जन संदेश न्यूज नेटवर्क
पटना: पशुपति कुमार पारस के धड़े वाले लोक जनशक्ति पार्टी को छोड़ दें तो बिहार में बीजेपी के साथ अब कोई पार्टी नहीं बची है। नीतीश कुमार के बीजेपी छोडऩे के बाद बिहार में एनडीए अब न के बराबर बचा है। जेडीयू के सीनियर नेताओं के अनुसार, पशुपति कुमार पारस के धड़े वाले तीन लोकसभा सांसद कैसर अली, वीणा सिंह और चंदन सिंह भी जेडीयू में शामिल हो सकते हैं।
चिराग पासवान के धड़े के एकलौते विधायक राजकुमार सिंह पिछले साल ही जेडीयू में शामिल हो गए थे। इसके अलावा उपेंद्र कुशवाहा भी अपनी पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का जेडीयू में विलय कर चुके हैं। बिहार के सीमांचल इलाक़े में मुस्लिम आबादी अच्छी-ख़ासी है और यहाँ से हैदराबाद के लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के पाँच विधायक जीते थे। इनमें से चार विधायक आरजेडी का दामन थाम चुके हैं।
बिहार की दो सबसे ज़्यादा प्रभुत्व वाली ओबीसी जातियां यादव और कुर्मी के दोनों नेता साथ हैं। इसके अलावा इन दोनों के साथ होने से मुसलमानों के वोट बँटने की आशंका भी ख़त्म हो गई है। वामपंथी पार्टियों का भोजपुर और मगध में दलितों के बीच आज भी प्रभाव है।
जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आपातकाल विरोधी आंदोलन के दौरान बिहार की पिछड़ी जातियां एकजुट हुईं। इसी के बाद से बिहार में पिछड़ी जातियों के प्रभुत्व वाली राजनीति का उभार हुआ। लालू यादव और नीतीश कुमार इन जातियों का नेतृत्व कर रहे थे।
इस राजनीति के उभार के बाद बिहार में सवर्ण जातियां अहम खिलाड़ी नहीं रहीं। जब ऊंची जातियां बिहार के राजनीतिक मैदान से बाहर हो गईं तो जेपी और राममनोहर लोहिया को अपना गुरु मानने वाले लालू यादव और नीतीश कुमार के बीच ही प्रतिद्वंद्विता शुरू हुई। दोनों नेताओं ने जातियों के अलग-अलग समूहों का गठन किया।
जातियों के इस नए गठबंधन में छोटे जाति समूहों की वफादारी बदलती रही। इस राजनीति में बीजेपी हिन्दुत्व की राजनीति के साथ आई और सभी जातियों को प्रतिनिधित्व देने को भी तैयार दिखी। पिछड़ी जातियों के प्रभुत्व वाली राजनीति में बीजेपी ने अप्रासंगिक हो चुकी ऊंची जातियों को आकर्षित करते हुए पहचान की नई राजनीति को उभारना शुरू किया। राजनीति के इस नए खेल में कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों की ज़मीन खिसकती गई।
कहा जा रहा है कि बिहार की अभी की राजनीति ओबीसी पॉलिटिक्स का एक्सटेंशन है और इसमें अति पिछड़ी जातियों की पहचान की राजनीति के उभार का दौर है। अति पिछड़ी जातियाँ यानी एमबीसी बिहार में टुकड़ों में फैली हुई हैं।
अब इन जातियों में भी पहचान की राजनीति ज़ोर पकड़ रही है। बिहार में बीजेपी ने इसी को ध्यान में रखते हुए नोनिया जाति की रेणु देवी को उपमुख्यमंत्री बनाया था। इन जातियों में भी एक किस्म का भाव है कि प्रभुत्व वाली ओबीसी जातियों ने उन्हें वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया और उनका हिस्सा नहीं दिया।
बिहार की राजनीति में जो बदलाव और उठापटक का दौर चल रहा है उसमें इन जातियों को अपनी तरफ़ लाने की होड़ के तौर पर भी देखा जा रहा है। बीजेपी ने बिहार में ओबीसी से ताल्लुक रखने वाले तारकेश्वर प्रसाद को भी उपमुख्यमंत्री बनाया था। तारकेश्वर प्रसाद ग़ैर-यादव और ग़ैर-कुर्मी ओबीसी में कलवार जाति से हैं।
तारकेश्वर प्रसाद के अनुसार, बीजेपी एमबीसी और ग़ैर-यादव, ग़ैर-कुर्मी ओबीसी जातियों को हक़ दिलाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि यह काम न तो आरजेडी कर पाई और न ही नीतीश कुमार ने किया। जातियों में बँटे बिहार की राजनीति में बीजेपी के लिए जगह बनाना आसान नहीं है। बीजेपी को पता है कि उसके लिए जेडीयू के साथ गठबंधन का होना कितना ज़रूरी है।
साभार मीडिया
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