सम्मान दिवस स्पेशल- स्याणे लोग आज भी ताऊ की राजनैतिक सोच को याद करते हैं

 जन संदेश न्यूज नेटवर्क — गुरूग्राम, हरियाणा

चंडीगढ़: आपसी वैमनस्य, असहिष्णुता और धार्मिक उन्माद से भरे भारत में किसी को यह आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि सभी समझदार लोग जननायक चौधरी देवी लाल की राजनैतिक सोच को याद करते हैं।

देश में अनेक ऐसे नेता हुए हैं जो उच्च वर्ग से संबंधित होने के बावजूद जनसाधारण में जाकर उनकी समस्याओं को समझने में काफी हद तक सफल रहे। परंतु चौधरी देवी लाल अकेले ऐसे व्यक्ति थे जिनका जन्म न केवल ग्रामीण परिवेश में हुआ बल्कि ऐसे परिवार में हुआ जो उस समय के बड़े जमीदारों में गिने जाते थे और लगभग सामंती रहन-सहन था। इसके बावजूद उन्होंने सभी वर्गों के भेद को अनदेखा करते हुए अपने आपको न केवल गरीब लोगों के साथ खड़ा किया बल्कि अपने युग में धर्म और जातिवाद की सीमाओं को पार कर सभी को एकजुट कर सामाजिक और आर्थिक न्याय का युद्ध लड़ा।

यही कारण है कि उन्हें न केवल एक संगठनकर्ता के रूप में जाना गया बल्कि वह देश में गठबंधनों के निर्माता भी जाने गए। उनके द्वारा बनाए गए गठबंधन न केवल विभिन्न मत रखने वाले राजनैतिक दलों में होता था बल्कि ग्रासरूट पर वह हर जाति के प्रतिनिधियों को एकसाथ मिलाकर चलने का प्रयास भी किया करते थे। इसी को सरल भाषा में 36 बिरादरियों का गठबंधन कहा गया है जिसे एकत्रित करना जितना आसान लगता है बनाना उतना ही कठिन है। ऐसे गठबंधन बनाते समय अक्सर उसके निर्माता इस बात को भुलाने में असमर्थ हो जाते हैं कि उनका संबंध किसी वर्ग या जाति विशेष से है। जननायक चौधरी देवीलाल का बड़प्पन इसी बात में था कि वह प्रत्येक जाति से साधनहीन व्यक्ति की ईमानदारी और प्रतिबद्धता को ही सबसे बड़ी मान्यता मानकर किसी भी ऊंचे पद पर बैठाने के लिए तैयार रहते थे। उनकी कथनी और करनी में अंतर नहीं था इसी कारण वह न केवल ऐसा कहते थे बल्कि जब उनको अवसर मिला तो उन्होंने इसी आधार पर लोगों को चुनावी टिकट देकर विधानसभा का सदस्य बनवाया। 

यदि चौधरी देवी लाल को केवल ग्रासरूट राजनीति का खिलाड़ी ही माना जाए तो यह उनके साथ अन्याय है क्योंकि वह राष्ट्रीय स्तर पर भी न केवल गठबंधन बनाने में सफल रहते थे बल्कि ऐसी नीतियां भी निर्धारित करवाते थे जिनके द्वारा राज्यों को दूरगामी लाभ प्राप्त होते थे। भारत जैसे विविधता वाले देश में सत्ता का विकेंद्रीकरण देश के लिए घातक सिद्ध हो सकता है, इसे वह बहुत जल्दी पहचान गए थे। इसी कारण अपने सम्पूर्ण जीवन में उनके संघर्ष का एक मुख्य मुद्दा सत्ता का विकेंद्रीकरण रहा है। इस विकेंद्रीकरण के पक्षधर वह न केवल केंद्र और राज्यों के बीच में थे बल्कि राज्यों के आंतरिक मामलों में भी उनका यह प्रयास होता था कि ऐसी नीतियां निर्धारित हों जिनकी मांग सबसे निचले स्तर से उठकर आ रही हो। देश में पंचायतों का सशक्तिकरण बहुत बाद में हुआ। उससे बहुत पहले वह पंचायतों को अनेक अधिकार देने के हिमायती रहे हैं। गांव-गांव जाकर न केवल पंचायतों बल्कि चौपालों मेें बैठकर वे लोगों की बातों को सुनकर और उनकी मांगों को समझकर, अपनी नीतियों का निर्धारण करते थे। सच पूछा जाए तो सत्ता का विकेंद्रीकरण इसी प्रकार हो सकता था। 

