तनाव भरे कार्यक्रमों से न घोलें माहौल में ज़हर ‘प्लीज़’


पूरे विश्व में नफरत या मुहब्बत फैलाने की सार्मथ्य अकेले सोशल मीडिया में है। यदि इतने तीखे स्वरों में ज़हर फैलाने का वर्तमान सिलसिला जारी रहा तो भी समाज में चारों तरफ वैचारिक कचरा फैलने का खतरा है, तनावभरी खबरों के बीच एक सुखद खबर भी है, साहित्यकार गीतांजलिश्री को उपन्यास ‘रेत समाधि’ पर प्रतिष्ठित ‘इंटरनेशनल बुकर’ पुरस्कार मिला है।


कुछ दशक पहले सांझ ढलते ही दूरदर्शन पर ‘चित्रहार’ सरीखे कार्यक्रम शुरू हो जाते तो आस-पास के परिवार भी उन घरों की ओर लपकते, जिन घरों में टीवी थे। सुबह होती तो भक्ति संगीत और दोपहरी में शास्त्रीय संगीत। अब सांझ ढलते ही जब समाचारों के लिए टीवी खुलता है तो सामने- टकराव, वाक्युद्घ, ‘आमने-सामने’, ‘हल्ला बोल’ और ऐसे ही बिन्दु कुनमुनाने लगते हैं। मेरे पास लेटी है पोती ‘इनारा’। वह अक्सर पूछ लेती है, ‘दादा जी ये लोग लड़ क्यों रहे हैं? आप इन्हें समझाते क्यों नहीं?’

मेरे पास नन्हीं पोती के ऐसे सवालों का एक ही जवाब है, ‘बिटिया इन्हें अच्छी लड़ाई का इनाम मिलता होगा।’ वह फिर पूछती है, ‘मगर लड़ाई में तो डांट पड़ती है, इनाम थोड़े ही मिलता है?’ मेरे पास उन मासूम सवालों का कोई उत्तर नहीं है। बच्ची को क्या मालूम कि लड़ाई जितनी तीखी होगी, उतना ही विज्ञापन ज्यादा मिलेगा। विज्ञापन, मुनाफा, टीआरपी का खेल, मैं किसी भी बच्चे को समझाना भी नहीं चाहता। जि़न्दगी ‘टीआरपी’ तक सीमित नहीं है। इस सीधी सहज-सी बात को न तो एंकर को समझाई जा सकती है, न ही प्रायोजकों को और न ही चैनल-संचालकों को। उन्हें चैनल के हर लम्हें को मुनाफे में बदलना है।

मगर प्रायोजक, चैनल संचालक, एंकर व प्रतिभागी-प्रवक्ता यह भूल रहे हैं कि यह खेल लम्बा नहीं चलने वाला। तनाव, विवाद, कड़वाहटें, जीवन का अंतिम सत्य नहीं हैं। अब किसी भी चैनल पर मुशायरे, कवि-सम्मेलन, ज्ञान-विज्ञान प्रतियोगिताएं, सुगम संगीत, बांसुरी, तबला-वादन, संगीत समारोहों का प्रसारण आदि नहीं चल पाता। ऐसे कार्यक्रमों के लिए न आयोजक मिलेंगे, न टीआरपी।

आखिर हर शाम, सोने या ‘डिनर’ से पहले तनाव भरे कार्यक्रमों से कौन-सी जागरूकता आएगी? क्या समाज को किसी भी तरह की कोई नई दिशा मिल पाएगी? यदि मूल मुद्दा अध्यात्म या धर्म है तो क्या इन मुद्दों के लिए तनावपूर्ण तीखी बहस ही एकमात्र मार्ग है? यदि मूल मुद्दा बेरोज़गारी है या महंगाई है, या भ्रष्ट्राचार है या फिर आतंकवाद है तो तीखे तेवरों वाले मुखौटे पहने, आक्रामक मुद्राओं में एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी से ये मुद्दे हल हो पाएंगे?  यदि यही सिलसिला जारी रहा तो श्रोताओं/दर्शकों के पास ‘चैनल’ बंद करने या बदलने के अलावा क्या विकल्प बच पाएगा?

