लाडले-कल्पनाशील कवियों का शहर चंडीगढ़


सही व सामयिक मूल्यांकन होता तो शायद कुमार विकल को निराला, मुक्तिबोध व धूमिल की पंक्ति में चौथे स्थान पर रखा जाता। लगभग बीस वर्ष तक इस शहर की काव्यात्मक जि़न्दगी का पर्याय बने रहे कुमार विकल ने अपनी कबीराना व गालिबाना फक्कड़मस्ती के बावजूद अपने लिए एक ऐसा मुकाम बना लिया था, जिसे न तो हाशिए पर सरकाना मुमकिन था और न ही उपेक्षा की अंधेरी गुफाओं में धकेलना। शायद अपने समय का वह एकमात्र ऐसा कवि था, जिसे प्रबुद्ध एवं बौद्धिक जनों का भी भरपूर स्नेह मिला और सामान्य कविता-पाठक का प्यार भी।

इस शहर के इस ‘बिगड़ैल’ मगर लाडले कवि का जन्म १९३५ में वज़ीराबाद (अब गुजरात-पाकिस्तान) में हुआ था। प्राइमरी तक वह रावलपिंडी में ही पढ़ता रहा। विभाजन के समय परिवार लुधियाना आ गया। यहां आर्य कॉलेज में उसने इंटर तक तो पढ़ा मगर परीक्षा नहीं दी। उसके बाद तीन वर्ष तक यायावरी की। १९५६ में लाहौर बुक शॉप लुधियाना में ही नौकरी कर ली। १९६२ में पंजाब विश्वविद्यालय के प्रकाशन विभाग में नौकरी मिल गई। २३ फरवरी १९९७ को उसने इसी शहर में अंतिम सांस ली।जैसा कि ख्यातिप्राप्त पत्रकार, साहित्यकार डॉ. चन्द्र त्रिखा के अनुसार- मुझे कुमार विकल को करीब से जानने और उसके जीने के करीने को कई कई दिन तक देखने-परखने का अवसर मिला है।

हमारे परिवेश के कई लोग तमाशेबाज़ भी थे। मुझे कुमार में सदा एक बालसुलभ मासूमियत के साथ-साथ गहरी वैचारिक प्रतिबद्धता दिखाई दी थी। ऐसे तमाशाबीन दोस्तों की भी एक लम्बी पंक्ति थी जो उसे शराब की बोतलों के उपहार ला-लाकर देते थे, इस उम्मीद में वह शख्स, जमकर पीने के बाद उनकी हां में हां मिलाएगा और उन लोगों पर बरसेगा जो दोस्तों की नज़र में खलनायक थे। यानि वे लोग अपना गुस्सा, अपना क्षोभ, कुमार के माध्यम से निकालते थे। मगर कुमार किसी व्यक्ति विशेष के खिला$फ नहीं था, वह एक व्यवस्था के खिला$फ था।

अपनी फकीराना व कबीराना तबीयत के बावजूद कुमार अपने समय के कई मिथक तोड़ता दिखता। उसने कई बार तंत्र के खिलाफ अपना स्वर बुलंद करने के आरोप में दण्ड भी भुगता। कभी पंूजीवाद के खिलाफ तो कभी आतंकवाद के खिलाफ। कभी ‘मुक्ति का दस्तावेज़’ लिखता तो कभी ‘रोटी की गन्ध’ और कभी ‘जनतंत्र और मैं’। उसकी कविताएं, उसके समकालीन तंत्र का संभवत: सर्वाधिक प्रामाणिक दस्तावेज़ हैं।

मुझे याद है कॉलेज के दिनों में ‘वेटिंग फार गोदो’ के मंचन से पूर्व, पाश्र्व से मैं कुमार विकल की एक कविता,  ‘गोदो की प्रतीक्षा में’ पढ़ता था। एक बार दर्शकों की प्रथम पंक्ति में बैठे कुमार ने मेरे स्वर में अपनी वह कविता सुनी तो पाश्र्व में आकर गले लगा लिया। यार दिल करता है, लिखूं मैं और पढ़ो तुम। मगर तुम्हारी एक कमज़ोरी है। तुम दारू नहीं पीते और मुझे यह अच्छा नहीं लगता कि दारू न पीने वाला कोई शख्स मेरी कविता का मंच से पाठ करे। मगर तुम्हें यह भी माफ। तुम इसी तरह पढ़ते रहो।’

