| डॉ. इन्द्रनाथ मदान |
इस शहर से वह कितना जुड़ गए थे इसका अनुमान उन्हीं के शब्दों से लग जाता है, 'यह शहर एक कलाकार की देन है। एक शाहजहां का सपना था, जो ताजमहल में साकार हुआ और एक कार्बूजिए का सपना, जो चंडीगढ़ में मूर्त हुआ। यह जवाहर लाल की लाडली नगरी है, जिसके न$खरे एक हसीना की तरह हैं, लेकिन मुझे यह एक ठप्पेदार शहर लगता है, जिसमें जि़न्दगी सांचों में ढली हुई है। एक बार इस शहर के बारे में एक महानगरी से लाया गया नौकर मेरे नौकर से बतिया रहा था और पूछ रहा था- 'चुन्नी, यहां तो एक तरफ के मकान ही मकान हैं, शहर कहां है?' उसका मतलब रौनक से था। इसके बाद यह नज़र नहीं आया, इस शहर को अलविदा कहना असंभव है, जि़ंदगी से विदा लेकर ही इससे अलविदा ली जा सकती है।' 'इसका न अपना इतिहास है और न अपना भूगोल है, जिस तरह हर पुराने शहर का होता है। इसकी न अपनी विरासत है और न ही अपनी परंपरा है। इसे आधुनिक कहा जा सकता है जो सेक्टरों में बंटा हुआ है। इन सेक्टरों में नंबर तो हैं, लेकिन नाम नहीं है कि इसलिए यह अनाम है, सिवा इसके कि चंडी माता के नाम से जुड़ गया है। इस तरह इनके नाम और रूप में विसंगति है, मध्यकालीन नाम और आधुनिक रूप। इस तरह यह शहर ही नहीं, यह विसंगति भी मेरे सामने है। इस पर फिर से काली छायाएं मंडरा रही हैं। इसके बंटवारे के मंसूबे बांधे जा रहे हैं।
डॉ. मदान पर लिखे श्री राकेश कुमार के एक विनिबंध के अनुसार (साहित्य अकादमी प्रकाशन) चंडीगढ़ शहर के नाम और रूप में चाहे कितनी भी गहरी विसंगति क्यों न हो, मदान जी इस शहर को अपना स्थाई ठिकाना ही बनाते हैं। दिल्ली को लोग चाहे कितना भी कोसें, दिल्ली छोडऩा भी कौन चाहता है! क्या यह भी हमारी विसंगति नहीं कि चंडीगढ़ शहर की चकाचौंध का प्रभामंडल इतना ही है कि उसे छोडऩे को भी जी नहीं चाहता! इसके बावजूद मदान के व्यक्तित्व में एक खरापन है जो चिकनी-चुपड़ी भाषा की अपेक्षा, खरी-खरी कहने, सुनने और सुनाने में विश्वास करता है। उन्हें 'गुड़ की मिठास से करेले की कड़वाहट" अधिक अच्छी लगती है लेकिन खुशामदी, चापलूसी एवं आत्ममुग्धता के इस दौर में खरी-खरी सुनाने वाले व्यक्ति का जो हश्र होता है, उस सच्चाई को भी वे सामने लाती हैं। इनका एक महत्वपूर्ण निबंध है- 'खरी-खरी सुनाने पर" जिसमें वे कहते हैं-'आज खरी सुनाना कितना कठिन हो सकता है- इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है।" उनका यह भी अनुभव है, कि जि़ंदगी में 'खरी-खरी बात करने से काम कम हुआ है और हानि अधिक पहुंची है। मैं किसी गुट का सदस्य नहीं हो सका हूं... आज नेतागिरी या दादागिरी करने के लिए अपना गुट बनाना आवश्यक हो गया है।"
