घिसी पिटी दलील' कि '$खज़ाना खाली है।'
इस चुनाव में समूचे बादल-परिवार की पराजय भी अपने आप में छोटी खबर नहीं है, मगर सबसे बड़ी खबर की इबारत अमृतसर (पूर्वी) से एक सामान्य
मगर साफ-सुथरी छवि वाली महिला जीवनजोत कौर ने लिखी। इस सामान्य महिला ने इस विधानसभा क्षेत्र में पंजाब कांग्रेस के बड़बोले प्रधान नवजोत
सिंह सिद्धू को भी हराया और बादल-परिवार के निकटतम बिक्रम सिंह मजीठिया पर भी झाड़ू फेर दिया।
यही स्थिति 'महाराजा' की रही। बरसों तक राज-परिवार की धाक को भुनाते रहे कैप्टन अमरेंदर सिंह। मगर इस बार एक युवा चेहरे ने उन्हें बताया कि 'जागो महाराज' वक्त बदल चुका है।'
चलिए भगवंत मान पर लौटें। वर्ष १९७३ की १७ अक्तूबर को जन्मे भगवंत का सियासी स$फर सि$र्फ ११ वर्ष पुराना है। स्कूली पढ़ाई गांव के स्कूल से की। बाद में ११वीं में सुनाम के शहीद उधम सिंह कॉलेज में दाखिला लिया था। इसी दौरान मान ने कलाकारी की दुनिया में कदम रखा। कॉलेज के मंचों पर हास्य कलाकार की भूमिका निभाने लगे थे। शुरुआत में वह मंच पर टीवी एंकरों की नकल करते थे। धीरे-धीरे मान कॉलेज यूथ फेस्टीवल में हिस्सा लेने लगे। जिससे उन्हें प्रसिद्धि मिलनी शुरू हो गई। दो बार पंजाब यूनिवर्सिटी में स्वर्ण पदक प्राप्त किए। मान ने अपने साथी कलाकार जगतार जग्गी के साथ जोड़ी बनाई। मान की सबसे पहली कॉमेडी कैसेट 'कुल्फी गरमा गरम' ने उन्हें रातोंरात स्टार बना दिया। ऐसे में वह बीकॉम की पढ़ाई पहले साल ही अधूरी छोड़ कलाकारी की दुनिया में चले गए। 'जुगनू कहंदा है', पहला टेली प्रोग्राम दिया। इस दौरान मान ने कई फिल्मों में भी काम किया। वर्ष २००८ में स्टार प्लस पर ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज में भाग लिया था जिसके बाद पूरे देश में हास्य कलाकार के तौर पर जाने गए। नेशनल अवार्डी फिल्म 'मैं पंजाब मां की' में भी काम कर चुके हैं।
मगर भगवंत मान को अब यह भी याद रखना होगा कि पंजाब एक सरहदी प्रांत है। पाकिस्तान से सीमाएं सटी हुई हैं। पंजाब ने आतंकवाद का संताप भी डेढ़ दशक तक झेला है। दो-दो युद्ध भी झेले हैं। यह अतीत उन्हें वर्तमान में भी पूरी तरह याद रखना होगा।
साभार: डॉ. चन्द्र त्रिखा
कोई टिप्पणी नहीं
एक टिप्पणी भेजें