एक बार देर रात सैक्टर १९ से अपनी अखबारी नौकरी के बाद जब दफ्तर से निकला तो बाहर खम्भे के साथ कुमार को देखा। मैं करीब आया तो वह बोला, ‘तुम्हारे पास इस लिए नहीं आया कि मुझे शराब ला दो। वो तो का$फी... लोग हैं जो ला देगे। तुम मेरे साथ चलो। मैंने ‘टैगोर थियेटर’ की दीवार पर कोयले के साथ एक कविता लिखी है। क्या करता मैं। मेरे पास उस वक्त न कागज़ था न पैन, पर कविता थी कि अटकती ही नहीं थी। अब तुम वह कविता कागज़ पर उतारो और मेरी जेब में ‘ठंूसो’। सुबह उसे कहीं भेजूंगा। तुम देखना! भूचाल आ जाएगा।’ 

बहरहाल कुमार के बारे में बहुत कुछ लिखने का मन भी है और ‘मैटर’ भी। मगर इस शहर के परिवेश में यह ज़्यादा ज़रूरी है कि उसे, इसी शहर का शायद सर्वाधिक लाडला व कार्बूजिए के बाद शायद सर्वाधिक सृजनशील एवं कल्पनाशील ‘चंडीगढिय़ा’ माना जाए। आतंकवाद के खिलाफ उसका बयान मेरी एक सम्पादित कृति का हिस्सा बना था। ‘काली नदी के उस पार’ नामक उस संकलन के लिए उसने वह कविता भेजी थी -

एक शरारती कविता

इन बुरे दिनों को हम

भविष्य में कैसे याद कर पाएंगे

और अपनी-अपनी डायरियों में इन्हें

किन शीर्षकों के अंतर्गत लिख पाएंगे

ये दिन

जो हमने

शराब के अंधेरे में बिताए हैं

हमारी जि़ंदगी में न जाने कहां-कहां से

भटककर आए हैं।

‘अमितोज’ कहता है

इन दिनों के पीछे हर आदमी के अपने-अपने

कुमार विकल का हाथ है।

मैं कहता हूं नहीं

यह एक साजि़श है

जिसमें एक अनलिखी कविता का साथ है।

‘शौकीन’ कहता है

‘‘बाई बदमाश हो रहा है

कविता शब्द का गलत इस्तेमाल करके रो रहा है

अमितोज का क्या है

वह तो आजकल

लोकगीतों में गच रहा है

नागिन को कविता में रच रहा है।’’

इसके बाद ‘शौकीन’

बाई की गलत शब्दों वाली

कविता पढक़र रो पड़ता है

खुदा जाने उसका कुत्र्ता कहां जा फंसता है।

लोकू खिडक़ी से बाहर

एक भटकता बादल देखकर कहता है

बाई लोगो! कविता और कुत्ते की बात छोड़ दो

पानी बरसने वाला है

अब सब कुछ धुल जाएगा

हर आदमी का आकाश खुल जाएगा।

नाटककार बलवंत गार्गी

अपने समय के इस महान नाटककार एवं उपन्यास, कहानी-लेखक का नाम इस शहर के चरित्र में गुंथा हुआ है। पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ के भारतीय नाट्य विभाग के संस्थापक निदेशक गार्गी की स्मृति को आज भी समर्पित है इस विभाग का ‘ओपन एयर थियेटर’। उसके शिष्यों ने भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। ऐसे शिष्यों में अनुपम खेर, किरण खेर, सतीश कौशिक, पूनम ढिल्लों और बॉलीवुड के अनेक चर्चित चेहरे शामिल हैं। ४ दिसंबर १९१६ को बठिंडा की नीटामल स्ट्रीट में जन्मे बलवंत गार्गी के पिता इसी शहर के सिंचाई-कार्यालय में हैड क्लर्क थे।

