जन संदेश न्यूज नेटवर्क
नई दिल्ली: वर्ष में 1956 में एक फिल्म आई थी ‘जागते रहो’। दरअसल आजादी के बाद जागते रहो शब्द अच्छा लगता था लेकिन आज आजादी के 75वें साल में हम अगर कहें कि ‘जागो सोने वालों’! तो शायद अच्छा नहीं लगेगा। लेकिन रिपोर्ट के जरिये जगाने की कोशिश ज्यादा जरूरी होगी। कोई इंसान किस हाल से गुजरता होगा। जब उसके सामने भूख से तड़पते बच्चे हो और घर में अनाज का एक दाना तक न हो। वैसे तो जब देश आजाद हुआ था उस वक्त करीब 80 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे थी लेकिन देश के आजादी के अमृत महोत्व यानी 75 सालों में ये घटकर 22 फीसदी से नीचे आकर ठहर-सी गई है। सुनने में ये कानों को सुकून देने वाले आंकड़ें हैं लेकिन अब एक इसके विस्तार में जाते हुए आपको थोड़ा चौकातें हैं और सुकून से सिकन की ओर भी ले जाते हैं। आजादी के समय 25 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे थे लेकिन अब इनकी संख्या 26.9 करोड़ बताई जा रही है। जी हां, सही पढ़ा आपने 26 करोड़ से ज्यादा।इंडिया टुडे ग्रुप की ओर से एक स्टोरी की गई है जिसमें बताया गया है कि ये आंकड़ा लोकसभा में सरकार की ओर से दिया गया है। ग्रामीण विकास मंत्रालय की ओर से लोकसभा में गरीबी रेखा से जुड़े सवाल का जवाब देते हुए बताया गया है कि देश की 21.9 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। हालांकि ये आंकड़े वर्ष 2011-12 के बताए जा रहे हैं क्योंकि आगे के गरीबी रेखा के नीचे जीवन बिताने वालों की संख्या का हिसाब ही नहीं लगाया गया। आंकड़ों के अनुसार गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर करने वाली सबसे ज्यादा आबादी छत्तीसगढ़ की है। झारखंड, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, बिहार, ओडिशा, असम, मध्य प्रदेश और यूपी ऐसे राज्य हैं, जहां 30 फीसदी या उससे ज्यादा आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीती है।
क्या है तेंदुलकर कमेटी की रिपोर्ट
साल 2011-12 में गरीबों की संख्या का पता लगाने वाला आंकड़ा जारी किया गया था। जिसे आज तक इस्तेमाल किया जा रहा है। लोकसभा में भी सरकार की तरफ से यही आंकड़े दिए गए। जिसे तेंदुलकर कमेटी के फॉर्मूले के आधार पर निकाला गया था। इसके मुताबित गांव में रहने वाला कोई व्यक्ति हर दिन 26 रुपये और शहरी व्यक्ति 32 रुपये खर्च कर रहा है। तो वो गरीबी रेखा से नीचे नहीं आएगा। यानी, गांव में रहने वाला व्यक्ति हर महीने 816 रुपये और शहरी व्यक्ति एक हजार रूपये खर्च कर रहा है तो वो गरीबी रेखा से नीचे नहीं आएगा।
गरीबी किसी भी व्यक्ति या इंसान के लिये अत्यधिक निर्धन होने की स्थिति है। ये एक ऐसी स्थिति है जब एक व्यक्ति को अपने जीवन में छत, जरूरी भोजन, कपड़े, दवाईयां आदि जैसी जीवन को जारी रखने के लिये महत्वपूर्ण चीजों की भी कमी लगने लगती है। निर्धनता के कारण हैं अत्यधिक जनसंख्या, जानलेवा और संक्रामक बीमारियां, प्राकृतिक आपदा, कम कृषि पैदावार, बेरोजग़ारी, जातिवाद, अशिक्षा, लैंगिक असमानता, पर्यावरणीय समस्याएं, देश में अर्थव्यवस्था की बदलती प्रवृति, अस्पृश्यता, लोगों का अपने अधिकारों तक कम या सीमित पहुंच, राजनीतिक हिंसा, प्रायोजित अपराध, भ्रष्टाचार, प्रोत्साहन की कमी, अकर्मण्यता, प्राचीन सामाजिक मान्यताएं आदि जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
कोई टिप्पणी नहीं
एक टिप्पणी भेजें