सामाजिक क्रांति के सूत्रधार ताऊ देवी लाल
सर्वसाधन संपन्न परिवार में एक महान क्रांतिकारी का जन्म एक शती पूर्व 25 सितंबर, 1914 को अब हरियाणा के सिरसा जिला गांव तेजा खेड़ा में हुआ था। स्वतंत्रता संग्राम की अग्रि प्रज्जवलित हो चुकी थी जिसकी लड़ाई में तन, मन, धन से यह रजवाड़ा जमींदार भी कूद पड़ा। पढ़ाई छोड़ दी और जेल में आना-जाना लग गया। उन्होंने साइमन कमीशन के विरुद्ध सत्याग्रह करके जेल की सलाखें से दोस्ती की थी वह दोस्ती 1985 के न्याय युद्ध तक बरकरार रही। स्वतंत्रता संग्राम के साथ-साथ उन्होंने किसान, मजदूर और कामगारों की दिक्कतों के उत्थान हेतू अपने जीवन समर्पण कर दिया। इसी कारण सत्ता का लोभ उनके मन में कभी आया ही नहीं।
यही संघर्ष उनकी प्रशासनिक कार्यशैली में भी झलकता था। ‘लोक-राज लोक-लाज से चलता है’ यहीं नहीं ‘बिजली पानी का प्रबंध, भ्रष्टाचार बंद’ तथा ‘प्रशासन आपके द्वार’ व घुमंतू परिवारों के बच्चों को निशुल्क शिक्षा के साथ-साथ स्कूल हाजरी के भी पैसे देने उसका प्रमाण है। ‘कन्या दान’ स्त्री शिक्षा पर ध्यान, स्नातक तक निशुल्क शिक्षा और एक स्त्री शिक्षित होने से दो परिवारों के शिक्षित होने की सोच, वृद्धावस्था सम्मान पैंशन, किसान का ऋण माफ, हर खेत को पानी, हर खेत को पानी, किसान के खेत के साथ लगे सडक़ के वृक्षों में से किसान का आधा हिस्सा आदि अनेकों योजनाएं चालू भी की और उन्हे फलीभूत भी किया। उनकी योजनाओं का दूसरे राज्यों और केंद्र सरकार ने अनुकरण भी किया।
किसान व मजदूर का बच्चा पढ़े, इसके लिए गांव-गांव में स्कूल खोल दिए, किसान की फसल मंडी तक पहुंचे, इसलिए हर गांव पक्की सडक़ से जोड़ दिया। किसान को फसल का उचित दाम मिले और समय पर मिले, हर छोटे-बड़े स्थान पर मंडियों का जाल बिछा दिया। गांवों में बाढ़ आ गई तो खुद कस्सी-तसला उठाकर देहात में पहुंच गए और आज हर गांव में इर्द-गिर्द बने रिंगबांधों की बदौलत ही पूरा प्रदेश बाढ़ों की विभीषिका से बच पाया।
किसान व मजदूर का बच्चा पढ़े, इसके लिए गांव-गांव में स्कूल खोल दिए, किसान की फसल मंडी तक पहुंचे, इसलिए हर गांव पक्की सडक़ से जोड़ दिया। किसान को फसल का उचित दाम मिले और समय पर मिले, हर छोटे-बड़े स्थान पर मंडियों का जाल बिछा दिया। गांवों में बाढ़ आ गई तो खुद कस्सी-तसला उठाकर देहात में पहुंच गए और आज हर गांव में इर्द-गिर्द बने रिंगबांधों की बदौलत ही पूरा प्रदेश बाढ़ों की विभीषिका से बच पाया।
हरियाणा के किसानों को देशभर से गन्ने के सर्वाधिक मूल्य दिलवाकर एक नई क्रांति का बीज बो दिया। ‘सफेद क्रांति’ के सूत्रधार बन मिनी डेयरी योजना चालू करवाकर किसानों को खेती के साथ-साथ आमदन का एक नया साधन दिया साथ ही मधुमक्खी पालन, मुर्गी पालन, रेशम की खेती जैसी अनेकों योजनाएं लागू कर दी। गरीब मजदूर के घर पर भी उजाले के लिए एक बल्ब की व्यवस्था करवा दी। चौधरी देवी लाल के वक्त आलू की बेकदरी हो रही थी। जिसके चलते किसान फसल को खेतों में ही दबाने के लिए मजबूर थे क्योंकि उसको खुदाई मूल्य भी नहीं मिल रहा था।
वास्तव में चौधरी देवीलाल एक संत थे। जब प्रधानमंत्री की गद्दी मिली, तो वह ताज भी श्री वीपी सिंह के सिर पर रख दिया। उनकी सोच गहरी थी, वे बहुत सरल भाषा में सीधी बात करते थे इसीलिए लोग उन्हे ताऊ कहा करते थे। किसान की दुर्दशा से वे हमेशा द्रवित हो उठते थे। जब चौधरी देवीलाल ने किसान के ऋण की माफ ी की बात की तो सत्तासीन सरकार ने मजाक उड़ाया लेकिन मन, कर्म, वचन के पक्के ताऊ ने सत्ता में आते ही वह कर दिखाया।
