हमने इंसानों के दुख-दर्द का हल ढूंढ लिया


अपने देश में सब चलता है। धारा ३७० की समाप्ति, उससे भी थोड़ा पहले राम मंदिर के निर्माण की शुरुआत, किसान आंदोलन, थोड़ा पहले शाहीन-बाग आंदोलन, फिर ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर अदालतों में व अदालतों के बाहर जमकर रस्साकशी और अब ‘अग्निपथ’ योजना से सुलगता हुआ अलाव सिर्फ चंद वर्षों में हमारी वर्तमान पीढ़ी ने क्या-क्या देखा,  इसे ढंग से तरतीब देना भी मुमकिन नहीं हो पा रहा। इन सारे आंदोलनों से देश कोरोना-महामारी के आतंक के बावजूद जूझता रहा। एक बार भी ऐसा नहीं लगा कि देश की अखण्डता पर खरोंचें भी आएंगी। 

मगर अब आशंकाएं जगने लगी हैं कि इसके बाद आगे क्या? क्या अगला कोई आंदोलन इन सबसे भी ज़्यादा खतरनाक हो सकता है? पिछले कुछ वर्षों की हलचलों से तो यही लगता है कि फिलहाल यह सब चलेगा और देश में कुछ समय तक उखाड़-पछाड़ जारी रहेगी।

राहुल गांधी और उनकी पार्टी के पास फिलहाल कोई काम नहीं। उनके सामने सिर्फ एक एजेंडा बचा है। वे लोग किसी ढब,खबरों में बने रहना चाहते हैं। जब तक सत्ता के गलियारे में प्रवेश का थोड़ा बहुत अवसर नहीं मिलता, तब तक उन्हें सडक़ों पर बने रहना है। ओवैसी साहब को लगा था शायद तीन तलाक, हिजाब और अब ज्ञानवापी-मस्जिद के मुद्दे उन्हें भारतीय मुसलमानों का शिखर-नेता बना देंगे। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। वामपंथी दल फिलहाल अपने लाल झंडों को समेटे हुए हाशिए पर ही सुस्ता रहे हैं। ‘आप’ पार्टी वालों को लगता है दिल्ली व पंजाब के बाद अब उनकी दाल गुजरात व हिमाचल में भी गलेगी, मगर ‘आप’ के पास ही अब मुद्दे सीमित ही बचे हैं। जिस ‘झाड़ू’ को लेकर अरविंद केजरीवाल ने भ्रष्टाचार को बुहारने की मुहिम चलाई थी, वह मुहिम भी अब धीमी हो चली है। उनके अपने ही लोग अब भ्रष्टाचार की जांच में फंसने लगे हैं। लगता है अधिकांश विपक्षी नेताओं को तो ‘ईडी’ वाले ही घर बैठा देंगे। राजनेता एक जांच से बाहर निकलते ही दूसरी जांच के चक्रव्यूह में फंस जाते हैं।

माहौल ऐसा था कि सत्तापक्ष विकास के एजेंडे को पूरी गति से आगे ले जा सकता था, मगर उधर भी कुछ फैसले ऐसे हो जाते हैं, जिन्हें शांतिपूर्ण माहौल में चुपचाप धीरे-धीरे लागू किया जा सकता था। पर ऐसा नहीं हो पा रहा। ऐसे गड्मड् माहौल में दो सवाल उभरते हंै-

1. पहला सवाल यह है कि ये सारे बवाल उत्तर भारत में ही क्यों उठते हैं। उड़ीसा, आंध्र, तामिलनाडु, कर्नाटक आदि उनसे बचे कैसे रहते हैं? देश तो वही है, राममंदिर, ज्ञानवापी-मस्जिद, किसान आंदोलन ‘अग्निपथ’ वाला देश। दक्षिण भारत के इन प्रांतों ने कौन-सा ऐसा पुण्य कर्म किया है कि वहां उत्तर भारत की अपेक्षा ऐसे आंदोलनों से जूझना नहीं पड़ता। उड़ीसा के नवीन पटनायक को तो प्रिंट मीडिया या इलेक्ट्रॉनिक चैनलों पर बने रहने का चाव भी नहीं है। तमिलनाडु में स्टालिन के सामने भी ऐसी कोई गंभीर चुनौती नहीं है। आंध्र, कर्नाटक और केरल भी फिलहाल ऐसे किसी शोरोगुल या हंगामे से बचे हुए हैं?

2. दूसरा सवाल यह भी है कि यदि मीडिया में इन हंगामों को कुछ सप्ताहों के लिए कवरेज न मिल पाए तो क्या यह मुमकिन नहीं है। ‘फेक न्यूज़’ की तरह ‘फेक मुद्दे’ व ‘फेक सियासतदान’ भी हाशिए पर दुबकने लगें? क्या यह संभव नहीं कि कुछ लोकप्रिय मनोरंजक कार्यक्रम इन चैनलों पर व प्रिंट में बहुतायत से आने लगें ताकि ‘फेक मुद्दों’ के लिए ‘स्पेस’ ही न बच पाए?

लगातार नारेबाज़ी, धरने, प्रदर्शन, पत्थरबाज़ी आखिर यह सब भी तो ऊब पैदा करते हैं। ज़ायका बदलें, चलिए इस बार बरसात में थोड़ा जायका बदल कर देखें। चार पेड़ लगाएं, दो पेड़ सरहदों के आसपास और दो अपने-अपने घरों के आसपास। हवा बदलेगी तो शायद प्रदूषण भी घट जाए और पर्यावरण भी बेहतर हो जाए।

 ‘फेक नेताओं’ को कुछ महीनों के लिए पर्यटन के लिए या तीर्थ यात्राओं पर भेज दिया जाए और उन्हें कुछ दिन तनावमुक्त रहने व देश को तनावमुक्त बनाए रखने के लिए कोई ‘आकर्षक पैकेज’ दे दिया जाए। मगर क्या यह मुमकिन हो पाएगा? क्या हम इस उर्दू ‘शेअर’ की मानिंद कुछ समय काट पाएंगे?


‘हमने इंसानों के दुख दर्द का हल ढूंढ लिया, क्या बुरा है जो यह अफवाह उड़ा दी जाए।’


इसी बीच चलते-चलते आपको बता दें कि शिमला में चार दिन के लिए अनेक बुद्धिजीवियों, कवियों, विचारकों को सरकारी खर्च पर राहत देने का एक प्रयास किया गया। विश्वभर से लेखक-विचारक आए और बेतुकी बयानबाज़ी से बचते हुए शांतिपूर्वक चार दिन अच्छे कट गए। कोई लम्बी-चौड़ी बयानबाज़ी या विज्ञप्तियां जारी नहीं हुई और यह एक सुखद प्रयास रहा। ऐसा ही कोई प्रयास ‘फेक राजनीति’ में भी करके देखना चाहिए।

साभार: डॉ. चन्द्र त्रिखा

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