''ऐसे ही अनेक दुखद अध्यायों से अटे पड़े हैं इतिहास के पन्ने, मगर सीखता कोई नहीं''
जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने कभी सोचा भी नहीं था कि उसे इस्तांबुल के एक मामूली अस्पताल में आखिरी दिन काटने होंगे। अपने समय में जब उसने एक लोकतांत्रिक सरकार का तख्ता पलट कर सत्ता हथियाई थी, वह तब भी अपने अल्लाह की मार से डरा नहीं था। अब जब वह अंतिम सांसें स्वदेश में लेने के लिए बेचैन है तो वह सरकार के सामने गिड़गिड़ाने पर मजबूर है कि उसे घर लौटने दिया जाए। जिस सरकार के सामने वह रहम की अजिऱ्यां लगा रहा है, उसी सरकार के मुखिया नवाज़ शरी$फ को उसने घर लौटने लायक नहीं छोड़ा था। ऐसी ही अनेकों सत्य कथाएं हमारे इतिहास में बिखरी पड़ी हैं, मगर हम समय की इन चेतावनियों को सुनते कहां हैं।
कभी टीपू सुल्तान की सबसे बड़ी बेटी फातिमा बेगम के ज़ेवरात ढोने के लिए ईस्ट इंडिया कम्पनी को छह बैलगाडिय़ों की आवश्यकता पड़ी थी, मगर अब उसी सुल्तान का परिवार कोलकाता के स्लम-एरिया में रहने पर मजबूर है। टीपू की प्रपौत्री साहबज़ादी रहीमुन्निसा के पति साहिबज़ादा सैय्यद मंसूर अली को अब अपनी बीवी व टीपू के अन्य वंशजों के लिए गुज़ारा भत्ता पाने के आवेदन लेकर सरकारों के द्वारों पर दस्तकें बिछानी पड़ रही हैं। इस परिवार के कुछ सदस्य रिक्शा भी चलाते हैं या फिर कपड़ों की सिलाई काम काम और साइकलों पर पंक्चर लगाने का काम करते हैं।
कभी उसकी दौलत के बारे में विश्वभर के मीडिया में दिलचस्प किस्से फैले रहते थे। कहा यही जाता था कि वह यानी कि निज़ाम-हैदराबाद एक समय में विश्व का सबसे अमीर शासक था।
२०वीं सदी के आरंभ में उसके पास लगभग दस करोड़ पौंड के सोने व चांदी के भंडार थे। उसके जेवरात का मूल्य उन दिनों ४० करोड़ पौंड आंका गया था। उसकी अपनी ‘राइटिंग टेबल’ पर रखे पेपरवेट में १८५-कैरेट के डायमंड टंके थे, जिनका मूल्य उन दिनों २० करोड़ डॉलर आंका गया था।
हैदराबाद का यह अंतिम निज़ाम उस्मान अलीखान विश्व का सबसे धनी व्यक्ति होने के इलावा विश्व का सबसे बड़ा कंजूस भी माना जाता था। मगर लालची होने के इलावा वह ऐश्वर्यपसंद भी था। उसके हरम में ८६ ‘रखैलें’ भी बताई जाती थी, जिनसे १०० से भी अधिक संतानें थीं, लेकिन इन संतानों को कभी वैध नहीं माना गया था क्योंकि इन कथित ८६ रखैलों में निज़ाम का विधिवत निकाह नहीं हुआ था मगर इन्हीं के कारण उसकी सम्पत्ति के वैध-अवैध दावेदारों की संख्या ४०० तक पहुंच चुकी है।
मगर इनमें सबसे बदनसीब रहा उसका बेटा ‘मुकर्रम जाह’ जो इन दिनों इंस्ताबुल के एक छोटे से अपार्टमेंट में रहता है। वह बूढ़ा हो चुका है, मधुमेह से पीडि़त है और इन्सुलिन के सहारे पर है। अब उसके पास अपना रुतबा बनाए रखने के लिए भी धन नहीं है। वह पुराने सामान धीरे-धीरे बेचकर अपना खर्च चला पाता है।
यही स्थिति सुल्ताना बेगम की है। सुल्ताना बेगम भारत के अंतिम मुगल सम्राट बहादुरशाह ज़फर के प्रपौत्र की बीवी हैं और अब वह अपने छह सदस्यों वाले परिवार के गुज़र-औकात के लिए सरकार से मिलने वाली मामूली पैंशन पर निर्भर है। वर्ष १९८० में ज़फर के प्रपौत्र प्रिंस मिर्जा बद्र बख्त की मौत के बाद लाल किले वाली सुल्ताना गरीबी में घिर चुकी है। अब वह कोलकाता में दो कमरों की झोंपड़ी में रहने के लिए मजबूर है। उसे पड़ौसियों के साथ रसोई सांझा करनी पड़ती है और सडक़ के किनारे सरकारी नल पर वह अपने घर के बर्तन धोती है। काफी समय तक वह चाय का खोखा भी लगाती रही। कभी लाल किले के मालिक रहे इस अंतिम मुगल सम्राट ज़फर की छटी पीढ़ी के वंशज को सरकार की ओर से आठ हजार रुपए वार्षिक पेंशन मिलती है।
यही स्थिति अवध के शाही खानदान की शाहज़ादी सकीना महल की है। कभी इस शाही खानदान के पास अकूत सम्पदा थी। पूरे केंद्रीय भारत में अवध के शहंशाहों का राज था। अब शाहज़ादी सकीना महल दिल्ली के मालचा महल के खंडहरों में रहने पर मजबूर है। लगभग नौ वर्ष तक इस शाहज़ादी को गुज़ारे-भत्ते के लिए अदालतों में भटना पड़ा, तब जाकर ५०० रुपए महीना का गुज़ारा भत्ता और मालचा महल के खंडहरों के एक हिस्से पर रहने की जगह मिल पाई।
दो बरस पहले सितम्बर २०२० में नवाब वाजिद अली शाह के प्रपौत्र कादिर मिजऱ्ा का कोलकाता की ही एक मंजि़ला इमारत के एक हिस्से में अंत हुआ तो पता चला कि नवाबी खानदान का यह
बशर किसी वक्त अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़ाता भी रहा था, मगर कोविड-१९ के प्रकोप में पूरा परिवार घिर गया और उसे किसी ने नहीं संभाला, न ही एएमयू ने, न ही मुस्लिम धर्मगुरुओं ने। मगर जब तक वह जीवित रहा, पूरी अकड़ के साथ रहा।
ऐसे ही अनेक दुखद अध्यायों से अटे पड़े हैं इतिहास के पन्ने, मगर कोई भी इन अध्यायों से कोई सबक सीखने को तैयार नहीं होता।
साभार: डॉ. चन्द्र त्रिखा
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