डॉ. मदान १ मार्च १९१४ को जि़ला सरगोधा (अब पाकिस्तान में) के एक कस्बे गिरोट में जन्मे थे। एक बार उन्होंने अनौपचारिक बातचीत के मध्य बताया था, 'पिता जी ने दो विवाह किए थे, नतीजन हम दस भाई बहन हो गए थे। पिता जी ओवरसीयर थे। बड़े गर्व से बताते थे कि दादी ने उन्हें सूत कातकर पढ़ाया था और दादी का यह ऋण उतारने के लिए मुझे सब भाई बहनों को पढ़ाना पड़ा। वैसे पांचवीं से एमए तक मुझे भी 'वजीफा" मिलता था। मुझे याद है एमए की पढ़ाई के लिए 'वज़ीफा" मिला और मैं लाहौर जाने लगा तो पिता जी घोड़ी पर चढ़ाकर मुझे रेलवे स्टेशन तक छोडऩे आए थे।"
मदान के लिए लाहौर के दिन गर्दिश के दिन थे, मगर जूझते रहे। एक बार हंसी मज़ाक के मध्य बता रहे थे, 'अरे भाई हमने तो पूरी जवानी जूझने में ही काट दी। जब तक नौकरी मिली, तब तक 'जवानी' ढलने लगी थी। तब शिद्दत से महसूस हुआ था कि माक्र्स फ्रायड से अधिक बलवान है। पहले लड़कियों के कॉलेज में नौकरी मिली। बच-बच कर चलना पड़ता था। मन में कुछ हलचल हो तो भी $खतरा रहता कहीं कोई 'स्कैंडल' न बना डाले यह हलचल। आखिर लायलपुर खालसा कॉलेज में स्थायी नौकरी मिली। लगा कि अब फ्रायड का भी पुनर्पाठ मुमकिन है, मगर तभी स्वतंत्रता मिली और विभाजन की विभीषिका से जूझते हुए खाली जेब दिल्ली आना पड़ा।'
डा. मदान लाहौर की यादों से मुक्त नहीं हो पाए। एक बार बता रहे थे, 'अब भी याद आता है लाहौर। मित्रों को खत लिखते समय कभी-कभी भूल से अपना पता चंडीगढ़ का ही दे बैठता हूं। लाहौर था ही ऐसा कि मैं अंधेरे में भी साइकल चला सकता था।' मैं कहता, आपकी तबीयत में अभी भी लाहौरी पुट बना हुआ है। कहते, 'अरे भाई! मैं तो बुलन्द आवाज़ में कह सकता हूं मैं पंजाबी हूं। भले ही मैं हिंदी में लिखता हूं मगर मां के दूध से इन्कार कैसे मुमकिन है। वैसे भी भाई। लाहौर मेरे लिए एक माशूका से कम नहीं था। अब तुम फिर कुरेदोगे, मगर मैं तुम्हें साफ बता दूं कि मैं तुम्हें किसी इश्क विश्क का किस्सा बताने वाला नहीं हूं।'
दिल्ली से वह शिमला चले गए थे, शिमला से जालंधर। वहां पंजाब विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय केन्द्र में हिंदी विभागाध्यक्ष हो गए। मगर १९६१ में चंडीगढ़ चले आए और अंतिम सांस तक यहीं बने रहे।
डॉ. मदान के चरित्र की ही यह विशेषता थी कि वह स्वयं विभागध्यक्ष होते हुए भी डॉ. हज़ारी प्रसाद द्विवेदी को यहां लाए। उन्होंने स्वयं कुलपति डॉ. जोशी के सामने प्रस्ताव रखा। उसका एक ही तर्क होता 'अब ज्ञान गंगा वाराणसी के बाद पंजाब में ही बहेगी।'
उनके आसपास के विद्वानों में डॉ. द्विवेदी के इलावा डॉ. रमेश कुन्तल मेघ, डॉ. नरेन्द्र मोहन, डॉ. गंगा प्रसाद विमल, डॉ. मेंहदी रत्ता, डॉ. यश गुलाटी, डॉ. मैथिली भारद्वाज, डॉ. ओम अवस्थी, डॉ. सेवा सिंह, डॉ. मनमोहन सहगल सरीखे लोग थे और एक बात पर सभी एक मत थे कि डॉ. मदान एक व्यक्ति नहीं एक संस्था थे। १९३९ तक १९८२ के अपने सक्रिय कार्यकाल में उन्होंने लगभग तीन दर्जन कृतियां दीं। उनके एक विनिबंधकार के शब्दों में डॉ. मदान के व्यक्तित्व में कबीर जैसी अक्खड़ता और $फक्कड़ता, निराला जैसा आक्रोश एवं विक्षोभ और मुक्ति बोध जैसी बेचैनी थी।
