जन संदेश न्यूज नेटवर्क—गुरूग्राम, हरियाणा
डॉ. नीलम मान सिंह चौधरी की चर्चा के बिना चंडीगढ़ के कला एवं रंगमंच जगत से परिचय नितांत अधूरा है। अमृतसर में १४ अप्रैल, १९५१ को जन्मी नीलम मान सिंह को साहित्य व कला एवं रंगमंच के प्रति समर्पण का माहौल अपने पारिवारिक परिवेश से मिला। पिता डॉ. मान सिंह निरंकारी, अमृतसर के मैडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल एवं प्रख्यात नेत्र-विशेषज्ञ होने के साथ-साथ एक अच्छे कवि भी थे।
नीलम मान सिंह ने पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ से ही ‘हिस्ट्री आफ फाइन आर्ट्स’ विषय में एमए किया। रंगमंच के प्रति समर्पित आकर्षण उन्हें ‘नेशनल स्कूल आफ ड्रामा’ में ले गया। तीन साल तक वहां ‘रंगमंच’ की दुनिया में रच-बस जाने के बाद वह मुम्बई चली गईं और वहां बच्चों को थियेटर में प्रशिक्षित करती रहीं। सन् १९७६ से १९८४ तक भोपाल के भारत भवन में रंगमंडल के साथ पूरी सक्रियता के साथ जुड़ी रहीं। उसी वर्ष लौट आईं अपने प्रिय नगर एवं कर्मभूमि चंडीगढ़। यहां ‘दी कम्पनी’ के नाम से अपना थियेटर-ग्रुप स्थापित किया और पंजाब यूनिवर्सिटी के ‘भारतीय रंगमंच’ विभाग से जुड़ गईं। एक लंबी अवधि तक विभाग की अध्यक्ष भी रहीं। एक स्थापित ‘मार्केटिंग कंसल्टेंट’ पुश्विंदर सिंह चौधरी से विवाह किया। दो बच्चे हैं, अंगद और कबीर। अंगद शोध कार्य में जुटा है जबकि कबीर फिल्मों में अपनी पहचान बनाने का प्रयास कर रहा है।
डॉ. नीलम मान सिंह का शोध कार्य समकालीन पंजाबी रंगमंचीय प्रयोगों पर आधारित है। इस शोध में उन्होंने १९७० से २००७ तक के आधुनिक भारतीय नाटकों के रुझानों का परिदृश्य प्रस्तुत किया है। सन् २०११ में उन्हें पद्मश्री मिला, २००० में संगीत नाटक अकादमी अवार्ड, २००४ में शिरोमणि पुरस्कार और अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मानों से भी नवाज़ी गईं। लम्बी अवधि तक केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी की सदस्य रहीं और वर्तमान में राष्ट्रीय नाट्य संस्थान की शैक्षणिक परिषद व भारतीय सांस्कृतिक एवं कला परिषद के सलाहकार मंडल से जुड़ी हैं।
चंडीगढ़ के सेक्टर-९ में रहने वाली डॉ. नीलम मान सिंह की विलक्षण प्रतिभा से मैं तब अभिभूत हुआ, जब गत वर्ष २०१५ में अपने जर्मन यात्रा के मध्य मुझे हैम्बर्ग के रंगकर्मियों से मुलाकात का अवसर मिला। वहां के रंगकर्मियों में तब भी २००३ की नीलम मान सिंह की प्रस्तुतियां ही चर्चा का विषय थीं। वे लोग इस बात से भी बेहद प्रसन्न थे कि मैं संयोगवश उसी भारतीय शहर से हूं जो शहर नीलम मान सिंह की कर्मस्थली है।
इससे पूर्व वर्ष १९९३, १९९५ और १९९७ में ‘लंदन अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच फेस्टीवल’ में भी उनकी प्रस्तुतियां बेहद सराही गई थीं।
‘दी फेस्टीवल आफ पर्थ’ (१९९९-२०००), ‘दी सिंगापुर आर्ट्स फेस्टीवल’ (२००२), ‘टोक्यो व क्योटो’ में वर्ष २००७ में विशिष्ट प्रस्तुतियां, लाहौर के नाट्योत्सवों (वर्ष २००४, २००५, २००६) में प्रस्तुतियां और लंदन के बहुचर्चित ‘सैडलर वैल्स थियेटर फेस्टीवल’ में नीलम मान सिंह छाईं रहीं। उनकी संस्था ‘दी कंपनी’ के अधिकांश नाटक पश्चिमी दुनिया के चर्चित ‘क्लासिक्स’ पर आधारित रहे और उनके पंजाबी रूपांतरण में उन्हें प्रख्यात पंजाबी कवि सुरजीत पात्तर का सहयोग मिला। इन प्रस्तुतियों में संगीत दिया प्रख्यात रंगकर्मी एवं चिंतक बीवी कारंथ ने। जि़न्दगी के इस मोड़ पर भी डॉ. नीलम सिंह मान अपनी सक्रियता पूर्णतया बनाए हुए हैं।