जीवनपर्यंत उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों को अपनी सभी नीतियों का केंद्र बिन्दु बनाकर रखा। उनकी सोच बड़ी स्पष्ट थी क्योंकि वह जानते थे कि देश की 70 प्रतिशत आबादी कृषि और कृषि संबंधी व्यवसायों पर निर्भर करती है। इसी कारण वह किसानों के हितों की नीतियों को प्राथमिकता देते थे। कोई भी समाज इतने बड़े वर्ग की अनदेखी कर समृद्ध होने का दावा नहीं कर सकता। इसी कारण शहरी मानसिकता वाले लोग और मीडिया भले ही उनकी ग्रामीण सोच की आलोचना क्यों न करते रहे हों परंतु इस प्रकार की आलोचना से न तो वह कभी प्रभावित हुए और न ही उससे विचलित हुए।

उनकी इन्हीं नीतियों के कारण वह आज के संदर्भ में यदि लोगों को बहुत याद आएं तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आज समूचा ग्रामीण क्षेत्र और विशेषकर किसान एक संकट के दौर से गुजर रहे हैं। सरकार का दावा है कि वह वर्ष 2022 तक उनकी आमदन दोगुनी कर देगी। परंतु सच्चाई यह है कि ऐसा होने के आसार दूर-दूर तक नजर नहीं आते और कड़वी सच्चाई यह है कि 2022 तक किसानों की जेब में पहले से भी कम पैसा होगा। जिस रफ्तार से कृषि लागत मूल्य बढ़ता जा रहा है और सरकार की निजीकरण की नीतियों के कारण उन्हें अपनी फसल का कम मूल्य प्राप्त हो रहा है, उसे देखते हुए उनकी खुशहाली एक मृगतृष्णा होगी।

दूसरी सबसे बड़ी चुनौती जो देश के सामने है वह है कि आज सरकार की मानसिकता के कारण अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया गया है।  वह यह शिकायत भी नहीं कर सकते कि वह असुरक्षा की भावना से पीडि़त हैं। जो ऐसा कहता है उसे कहा जाता है कि वह पाकिस्तान या किसी अन्य देश में चला जाए। चौधरी देवी लाल का योगदान इस क्षेत्र में उतना ही महत्वपूर्ण रहा है जितना किसानों के कल्याण के लिए था। उनके जीवनकाल में हरियाणा में कभी भी कोई ऐसी घटना नहीं घटी जिससे धार्मिक उन्माद को बढ़ावा मिला हो अथवा किसी भी धार्मिक समुदाय में असुरक्षा की भावना बढ़ी हो। परंतु आज हरियाणा एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां न केवल धार्मिक समुदाय असुरक्षित अनुभव करते हैं बल्कि अनेक जातियों के लोग अपने ही गांवों में बसे रहने से डरते हैं। हरियाणा के सामाजिक परिवेश में यह बदलाव पिछले कुछ समय से आया है और इसीलिए चौधरी देवी लाल को याद करना आवश्यक हो जाता है क्योंकि उन्होंने नीतियों का निर्धारण जातपात या धर्म के आधार पर नहीं किया बल्कि यह सोचकर किया कि क्या उनसे समाज के सबसे कमजोर वर्ग के व्यक्ति को उससे लाभ पहुंचेगा या नहीं। सामाजिक एवं आर्थिक उत्थान हमारे संविधान का एक मुख्य लक्ष्य भी है और सच्चाई यह है कि आज के सत्तापक्ष के लोग संविधान के इस लक्ष्य को न केवल अनदेखा कर रहे हैं बल्कि उसे मिटाने का प्रयास कर रहे हैं। इसी कारण उनके जन्म-दिन के अवसर पर उनकी कल्याणकारी नीतियों, धार्मिक समन्वयवाद और व्यक्तिगत गरिमा को बनाए रखने की सोच को याद करना जरूरी है। 

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