‘द ग्रेट गामा’ के नाम से विख्यात रहे गामा पहलवान ने पूरी दुनिया में भारतीय कुश्ती का ऐसा डंका बजाया कि लोग उनकी कहानियां सुनकर रोमांचित हो उठते हैं।
22 मई 1878 को अमृतसर के जब्बोवाल गांव में गामा पहलवान का जन्म हुआ था। रिपोट्र्स के मुताबिक एक कश्मीरी मुस्लिम परिवार से आते थे और उनके पिता मुहम्मद अजीज बक्श दतिया के तत्कालीन महाराजा भवानी सिंह के दरबार में कुश्ती लड़ा करते थे। हालांकि गामा पहलवान के जन्म के बारे में एक तथ्य यह भी बताया जाता है कि उनका जन्म मध्यप्रदेश के दतिया में हुआ था लेकिन विकिपीडिया पर मौजूद जानकारी के मुताबिक वे अमृतसर में ही पैदा हुए थे।
जब गामा पहलवान 6 साल के थे तभी उनके पिता चल बसे। इसके बाद गामा के नाना ने उन्हें और उनके भाई को कुश्ती सिखाई गामा पहलवान पहली बार दुनिया की नजर में आए तब उनकी उम्र केवल 10 बरस थी। 1888 में जोधपुर में एक प्रतियोगिता हुई थी और इसमें 400 से अधिक पहलवानों ने हिस्सा लिया था और गामा अंतिम 15 में शामिल थे। जब आयोजकों ने इतनी कम उम्र में ही उनके चमत्कारिक प्रदर्शन को देखा तो उन्हें विजेता घोषित कर दिया गया।
रिपोट्र्स के अनुसार, गामा अपने अखाड़े में 40 पहलवानों के साथ कुश्ती की प्रैक्टिस करते थे। गामा अपनी फिटनेट के लिए खानपान का विशेष ध्यान रखते थे। वो रोज 6 देसी चिकन, 10 लीटर दूध और बादाम के शर्बत अपनी डाइट में शामिल करते थे। इतना ही नहीं ट्रेनिंग के दौरान वह रोज 5 हजार स्क्वैट्स यानी बैठक और 3000 पुशअप यानी दंड किया करते थे।
गामा के बारे में यह मशहूर है कि अपने 50 साल से अधिक के करियर में वह कभी किसी से कुश्ती में नहीं हारे। अपने करियर में उन्होंने वल्र्ड हैवीवेट चैम्पियनशिप (1910) और वल्र्ड कुश्ती चैम्पियनशिप (1927) भी जीता, जहां उन्हें ‘टाइगर’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में गामा पहलवान रुस्तम-ए-हिंद बने।
22 मई 1878 को अमृतसर के जब्बोवाल गांव में गामा पहलवान का जन्म हुआ था। रिपोट्र्स के मुताबिक एक कश्मीरी मुस्लिम परिवार से आते थे और उनके पिता मुहम्मद अजीज बक्श दतिया के तत्कालीन महाराजा भवानी सिंह के दरबार में कुश्ती लड़ा करते थे। हालांकि गामा पहलवान के जन्म के बारे में एक तथ्य यह भी बताया जाता है कि उनका जन्म मध्यप्रदेश के दतिया में हुआ था लेकिन विकिपीडिया पर मौजूद जानकारी के मुताबिक वे अमृतसर में ही पैदा हुए थे।
जब गामा पहलवान 6 साल के थे तभी उनके पिता चल बसे। इसके बाद गामा के नाना ने उन्हें और उनके भाई को कुश्ती सिखाई गामा पहलवान पहली बार दुनिया की नजर में आए तब उनकी उम्र केवल 10 बरस थी। 1888 में जोधपुर में एक प्रतियोगिता हुई थी और इसमें 400 से अधिक पहलवानों ने हिस्सा लिया था और गामा अंतिम 15 में शामिल थे। जब आयोजकों ने इतनी कम उम्र में ही उनके चमत्कारिक प्रदर्शन को देखा तो उन्हें विजेता घोषित कर दिया गया।
रिपोट्र्स के अनुसार, गामा अपने अखाड़े में 40 पहलवानों के साथ कुश्ती की प्रैक्टिस करते थे। गामा अपनी फिटनेट के लिए खानपान का विशेष ध्यान रखते थे। वो रोज 6 देसी चिकन, 10 लीटर दूध और बादाम के शर्बत अपनी डाइट में शामिल करते थे। इतना ही नहीं ट्रेनिंग के दौरान वह रोज 5 हजार स्क्वैट्स यानी बैठक और 3000 पुशअप यानी दंड किया करते थे।
गामा के बारे में यह मशहूर है कि अपने 50 साल से अधिक के करियर में वह कभी किसी से कुश्ती में नहीं हारे। अपने करियर में उन्होंने वल्र्ड हैवीवेट चैम्पियनशिप (1910) और वल्र्ड कुश्ती चैम्पियनशिप (1927) भी जीता, जहां उन्हें ‘टाइगर’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में गामा पहलवान रुस्तम-ए-हिंद बने।
ट्रेनिंग देखकर ब्रूस ली भी उनके फैन हो गए
बताया जाता है कि एक बार तो उन्होंने अमेरिकन मार्शल आर्ट आर्टिस्ट ब्रूस ली को भी चैलेंज किया था लेकिन जब ब्रूस ली गामा पहलवान से मिले तो उन्होंने उनसे ‘द कैट स्ट्रेच’ सीखा, जो योग पर आधारित पुश-अप्स का वैरिएंट है। इसके बाद ब्रूस ली गामा की डाइट और ट्रेनिंग देखकर उनके फैन हो गए। विकिपीडिया पर गामा और बू्रस ली की मुलाकात के बारे में जिक्र किया गया है। गामा पहलवान ने अपने जीवन की आखिरी कुश्ती 1927 में स्वीडन के पहलवान जेस पीटरसन से लड़ी थी।
आर्थिक तंगी और कष्ट में बीते अंतिम दिन
कई रिपोट्र्स के अनुसार, विभाजन के बाद गामा पहलवान अमृतसर से लाहौर रहने चले गए थे। लेकिन वहां उनका ध्यान नहीं रखा गया और वे पैसों की तंगी से वो जूझते रहे। कुश्ती छोडऩे के बाद उन्हें अस्थमा और हृदय रोग की शिकायत हुई और उनकी हालत खराब होती गई। उनके पास इतनी आर्थिक तंगी आ गई थी कि आखिरी समय में उन्हें अपनी मेडल तक बेचना पड़े थे। आखिरकार 1960 में 82 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
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