भारत सरकार द्वारा १९९८ में पद्मश्री से और २००८ में पद्मभूषण से सम्मानित डॉ. ब्रजेंद्र नाथ गोस्वामी १५ अगस्त, १९३३ को सरगोधा (इस समय पाकिस्तान में) में जन्मे थे। पिता बीएन गोस्वामी उस समय सेशन जज थे। प्रारंभिक शिक्षा अलग-अलग स्कूलों में हुई। कॉलेज-शिक्षा की शुरुआत हिन्दू कॉलेज अमृतसर से की। बाद में १९५४ में पंजाब विश्वविद्यालय से एमए के बाद १९५६ में भारतीय प्रशासनिक सेवा में चले गए। बिहार केडर के अध्ययन पदों पर कार्य करने के बाद लगा कि कला में विभिन्न के लिए समय नहीं मिल पा रहा तो केडर से त्याग-पत्र देकर पंजाब विश्वविद्यालय लौट आए। यहां प्रो. हरीराम गुप्ता के मागदर्शन में ‘कांगड़ा पेंटिंग्स’ पर शोधकार्य किया और १९६१ में इसी विषय पर पीएचडी प्राप्त की।
विश्व प्रख्यात कला समीक्षक आर्थर बाशम और डब्ल्यूजी आर्चर उनके परीक्षक थे। गोस्वामी अपने अध्ययन काल में ही पंजाब विश्वविद्यालय में कला-इतिहास का विषय पढ़ाने लगे। इसी मध्य हाईडलबर्ग यूनिवर्सिटी में पढ़ाने चले गए थे। वहां वह १९७३ से १९८१ तक रहे। इसके अतिरिक्त उन्होंने बर्कले, कैलिफोर्निया, पेंसिलवेनिया और ज्यूरिख विश्वविद्यालय से भी एक विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में स्वयं को जोड़े रखा है।
पंजाब विश्वविद्यालय के ‘म्यूजि़यम आफ फाइन आर्ट्स’ के संस्थापक निदेशक के रूप में इस शहर को उन्होंने कला के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान दी। इस संग्रहालय में समकालीन भारतीय कला की १२०० कृतियां संग्रहीत है। वह भारतीय इतिहास शोध परिषद की अधिशाली परिषद के सदस्य भी रहे हैं और चंडीगढ़ ललित कला अकादमी के अध्यक्ष भी।
संयोगवश उनकी अद्र्धांगिनी डॉ. करुणा गोस्वामी भी एक प्रख्यात कला-इतिहासकार हैं और पंजाब विश्वविद्यालय की पूर्व प्रोफेसर हैं। दो बच्चे हैं, अपूर्वा और मालविका।
डॉ. गोस्वामी का वैशिष्ट्य ‘पहाड़ी-पेंटिंग’ है। इसी विषय पर उन्होंने पांच पुस्तकें दी हैं, जिनमें ‘चैनसुख आ$फ गुलेर’, ‘ए ग्रेट इंडियन पेंटर शाम फ्राम हिल स्टेट’, ‘कोर्ट पेंटर्स आ$फ नार्थर्न इंडिया’, ‘पेंटर्स एट दी सिख कोर्ट्स’, ‘एसैंस आफ इंडियन आर्ट’ और ‘मास्टर्स आफ इंडियन पेंटिंग ११०० टु १९००।’ डॉ. गोस्वामी विश्व के अनेक भागों में ‘वंडर आफ दी एज’ के शीर्षक से अनेक प्रदर्शनियां आयोजित कर चुके हैं।
वह पंजाब विश्वविद्यालय के आजीवन प्रोफेसर (एमायरेट्स प्रोफेसर) हैं और साराभाई फाउंडेशन अहमदाबाद के उपाध्यक्ष भी हैं। यही फाउंडेशन ‘कैलिको म्यूजियम आफ टैक्सटाइल का संचालन भी करती है।’
चार दशक तक रंगमंच व लोक संगीत के क्षेत्र में विभिन्न सम्मान प्राप्त करने वाली शख्सियत बलबीर कौर
वस्तुत: लगभग चार दशक तक रंगमंच व लोक संगीत एवं शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में विशिष्ट सेवाओं के लिए विभिन्न सम्मान प्राप्त करने वाली इस शख्सियत ने बलवंत गार्गी के अनेक नाटकों (विशेष रूप में मिजऱ्ा साहिबां) अम्माल अल्लाना के हयवदन आदि अनेक चर्चित नाटकों व मोहन महर्षि, नीलम मान सिंह, मनोहर सिंह, बीवी कारंथ, शीला भाटिया, जॉय मिशल आदि के निर्देशन में मंचित अनेक चर्चित नाटकों में भी विशिष्ट भूमिका निभाई। संगीत नाटक अकादमी व अन्य अनेक राष्ट्रीय संस्थानों द्वारा सम्मानित इस शख्सियत ने चंडीगढ़ के रंगमंच को अंतर्राष्ट्रीय स्तर चर्चा का प्रमुख केंद्र बनाया।
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