पंजाब विश्वविद्यालय में एक 'सैक्यूलर' दृष्टि का माहौल बनाने का श्रेय भी डॉ. मदान को ही दिया जाता है। हालांकि वादों, विमर्शों या गुटों के कट्टर विरोधी थे डॉ. मदान, मगर वह स्वयं जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष भी बने। उनका एक ही तर्क होता, 'लेखक-संगठन कमज़ोर पड़ते जा रहे थे। लेखक का काम 'सोशल-एक्टिविस्ट' का भी है, बशर्ते कि वह अपनी भूमिका का सार्थक निर्वहन करे।' यह भी एक दिलचस्प तथ्य है कि डॉ. मदान ने अध्यापन की शुरुआत अंग्रेज़ी से की थी। उनकी पहली तीन पुस्तकें थी, 'माडर्न हिंदी लिटरेचर', 'प्रेमचंद एन इंटरप्रेटेशन', 'शरत चंद चैटर्जी-हिज़ माइंड एंड आर्ट।'
डॉ. मदान अपनी पसंद व नासंपदगी के बारे में बेहद बेबाक थे। यह बेबाकी कृतियों के बारे में थी, शख्सियतों के बारे में भी और खाने के बारे में। खाने में उन्हें कढ़ी, अचार व करेले पसंद थे तो कवियों में निराला प्रसाद व महादेवी वर्मा, कुमार विकल आदि। कामायनी को एक असफल कृति मानने के बावजूद उसकी काव्यात्मकता के वह कायल थे। गद्य में प्रेमचंद व उनका गोदान उनके प्रिय थे। कहानीकारों में उन्हें कमलेश्वर, निर्मल वर्मा, उषा प्रियम्वदा, मोहन राकेश, राजी सेठ आदि बेहद पसंद थे। 'वे दिन' (निर्मल वर्मा) उन्हें निजी रूप में बेहद प्रिय लगता था। समीक्षा के क्षेत्र में उन्हें अपना ही गढ़ा हुआ एक मुहावरा पसंद था 'कृति की राह'। उनकी मान्यता थी कि 'कृति की राह' से गुज़रे बिना किन्ही पूर्व निर्धारित मान्यताओं या मानदण्डों के आधार पर तटस्थ समीक्षा असंभव है।
डॉ. द्विवेदी उनके बारे में कहा करते, 'डॉ. मदान सुलझे हुए समालोचक हैं। स्पष्टवादिता उनका मात्र गुण नहीं, स्वभाव है। उधार, बाकी किसी का नहीं रखते, कुछ भी नहीं। पैसे भी नहीं, प्रत्युत्तर भी नहीं। तुरंत का तुरंत भुगतान। अचार चटनी के शौकीन हैं मगर मानसिक आचार से अपरिचित हैं। मानसिक मनघुन्नेपन में विश्वास ही नहीं करते। मन में कुछ बात हुई तो उसी समय उसे निकाल देते हैं। 'तुरंत दान-महाकल्याण' के पुराने मंत्र में उनकी पूरी आस्था है। मैं उनकी साफगोई की $कदर करता हूं।'
इसी संदर्भ में मुझे पंजाब विश्वविद्यालय के कुलपति सूरजभान की बात याद आती है। 'वह खरी बात के धनी हैं। चाहे बात साहित्य की हो या व्यक्ति की, अपनी बात को एक बार तो वह बुलंद आवाज़ में सभी के सम्मुख कह ही डालेंगे।' निजी जि़न्दगी में डॉ. मदान भले ही अविवाहित रहे, मगर उन्होंने कभी अपने जीवन में 'खालीपन' का एहसास नहीं दिया। उन्हें अपने 'किचन गार्डन', 'किचन', परिन्दों के साथ और पुस्तकों के साथ काफी समय लग जाता था। उनकी एक शोध छात्रा डॉ. अचला कांत का कहना था, उनके संसर्ग में कभी लगता ही नहीं था उनका परिवार नहीं है। वह प्राय: अपने शोधार्थियों व छात्र छात्राओं को मित्र या परिजन ही बताते। डॉ. मदन ने एक बेटी गोद ली थी और बाद में पूरे चाव से उसका विवाह कराया। अपनी पूरी संपत्ति भी उन्होंने अपनी इसी बेटी के नाम कर दी थी।
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