इलेक्ट्रॉनिक’ हो या ‘प्रिंट मीडिया, इस समय इनका संचालन इतना आसान नहीं रह गया
मीडिया’ में चर्चा का विषय बनना ही एक विशेष उपलब्धि माना जाता है। मगर अब मीडिया स्वयं चर्चा में है। यह चर्चा एक इलेक्ट्रॉनिक चैनल पर एक उद्योग-समूह के अधिकार से आरंभ हुई है। ऐसा शायद पहली बार हुआ है कि इस अधिग्रहण को लेकर उपरोक्त इलेक्ट्रॉनिक चैनल पर चर्चा नहीं हो पाई।
इस घटना पर चर्चा के स्थान पर बेहतर होगा कि ‘मीडिया’ के बदलते हुए स्वरूप पर स्वस्थ मन से चर्चा कर ली जाए। इस समय मीडिया चाहे ‘इलेक्ट्रॉनिक’ हो या ‘प्रिंट, इनका संचालन आसान नहीं रहा। विज्ञापनदाता, चाहे सरकारें हों या उद्योग-समूह, अपनी शर्तों पर विज्ञापन दिए जाते हैं। आप तम्बाकू-निषेध या किसी अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे पर कड़ी भाषा में प्रकाशित लेख/समाचार/प्रसारण देकर तम्बाकू निर्माता कंपनियों से विज्ञापन नहीं ले सकते। यह बात अलग है कि आपके मीडिया की लोकप्रियता को देखते हुए ऐसी कंपनियां स्वयं बिना शर्त विज्ञापन देने पर विवश हो जाएं। यही स्थिति सरकारी विज्ञापनों की। आप विरोध का कड़ा तेवर अपनाकर सरकारी विज्ञापनों पर भी दावेदारी नहीं जता सकते।
लेकिन इस विकट स्थिति के बावजूद यह भी एक सुखद पहलू है कि व्यापक स्तर पर सरकारों ने कहीं भी प्रतिबंध नहीं लगाए। यदि किसी अखबार को या चैनल को काली सूची में रखा भी जाता है तो वह सब अघोषित होता है।
चलिए, यह बहस किसी सर्वसम्मत निष्कर्ष तक नहीं पहुंचेगी, लेकिन कुछ बातें हमें सर्वसम्मति से स्वीकार भी करनी होंगी।
1. हमें यह स्वीकार करना होगा कि प्रामाणिक सूचना एवं समाचार पाने का पाठक, श्रोता एवं दर्शक को अधिकार है।
2. हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि मीडिया, प्रामाणिक सूचनाएं भी देगा और पूर्वाग्रह से मुक्त विश्लेषण भी। पूर्वाग्रह मुक्त सूचनाएं, समाचार या विश्लेषण, कभी वामपंथी या दक्षिणपंथी नहीं होते। हमें पाठक, श्रोता, दर्शक को यह अधिकार भी देना होगा कि हमारे द्वारा प्रस्तुत सामग्री को आधार बनाकर अपने निष्कर्ष स्वयं निकाले।
यहां ‘मीडिया’ के भारतीय स्वरूप को समझने की आवश्यकता है। ‘मीडिया’ की दृष्टि से भारत इस समय विश्व में पहले स्थान पर है। इस समय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्षेत्र में भारत 500 से अधिक चैनलों वाला देश है। इनमेें से विशुद्ध 84 चैनल ऐसे हैं जिन्हें समाचार-प्रधान चैनल कहा जा सकता है।
जहां तक प्रिंट-मीडिया का प्रश्न है, देश में छोटे-बड़े समाचार-पत्रों की संख्या ७० हज़ार के लगभग है। हमारे देश में लगभग दस करोड़ समाचार-पत्र रोज़ाना बिकते हैं। भारत में मीडिया की यात्रा ‘हिकीज़ बंगाल गज़ट’ से वर्ष 1780 में आरंभ हुई थी। उसके साथ ही आरंभ हुए थे ‘दी इंडिया गज़ट’, ‘द कलकत्ता गज़ट’, ‘द मद्रास कुरियर’। हिंदी में 1826 में प्रकाशित हुआ ‘उदण्ड मार्तंड’ पहला समाचार-पत्र है।इस समय स्थिति यह है कि देश में हिंदी अखबारों की पहली कतार में जो दस समाचार-पत्र चर्चा में रहते हैं, उनमें पंजाब केसरी के अलावा नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका, नईदुनियां, प्रभात खबर और दैनिक हिंदुस्तान आदि शामिल हैं। अंग्रेजी के दस प्रथम पंक्ति के अखबरों में ‘दी टाइम्स आफ इंडिया’, ‘दी टेलीग्राफ’, ‘दी इंडियन एक्सप्रेस’, ‘दी हिन्दू’, ‘दी हिन्दुस्तान टाइम्स’ आदि शामिल हैं।
इन सभी चैनलों व अखबारों में अपना अस्तित्व बचाने के लिए विज्ञापनों की कमाई दरकार है। ऐसी स्थिति में वैचारिक स्वतंत्रता के मामले में संभलकर चलना आवश्यक हो चला है। फिर भी मीडिया अधिकांशत: तटस्थ रहता है लेकिन जब कभी ज़्यादा जुझारू व एकपक्षीय तेवर अपनाए जाते हैं, स्वाभाविक है, विज्ञापनों के मामले में कुछ सीमा तक पूर्वाग्रह छोडऩे पड़ते हैं। एक ही हाथ में डंडा और कटोरा लेकर अखबारी संसार नहीं चलता। लेकिन यदि थोड़ा संयम व खुलेपन से विचार हो तो पाठक, दर्शक एवं श्रोता को प्रामाणिक सूचनाएं व ज्ञानवद्र्धक दी जा सकती है।
वर्ष 1975 में प्रेस की स्वाधीनता का जिस तरह से हनन हुआ था, उससे हमारे देश ने बहुत कुछ सीखा है। वर्ष 1977 के बाद कभी भी मीडिया के खिलाफ अंधाधुंध दमन चक्र नहीं चला। सभी के विचारों को भी समुचित स्थान मिलता रहा है। फिर भी वामपंथ, दक्षिणपंथ के विवाद उठे हैं लेकिन शुक्र है कि आपातकाल सरीखी परिस्थितियां कभी नहीं आने दी गईं। पूर्वाग्रहोंं से मुक्त प्रस्तुति अब मीडिया के लिए अनिवार्य भी है और अपेक्षित भी।
‘पंजाब केसरी’ पर अविभाजित पंजाब में प्रतिबंध लगे थे और बिजली काट दी गई थी, तब लाला जगत नारायण पे्रस की गरिमा व आज़ादी का शिखर-प्रतीक बन गए थे। ट्रैक्टरों से अखबार छापने का वह प्रयोग आज भी विश्व पत्रकारिता के इतिहास का एक अंग है। उसके बाद आतंकवाद के दिनों में मीडिया के चीरहरण के सभी प्रयासों को कलम के माध्यम से जिस सुदृढ़ता के साथ परास्त किया गया वे दिन भी पत्रकारिता के इतिहास का अंग है। अपने संस्थापकों व अपने पत्रकारों की बली देकर उस काल में पे्रस की गरिमा को बचाया गया लेकिन यह भी तथ्य है कि इस समूह ने किसी भी विचारधारा की कट्टरपंथी सोच को स्वीकार नहीं किया।
साभार: डॉ. चंद्र त्रिखा
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