चंडीगढ: नेकचंद के हाथों से बना ‘रॉक गार्डन’ का स्मृति चिह्न

जन संदेश न्यूज नेटवर्क

यह उद्यान, सृजनशीलता के चरम का एक नमूना है। भारत-पाक विभाजन के समय लाखों व्यक्तियों की तरह ‘उस पार’ से ‘इस पार’ आया नेकचंद पहले दिल्ली पहुंचा था। खाली जेब व फटे हाल था। वहीं पर लोक निर्माण विभाग में एक श्रमिक के रूप में नौकरी कर ली। मगर स्वभावत: मधुृर व्यवहार व कड़ी मशक्कत के मद्देनज़र उसे १९५१ में ‘रोड इंस्पैक्टर’ के पद पर चंडीगढ़ में नियुक्ति मिल गई।

विभाजन की विभीषिका से उपजे बिखराव को नेकचंद ने सृजन की दिशा में मोड़ा और उसने टूटी-फूटी चीज़ों को एकत्र करके कलात्मक दृष्टि से जोडऩे की शुरुआत की। अधिकांश निर्मितियों में कांच की टूटी चूडिय़ां, टूटी हुई क्रॉकरी, टूटे बल्ब, टूटे हुए स्मृति चिन्ह आदि का भरपूर प्रयोग किया गया। वो टूटन, जो मनहूसियत का प्रतीक थी, नेकचंद के हाथों से ‘रॉक गार्डन’ का स्मृति चिह्न बन गई। उसके अपने कथन के अनुसार, ‘जब शुरु शुरू में मैं चंडीगढ़ आया तो मैंने देखा कि लोग अक्सर टूटे हुए बर्तनों, क्रॉकरी, ‘शो-पीस’, चूडिय़ां, फ्यूज़ बल्ब, आदि कूड़े में फैंक देते थे। मुझे कई स्थानों या कूड़े के कई ढेरों पर साइकलों के हैंडल, टूटे हुए पहिए और बहुत कुछ ऐसा मिला जिसके साथ कोई न कोई दास्तान जुड़ी हुई थी। इन सबको इकट्ठा करने लगा तो पहले पहल कुछ लोग मुझे सनकी भी कह देते।’

अपने आरंभिक संस्मरणों का पिटारा नेकचंद ने तब खोला, जब वह एक बार लखनऊ में सहारा-सिटी के उद्घाटन अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में मेरे साथ विमान द्वारा गए थे।

‘धीरे-धीरे मैंने जो भी बनाया, उसे ‘सुखना लेक’ के थोड़ी दूर पर एक स्थान चुन कर वहां सजाने लग गया। जब इधर-उधर से सामान बटोरने की धुन सवार हुई तो मुझे तलाश के मध्य अनेक बहुमूल्य पत्थर भी मिले। उनके अपने प्राकृतिक रंग थे। शक्लें कहीं कहीं इन्सानी आकृतियों से मेल खाती थी। मैं तब यह साारा सामान अपनी साइकल के कैरियर पर रखकर ही ढोता था।’

अचानक एक दिन २४ फरवरी १९७३ को एक उच्चाधिकारी डा. एस.के. शर्मा की नज़र नेकचंद के इस अघोषित ‘रॉक गार्डन’ पर पड़ी। उन्होंने इस बारे में चंडीगढ़ के पूर्व चीफ कमिश्नर डॉ. एम.एस. रंधावा को बताया। रंधावा तो सृजनशीलता के प्रशंसक थे ही। आखिर २३ जून १९७३ को इस ‘रॉक गार्डन’ को अधिकृत मान्यता दे दी गई। इसका विधिवत उद्घाटन १९७६ में हुआ।

अब विश्व भर में चर्चित यह रॉक गार्डन, सुखना झील और कैपिटल-काम्पलैक्स के मध्य में स्थित है। यह स्थल सैक्टर-१ का मुख्य अंग है। लगभग २० एकड़ में फैले व दरख्तों से घिरे इस पर्यटन स्थल में एक ओपन-एयर हाल है, सैनिक हैं, महल हैं, परिन्दे हैं। ग्राम्य जीवन की एक झलक है, जिसमें ग्रामीण स्त्रियां, ग्राम्य मंदिर, पनघट, झूल, बढ़ई आदि सब कुछ मौजूद है। बीच में एक सरोवर भी है और पानी का एक झरना भी। जि़न्दगी में सुकून के पल देने वाला हर तत्व नेकचंद ने टूटी-फूटी चीज़ों से सृजित कर डाला।

नेकचंद की इस विलक्षण कृति की विश्वभर में इतनी धूम मची कि वाशिंगटन में भी उसी के मार्ग दर्शन में एक मिनियेचर रॉक गार्डन का निर्माण सिर्फ ५ माह में किया गया। सृजन के इस अनूठे हस्ताक्षर की यह कामना थी कि देश की हर प्रादेशिक राजधानी में एक रॉक गार्डन बने। प्रशासन ने भी उसके प्रति सम्मान दर्शाते हुए इस पार्क का नामकरण, उसके जीवन में ही उसके नाम पर किया। इसी वर्ष जब नेकचंद का ९० वर्ष की आयु में निधन हुआ तो उसके शव को यहां भी लगाया गया। अब यह चंडीगढ़ का सर्वाधिक चर्चित पर्यटन स्थल है।

शहर की एक विशिष्ट पहचान बने इस महान कलाकार का जन्म १५ दिसम्बर १९२४ को विभाजन पूर्व जिला गुरदासपुर की शकरगढ़ तहसील के गांव बरियां कलां में हुआ था। वह गांव अब पाकिस्तान में है।

