जन संदेश न्यूज नेटवर्क
चंडीगढ़: फ्री हैंड मिलने के बाद भूपेंद्र सिंह हुड्डा के लिए यह पहला बड़ा टेस्ट था लेकिन राज्यसभा चुनाव में अजय माकन की हार ने एक बार फिर प्रदेश कांग्रेस में कलह का रास्ता तैयार कर दिया है। इसमें विधानसभा में विपक्ष के नेता सीनियर हुड्डा बुरी तरह से नाकाम साबित हुए हैं। यह तब हुआ है जब कांग्रेस के पास 31 विधायक थे। रिसॉर्ट पॉलिटिक्स भी एडवांस में शुरू हो चुकी थी। इसके बावजूद माकन की हार ने न केवल राज्य स्तर पर बल्कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के लिए भी परेशानी बढ़ा दी है।
इसी वर्ष 27 अप्रैल को ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी ने हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी में अहम बदलाव किए थे। इसके तहत हुड्डा के करीबी उदयभान को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। इसके साथ ही राज्य में पार्टी के कामकाज को लेकर हुड्डा को फ्री हैंड भी दिया गया था। इसके कुछ ही वक्त बाद राज्यसभा चुनावों की घोषणा हुई थी जिसे हुड्डा के नेतृत्व की पहली परीक्षा माना गया था। यहां बता देना जरूरी होगा कि पार्टी ने हुड्डा को मनमाफिक विकेट भी तैयार करके दिया था। हुड्डा से राइवलरी और जातीय समीकरणों के चलते क्रॉस वोटिंग की समस्या न हो, इसके लिए रणदीप सुरजेवाला को राजस्थान से मैदान में उतारा गया था। इसके बाद गांधी परिवार के वफादार माने जाने वाले अजय माकन को यहां पर उम्मीदवार बनाया गया था।
बिश्नोई ने बिगाड़ा काम
भूपिंदर सिंह हुड्डा को अजय माकन को जीत दिलाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। वैसे अगर देखा जाए तो हुड्डा ने अपने बेटे दीपेंद्र और प्रदेश अध्यक्ष उदयभान के साथ मिलकर माकन को चुनावी नैया पार कराने के प्रयास में कोई कसर भी नहीं छोड़ी थी। लेकिन हुड्डा के चिरपरिचित विरोधी कुलदीप बिश्नोई की योजनाएं कुछ और ही थीं। माना जा रहा है कि कुलदीप बिश्नोई के मन में हरियाणा कांग्रेस का प्रमुख न बन पाने की टीस थी। उन्होंने कहा था कि वह राहुल गांधी से मुलाकात के बाद ही अगला कदम उठाएंगे। एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के अनुसार, राहुल गांधी कुलदीप बिश्नोई के दबाव में नहीं आए।
30 वोटों का था भरोसा लेकिन मिले 29 ही
शुरुआती दौर में कांग्रेस पार्टी कुलदीप बिश्नोई के वोट को नहीं काउंट कर रही थी। इसके बावजूद उसे भरोसा था कि 30 विधायकों के दम पर अजय माकन उच्च सदन की देहरी लांघने में कामयाब हो जाएंगे लेकिन कांग्रेस ने निष्कासित विनोद शर्मा के बेटे कार्तिकेय शर्मा की एंट्री होते ही सारा गेम प्लान फेल हो गया। कार्तिकेय को दुष्यंत चौटाला की जेजेपी के साथ सीएम खट्टर, छह निर्दलीय विधायकों और इंडियन नेशनल लोकदल व हरियाणा लोकहित पार्टी के एक-एक विधायक का समर्थन मिला। मुकाबले का रुख भांपकर हुड्डा ने सभी 31 पार्टी विधायकों को दिल्ली बुला लिया। यहां से इन सभी को चार्टर्ड प्लेन से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के फाइव स्टार रिसॉर्ट में ले जाया गया। हालांकि यहां पहुंचने वाले कुल कांग्रेसी विधायकों की संख्या केवल 29 ही थी। बिश्नोई के साथ एक अन्य हुड्डा विरोधी किरण चौधरी ने दूरी बना ली थी। वहीं दो जून से 10 जून तक दीपेंद्र हुड्डा कांग्रेस विधायकों के साथ बने रहे।
लग नहीं रहा कि खत्म हो जाएगी कांग्रेस की गुटबाजी
वोटिंग के दिन बिश्नोई ने पार्टी के उम्मीदवार का साथ नहीं दिया। वहीं ये आरोप भी है कि किरण चौधरी ने जानबूझकर अपना वोट खराब कर दिया। इसके साथ ही माकन की किस्मत का ताला बंद हो चुका था। एक अंग्रेजी दैनिक के अनुसार, हुड्डा ने स्वीकार किया कि उन्होंने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी थी लेकिन वह राजनीति का शिकार हो गए। हुड्डा के मुताबिक बिश्नोई को छोडक़र भी 30 वोट थे लेकिन दुर्भाग्य से एक वोट खारिज हो गया। उन्होंने कहा कि बाकी 29 विधायक डटे रहे और तमाम प्रलोभनों के बावजूद पार्टी निष्ठा से डिगे नहीं। उन्होंने इस हार को राजनीति का हिस्सा बताया। वहीं एक वरिष्ठ भाजपा नेता का कहना है कि कांग्रेस के अंदर गुटबाजी कभी खत्म नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि सभी को पता है कि वहां कई पॉवर सेंटर्स हैं। सभी एक-दूसरे के खिलाफ मौके की तलाश में रहते हैं। कुछ ऐसा ही इस बार भी हुआ है। यही वजह है कि पर्याप्त संख्याबल होते हुए भी वह अपने हाईकमान द्वारा तय उम्मीदवार को जिता नहीं सके।
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