उन्होंने निजी जमीन में से लगभग 2000 एकड़ मुजारों को दान दे दी थी। उन्होंने सदा गरीब किसान, मजदूर, मजलूम की लड़ाई लड़ी व अपने सिद्धांतों के साथ कभी समझौता नहीं किया। जब श्री वीपी सिंह कसौटी पर खरे नहीं उतरे तो चौधरी देवीलाल ने भी अपने हाथ खींच लिए।
उनके प्रयासों से छोटे काश्तकारों को उनका अधिकार दिलाने हेतू पंजाब विधानसभा में भू-पट्टेदारी अधिनियम 1956 बनवाकर मुजारों की बेदखली को रोका गया। इस अधिनियम के द्वारा 6 साल से भूमि काश्त कर रहे मुजारों को अदालत के माध्यम से आसान किश्तों पर जमीन खरीदने का अधिकार दिलाकर मालिक भी बनवाया।
संयुक्त पंजाब में हिंदी भाषा क्षेत्र की न तो सरकारी सेवाओं में नुमाइंदगी थी और न ही विकास कार्यों में उसका वांछित हिस्सा था। वर्तमान हरियाणा प्रदेश के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा था। उन्होने हरियाणा के निर्माण का संकेत 14 मार्च 1961 को पंजाब विधानसभा में बोलते हुए कर दिया था कि यदि हिंदी भाषी क्षेत्रों के साथ इसी तरह सौतेला व्यवहार होता रहा तो इस क्षेत्र को पंजाब से अलग करना पड़ेगा। वे लगातार हरियाणा के अस्तित्व के लिए संघर्षरत रहे। संत फतेहसिंह ने पंजाब सूबा न बनने की सूरत में अकाल तख्त पर आत्मदाह का ऐलान किया तो उस समय हरियाणा के हितों के सजग प्रहरी चौ. देवीलाल अस्पताल में थे। डाक्टरों ने उन्हे अस्पताल में रहकर इलाज करवाने की सलाह दी परंतु वह अमृतसर गए। डाक्टरों से उन्होंने कहा कि मेरे मरने से हरियाणा बचता है तो इससे बड़ा परमार्थ कोई और नहीं हो सकता। इस तरह उनके नेतृत्व में संघर्ष के परिणामस्वरूप हरियाणा प्रदेश अस्तित्व में आया था।
आपातकाल में 11 माह की जेल सहकर वे 26 जनवरी 1977 को जेल से रिहा हुए। तब बिखरे विपक्ष को इकट्ठा कर जनता पार्टी के गठन में विशेष भूमिका निभाई और 23 जून 1977 को हरियाणा के पांचवें मुख्यमंत्री बने। राष्ट्रहित में किसी भी राजनैतिक व सामाजिक मुद्दे पर वे अपने विरोधियों तक से भी सलाह मश्विवरा करने में संकोच नहीं करते थे। इसीलिए उन्होने सतलुज यमुना लिंक नहर के मुद्दे पर 14 अगस्त 1985 को अपने तमाम विधायकों के साथ विधानसभा से इस्तिफा दे दिया। कांग्रेस की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ जींद में एक ऐतिहासिक रैली करके प्रथम न्याय युद्ध की शुरूआत की और वर्ष 1987 में विधानसभा की 90 सीटों में से 85 सीटें जीतकर नया रिकार्ड स्थापित करके दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। हरियाणा को न्याय दिलाने व शहीदों को सम्मान देने के लिए 23 जनवरी 1987 को रोहतक में चौ. देवीलाल के नेतृत्व में सम्मेलन हुआ जिसकी हाजरी का रिकार्ड अब तक नहीं टूटा है।
आज आवश्यकता है कि सरकारी नीति व कार्यशैली निर्धारण के लिए ताऊ देवीलाल की नीतियों व सिद्धांतों का अनुसरण किया जाए। चौधरी साहब की जन कल्याणकारी योजनाओं व निश्छल राजनीति से प्ररेणा लेकर प्रशासनिक व राजनैतिक तंत्र की विचारधारा को बदलने की नितांत आवश्यकता है ताकि ग्रामीण गरीब, मजदूर व किसान वर्ग के कल्याण व उत्थान के साथ-साथ स्वच्छ प्रशासन के लिए मार्ग प्रशस्त हो सके। वास्तव में ताऊ देवीलाल गरीब व असहाय समाज की आवाज को बुलंद करने वाले एक सशक्त प्रवक्ता थे जिनका लक्ष्य राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का एक स्वावलंबी व स्वस्थ ग्रामीण समाज का सपना पूरा करना था।
डॉ. महेन्द्र सिंह मलिक
आईपीएस (सेवा निवृत)
पूर्व डीजीपी

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