मात्र 28 दिन में ही तैयार हो गई थी आनंद

मनोरंजन- जन संदेश न्यूज नेटवर्क—गुरूग्राम, हरियाणा

ऋषिकेश मुखर्जी मध्यम वर्ग और उनके मूल्यों के प्रबल हिमायती थे। उनकी फिल्मों के पात्र भी इसी वर्ग से उपजते थे। भारतीय सिनेमा की क्लासिक फिल्मों में से एक ‘आनंद’ मध्यम वर्ग के गढ़ और नायक की तरह सर्वथा जीवंत शहर मुंबई तथा आम आदमी के एक और हिमायती राज कपूर को समर्पित थी। कैंसर स्पेशलिस्ट डॉक्टर डा.भास्कर बनर्जी की पहली पुस्तक ‘मृत्योन्मुख’ एक कैंसर पीडि़त युवक में जीवन के शेष पल भरपूर जीने की प्रबल अभिलाषा और आसपास के लोगों पर उसके प्रभाव की कहानी है। पुस्तक विमोचन समारोह में भास्कर बताते हैं कि वह गल्प नहीं, उनकी डायरी के पन्नों में दर्ज सत्यकथा है-

आदर्शवादी युवा और कैंसर स्पेशलिस्ट भास्कर बनर्जी ने अपने करिअर की शुरुआत गऱीब बस्तियों में जरूरतमंदों के मुफ़्त इलाज से की थी। रोग से ज़्यादा दु:ख, भूख और गरीबी के मारों को देख कर उनका तमाम हौसला दम तोडऩे लगा था और वे निराशा के कगार पर जा पहुंचे थे। उनकी स्पष्टवादिता रोगभ्रम के मारे रईसों को रास न आती। इसके ठीक विपरीत भास्कर के दोस्त डॉक्टर प्रकाश कुलकर्णी रईसों के इसी रोगभ्रम से कमाई मोटी फीस को जरूरतमंदों के इलाज का साधन बनाते थे। भास्कर और प्रकाश के डॉक्टर दोस्त की सिफारिश पर कैंसर की आखिरी स्टेज में एक युवक आनंद सहगल दिल्ली से उनके पास बम्बई आया। प्रकाश ने उसे अपने नर्सिंग होम में ठहराया ताकि उसके जीवन के बचेखुचे चंद महीने उनकी निगरानी में बीतें। जल्दी ही वह प्रकाश और उनकी पत्नी सीमा से ख़ूब घुलमिल गया। अस्पताल के माहौल और नर्सिंग होम की मेट्रन मिसेज डीष्सा के सख्त अनुशासन से घबरा कर आनंद भास्कर के घर में रहने चला आया। प्रकाश, सीमा और भास्कर आनंद के लिए चिंतित रहते और वह उनकी ख़ुशी के लिए फिक्रमंद रहता। राज कपूर ऋषिकेश मुखर्जी को बाबू मोशाय के उपनाम से संबोधित करते थे। फिल्म में नायक आनंद का यही तकिया कलाम था। राह चलते अजनबियों को रोक कर उनसे जिंदादिली से मिलता और अपनी ओर खींच लेता। ऐसे ही ड्रामा कम्पनी के मालिक ईसाभाई सूरतवाला से दोस्ती गांठ कर आनंद ने डायलॉगबाजी को शगल बना लिया और सबका मनोरंजन करता कुछ ये कहकर: जि़ंदगी बड़ी होनी चाहिए, लम्बी नहीं। मौत तो एक पल है बाबू मोशाय, मौत के डर से आपने जिंदा रहना छोड़ दिया तो मौत किसे कहते हैं? जब तक जि़ंदा हूं, मरा नहीं। जब मर गया साला मैं ही नहीं। तो फिर डर किस बात का? सीधे-सादे शब्दों में गूढ़ अर्थ वाले आनंद के संवाद हिंदी फिल्मों के सबसे शक्तिशाली संवादों में गिने जाते हैं। 1972 की बेस्ट फीचर फिल्म के लिए नेशनल अवॉर्ड और फिल्मफेयर के अनेक अवाड्र्स जीतने वाली आनंद को फिल्म आलोचक अनुपमा चोपड़ा ने देखने लायक 100 बेहतरीन फिल्मों में गिना है। कालातीत फिल्में स्विट्जरलैंड या आइसलैंड में शूटिंग या आइटम नम्बर्ज की मोहताज नहीं। अर्थपूर्ण प्लॉट, पात्रों का सशक्त निर्वाह और निर्माण के हर पहलू पर मज़बूत पकड़, सफलता का आजमाया फॉर्मूला है। थोड़ा-बहुत मेलड्रामा भी माफ हो जाता है। कहते हैं कि कम बजट वाली यह फिल्म केवल 28 दिन में ही बन कर तैयार हो गयी थी। संगीत निर्देशन के लिए लता मंगेशकर और आनंद सहगल की भूमिका के लिए बंगाल के लोकप्रिय अभिनेता उत्तम कुमार, राज कपूर और किशोर कुमार तथा डॉक्टर भास्कर बनर्जी की भूमिका के लिए सौमित्र चैटर्जी, ऋषि दा की पहली पसंद थे। राजेश खन्ना को यह रोल भाग्यवश मिला जिसके लिए उन्होंने अपने रेट से बहुत कम केवल सात लाख रुपए लिए। उनकी सारी फिल्में एक तरफ और आनंद एक तरफ। अमिताभ बच्चन ने भास्कर का रोल अपने दोस्त के बड़े भाई हास्य अभिनेता महमूद की सलाह पर लिया था। उनके कद से ऊंचे उनके पात्र निर्वाह के कारण आनंद की दोबारा रिलीज पर फिल्म के पोस्टरों में राजेश खन्ना के मुक़ाबले बच्चन को प्राथमिकता दी गयी। संगीतकार सलिल चौधरी और गीतकार योगेश का कार्यकाल एक पठार.से पर आ चुका था। मलयालम में भी बनी आनंद अनेक अवाड्र्स जीत कर ब्लॉकबस्टर साबित हुई।

कलाकार: राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन और भास्कर बनजी आदि।

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