शहर का निर्माण अभी आंख खोल ही रहा था, जब इस शख्स की यहां १९५१ में रोड इंस्पेक्टर की नौकरी मिली। उसकी विशिष्ट कृति ‘रॉक गार्डन’ को देखने आने वालों की संख्या जब निरंतर बढऩे ली तो जनमत के दबाव पर नेकचंद को एसडीई अर्थात् सबडिविज़न इंजीनियर का पद दे दिया गया। वर्ष १९८३ में उसकी इस कृति को समर्पित एक डाक-टिकट भी जारी की गई। वर्ष १९८४ में पद्मश्री मिला और उसके बाद तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान मिलने का सिलसिला भी चल पड़ा। १२ जून, २०१५ को जब ९० वर्ष की उम्र में इस महान शख्सियत का अंत हुआ तो न केवल शहर बल्कि देश-विदेश में भी उसे भावभीनी श्रद्धांजलियां दी गई।

सुखना झील

झीलों की भी एक अपनी संस्कृति व गाथा होती है। जि़ला अम्बाला गज़ेटियर-१८८३-८४ में सबसे पहले सुखना झील का वर्णन है। इस विवरण के अनुसार सुखिया झील, जिसे ‘सुखना’ भी कहा जाता है पिंजौर के समीप ही एक स्थल से जलधारा के रूप में आरंभ हुई है और पश्चिम-दिशा में लगभग १५ मील की पूरी मुबारिकपुर में घग्घर तक फैली हुई है। वर्तमान सुखना झील, शिवालिक की पहाडिय़ों से बरसाती जलधारा के रूप में आने वाले ‘सुखना-चो’ का ही एक रूप है। इसे १९५८ में अस्तित्व मिला। पहले पहल बरसाती पानी सीधे सुखना झील में आता था, जिससे उसमें गाद की मात्रा निरंतर बढ़ जाती थी। अब हर वर्ष शहर के लोग इस झील की ‘कारसेवा’ करते हैं और ‘गाद’ को निकालने के लिए सामूहिक श्रमदान होता है।

कार्बूजिए ने कई बार इस झील का उल्लेख किया है। उसे सदा इसी झील के किनारे टहलने से नई ऊर्जा मिलती थी। जब भी नक्शों की रेखाएं उसे थका देतीं, वह अपना फैल्ट और छोटी सी छड़ी उठा कर पैदल ही ‘सुखना’ झील की ओर चल देता। उसने सदा यही आग्रह किया कि इस झील के शांतिप्रदायी पर्यावरण से छेड़-छाड़ न हो और इसमें किसी भी शर्त पर ‘मोटर बोट’ आदि के चलने की अनुमति नहीं होनी चाहिए।

बाद में इस झील को गाद-रहित बनाने के लिए २५४२ हैक्टेयर भूमि को उत्पादक बनाया गया। लगभग ३ वर्ग किलोमीटर में $फैली यह झील १९५८ में अपने वर्तमान स्वरूप में आई थी। १९७४ में ‘चो’ की दिशा बदली गई और उसे झील से अलग किया गया। लेकिन अब भी बरसाती नालों से पानी आने के कारण झील में गाद की समस्या बनी रहती है।

इस झील का पूरा श्रेय ली कार्बूजिए और इंजीनियर पीएल वर्मा को दिया जाता है। पृष्ठभूमि में पर्वत शृंखला व झील के तटों पर $फैली हरियाली इस समूचे परिवेश को अद्भुत सौंदर्य प्रदान करती है। नौकायन की व्यवस्था है, लेकिन सीमित नौकायन इसका आकर्षण है। तटबन्धों पर आधुनिक रेस्तरां व बच्चों के लिए खेलों की व्यवस्था ने यहां सभी वर्गों के परिवारों की हर शाम खुशनुमा कर दी है। छुट्टी के दिनों में, विशेष रूप से हर शनिवार और रविवार यहां खुली हवा में सांसों में ऑक्सीजन भरने सैंकड़ों की संख्या में लोग उमड़ते हैं।

वैसे भी सुबह नियमित रूप से सैर के लिए आने वालों का एक बड़ा वर्ग है। इस वर्ग में अवकाश प्राप्त सैनिक अधिकारी भी हैं, पूर्व आईएएस, आईपीएस भी और सेवारत उच्चाधिकारी, न्यायधीश व सामान्य वर्ग के लोग भी शामिल हैं। एक समय था जब पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री, राज्यपाल व वरिष्ठ मंत्रीगण भी यहां बिना अंगरक्षक सैर के लिए आ जाते थे। अब तो वह दौर अविश्वसनीय सा लगता है।

यहां का सर्वाधिक आकर्षण रहता है प्रवासी परिंदों का आना। हज़ारों की संख्या में परिन्दे हज़ारों किलोमीटर की उड़ान भरने के बाद ‘सुखना’ पर आते हैं। इन दिनों स्कूली बच्चे एक उत्सव के रूप में इन प्रवासी परिन्दों का स्वागत करते हैं। वे दिन प्रकृति, वन्य जीवन व मानव के मध्य प्रगाढ़ संबंधों के दिन होते हैं। उन दिनों इस बात का भी पूरा पूरा ध्यान रखा जाता है कि आसपास कोई आतिशबाज़ी या ढोल नगाड़ों का शोर न हो। सुखना की स$फाई का उन दिनों आम दिनों की अपेक्षा कुछ ज़्यादा ही ध्यान रखा जाता है। मगर ‘सुखना’ से प्यार करने वाले हज़ारों लोग चिंतित हैं कि यह झील धीरे-धीरे सिकुड़ रही है। उन्हें आशंका है कि यदि दीर्घकालीन उपचार न हुआ तो यह झील अतीत का एक हिस्सा बन सकती है। 

कोई टिप्पणी नहीं

एक टिप्पणी भेजें

© all rights reserved
made with by templateszoo