कॉलेज-शिक्षा गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर से हुई। वहीं मंटो, अमृता, कृष्ण चन्दर, अश्क आदि के संपर्क में आए। एम.ए. (अंग्रेजी व राजनीतिक शास्त्र) वही के एफ.सी. कॉलेज से की। थियेटर का चाव पहले से ही था। कांगड़ा घाटी में नोरा रिवर्ड के निर्देशन में उन्होंने ‘नाटक’ की दीक्षा ली। गार्गी सदा चर्चा में बने रहते थे। कभी रोमांस को लेकर तो कभी थियेटर की प्रस्तुतियों को लेकर।

उनके चर्चित एवं स्वलिखित नाटकों में ‘लोहा-कुट्ट’, ‘केसरो’, ‘कनक दी बल्ली’, ‘सोहनी माहीवाल’, ‘सुल्तान रजि़या’, ‘सौकण’, ‘मिजऱ्ा साहिबां’ और ‘धूनी दी अग्ग’ शामिल हैं। उनकी कहानियों के संग्रह ‘मिर्चां वाला साध’, ‘पत्तन दी बेडिय़ां’ आदि शामिल हैं। उनके नाटकों के १२ भाषाओं में अनुवाद हुए और उनका मंचन भी चंडीगढ़ के इलावा मास्को, लंदन, नई दिल्ली व अमेरिका के लगभग सभी प्रमुख नगरों में हुआ था।

१९४४ में आया उनका पहला नाटक लोहा कुट्ट (अंग्रेज़ी में ब्लैकस्मिथ के नाम से अनूदित), बेहद विवादास्पद भी रहा और चर्चित भी। वह नाटक तत्कालीन पंजाब की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का जीवन्त चित्र था। उस काल के गार्गी के सभी नाटक गरीबी, अज्ञानता और रूढि़वादिता के खिला$फ बगावत का परचम सिद्ध हुए थे। यह सिलसिला ‘सील-पत्थर’ (अंग्रेज़ी में पैट्रीफाइड स्टोन) (१९४९) ‘नवां मोड़’, ‘घुग्गी’ (१९५०) में भी जारी रहा। गार्गी की एक कृति ‘फोक थियेटजऱ् ऑफ इंडिया’, अमेरिका में प्रकाशित हुई थी।

अपने समय के इस महान नाटककार का ‘कैनवस’ धीरे-धीरे विशाल से विशालतर होता गया। उसमें मिथकीय पृष्ठभूमि, इतिहास, लोकसंस्कृति व हिंसा, मृत्यु दर्शन, यौन संबंध आदि विषय भी शामिल होते गए। ‘नंगी धुप्प’ (नेकेड ट्रायएंगल) और ‘काशनी वेहड़ा’ ने पूरे सृजन जगत में उन दिनों तू$फान मचा दिया। उसकी कृति ‘सांझा चूल्हा’ के टैली-प्रसारण ने लम्बी अवधि तक धूम मचाई।

१९६२ में उसे अपनी कृर्ति ‘रंगमंच’ पर ‘साहित्य अकादमी’ सम्मान मिला। १९७२ में पद्मश्री, १९९८ में संगीत नाटक अकादमी-पुरस्कार भी मिला। दो वर्ष तक यूनि. ऑफ वाशिंगटन में भी (१९६६-६७) पढ़ाता रहे जहां उसकी भेंट अपनी जीवन साथी जेन हेनरी से हुई। वह हार्वर्ड यूनि., त्रिनिटी कॉलेज, यूनि. ऑफ हवाई, येल यूनि. और अन्य अनेक अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों में ‘विजि़टिंग’ प्राध्यापक के रूप में पढ़ाता भी रहा। उसकी दोनों संतानें मनु गार्गी और जन्नत गार्गी इस समय अमेरिका में हैं। मनु तो हालीवुड की चर्चित फिल्म का निर्माता है।

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