‘सोशल मीडिया’ पर भी अब लगभग तीस करोड़ लोग जुड़े हैं। कितना ‘एंटी-सोशल’ हो चुका है ये सोशल मीडिया, इसे भी सभी जानते हैं। मगर अधिकांश के दिमा$ग में एक ऐसा ‘कैमिकल लोचा’ सक्रिय हो चुका है कि बचाव का एकमात्र उपाय ‘डिलीट’ है।

नफरत फैलाते फैलते हम कितनी दूर तक निकल आए, पता ही नहीं चला। अब जब यू-ट्यूब, व्हट्सएप, सिग्नल, स्नैपचैट, फेसबुक, फेसबुक-मैसेंजर, ट्विटर, टिकटॉक, इंस्टाग्राम आदि के मायम से दस करोड़ से भी अधिक लोग सोशल मीडिया के मंच पर पहुंच चुके हैं तो तय है कि हमारे पास करोड़ों के करीब पहुंचने की शक्ति है।

यानी पूरे विश्व में नफरत या मुहब्बत फैलाने की सामथ्र्य अकेले सोशल मीडिया में है। इलेक्ट्रॉनिक व प्रिय मीडिया के दर्शकों, श्रोताओं की संख्या इसके इलावा है। अब इतनी पैठ बन चुकी है तो निश्चित है कि इन संस्थानों व माध्यमों का प्रयोग, सत्संग का प्रचार करने या सौहार्द फैलाने के लिए तो नहीं होगा। 

अब तो आशंका यह भी कुनमुनाने लगी है यदि सौहार्द एवं पारस्परिक पे्रम की बात सोशल मीडिया या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर हावी होने लगेगी तो ‘ऊब’ का माहौल पैदा हो सकता है। और यदि इतने तीखे स्वरों में ज़हर फैलाने का वर्तमान सिलसिला जारी रहा तो भी समाज में चारों तरफ वैचारिक कचरा फैलने का खतरा है।

ऐसे माहौल में हमें आत्मविश्लेषण के साथ-साथ एक सार्थक-बाज़ार भी जुटाना होगा। एक ऐसा बाज़ार, जिसमें संस्कृति, कला, साहित्य, आर्किटेक्चर, विरासत और आने वाले कल के रोमांच भरे किस्से हों। इतने कानफोड़ू माहौल से तो हम अपनी वर्तमान और आने वाली दोनों ही पीढिय़ों को गहरी खाई में धकेलने पर उतारू हैं।

इसी बीच तनावभरी खबरों के बीच एक सुखद खबर भी है कि हमारे देश व हमारी भाषा की एक साहित्यकार गीतांजलिश्री को उनके उपन्यास ‘रेत समाधि’ पर प्रतिष्ठित ‘इंटरनेशनल बुकर’ पुरस्कार मिला है।

अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार हर वर्ष अंग्रेजी में अनूदित उस पुस्तक को दिया जाता है जो यूके या आयरलैंड में प्रकाशित होती है। इसकी स्थापना 1969 में इंग्लैंड की ‘बुकर मैकोनल कंपनी द्वारा की गई थी। डेज़ी रॉकवेल द्वारा अंग्रेजी में ‘टॉम्ब ऑफ सैंड’ के नाम से अनूदित गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘रेत समाधि’ को पुरस्कार के रूप में 50 हजार पाउंड की राशि प्रदान की जाएगी। यह राशि लेखक व अनुवादक के बीच समान रूप से वितरित होगी।

गीतांजलि श्री का रचना संसार

  • इस लेखिका की पहली कहानी ‘बेलपत्र’ 1987 में हंस में प्रकाशित
  • अब तक पांच उपन्यास- ‘माई’, ‘हमारा शहर उस बरस’, ‘तिरोहित’, ‘खाली जगह’ और ‘रेत-समाधि’
  • पांच कहानी संग्रह- ‘अनुगूंज’, ‘वैराग्य’, ‘मार्च, मां और साकूरा’, ‘यहां हाथी रहते थे’ और ‘प्रतिनिधि कहानियां’
  • ‘माई’ उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद ‘क्रॉसवर्ड अवार्ड’ के लिए नामित अंतिम चार किताबों में शामिल था। ‘खाली जगह’ का अनुवाद अंग्रेजी, $फ्रेंच और जर्मन भाषा में हो चुका है
  • एक शोध ग्रंथ ‘बिटविन टू वल्ड्र्स-एन इंटलैक्चुअल बायोग्राफी ऑफ पे्रमचंद’ भी प्रकाशित हुआ है
  • यह खबर अच्छी है। बच्चों व घर की युवा पीढ़ी में इसे बताइएगा। सुख मिलेगा।    

  • साभार: डॉ. चन्द्र त्रिखा

 

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