हमारे देश की माएं आपने बच्चे का प्यार करती हैं, पाल-पोष कर बड़ा करती हैं, अच्छा करने पर दुलारती हैं और शैतानी करने पर डांटती है, खुद भूखी रहकर बच्चे का पेट भरती है! हमारी नजरों में मां यही होती हैं। भारतीय समाज में मां सबसे उच्च हैं, मां जननी है, मां में ईश्वर हैं लेकिन विश्व के कई देश हैं जो ऐसा नहीं मानते हैं। वह मां को बस ये हक देते हैं कि वह केवल बच्चे को पैदा कर सकती हैं, अपने हाथ से खाना नहीं खिला सकती, अपने पास सुला नहीं सकती और अगर गलती पर डांट दिया तो देश के कानून के मुताबिक कुछ चाइल्ड केयर एजेंसी बच्चे को अपने साथ ले जाएगी और 18 साल का होने के बाद ही वापस देगी!
इसी कानून से एक मां की लड़ाई पर फिल्म बनाई गयी हैं। जिसका नाम ‘मिसेज चटर्जी वर्सेस नॉर्वे’ हैं। फिल्म में मुख्य भूमिका में रानी मुखर्जी हैं। फिल्म एक नोवल द जर्नी ऑफ ए मदर पर आधारित हैं। नोवल में एक भारतीय मां सागरिका चटर्जी की कहानी को बयां किया है। द जर्नी ऑफए मदर की कहानी उनके वास्तविक जीवन पर आधारित है जहां वह अपने अनुभव साझा करती हैं। यह पुस्तक साजिश और पश्चिमी देशों में बाल कल्याण की गैर-कानूनी प्रथाओं पर केंद्रित है जो बच्चों को उनके मासूम माता-पिता से छीन लेती है। ऐसा ये संस्थाएं उन कारणों से करती हैं जो भारत में बहुत आम हैं।
फिल्म की कहानी
सागरिका चक्रवर्ती ने भूभौतिकीविद् ;अनुरूप भट्टाचार्य से शादी की और युगल 2007 में नॉर्वे चले गए। एक साल बाद सागरिका दंपति के पहले बच्चे अभिज्ञान को जन्म देती है जिसने जल्द ही आत्मकेंद्रित होने के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। यह एक तरह की बीमारी होती है। इसके बाद सागरिका एक बेटी को जन्म देती हैं। बेटी का नाम ऐश्वर्या होता हैं। सागरिका अपने दोनों बच्चों को बहुत प्यार करती हैं। मां सागरिका चक्रवर्ती बच्चे को एक शैतानी के लिए डांटती है और इसके बाद ही नार्वे के कानून के मुताबित अभिज्ञान को एक पारिवारिक बालवाड़ी संस्था वाले लेकर चले जाते हैं। बच्चे को मां से अलग कर दिया जाता है। मां कानूनी लड़ाई लड़ती है, अलग अलग जगहों पर गुहार लगाती हैं लेकिन उनका बच्चा उसे वापस नहीं दिया जाता बल्कि सागरिका चक्रवर्ती को ही बुरी मां कहा जाता है क्योंकि वह अपने बच्चे को अपने हाथ से खाना खुलाती थी और पास सुलाती थी। इसके बाद 2011 में त्रासदी हुई जब नॉर्वेजियन चाइल्ड वेलफेयर सर्विसेज, जिसे बार्नेवरनेट (चाइल्ड प्रोटेक्शन) ने ऐश्वर्या और अभिज्ञान दोनों को उनके माता-पिता से दूर कर दिया जब तक कि वे 18 साल के नहीं हो गए। बार्नवरनेट ने जिसे ‘अनुचित पेरेंटिंग’ करार दिया।दंपति के खिलाफ आरोपों में उनके बच्चों के साथ एक ही बिस्तर पर सोना, हाथ से खाना खिलाना (जिसे नॉर्वेजियन अधिकारियों ने जबरन खिलाना माना था) और शारीरिक दंड भी शामिल था (सागरिका ने कथित तौर पर बच्चों को एक बार थप्पड़ मारा था)। जबकि ये चीजें भारतीय संदर्भ में सामान्य लग सकती हैं। नार्वे के अधिकारियों ने इसे एक अपराध माना है। विशेष रूप से नॉर्वे में बच्चों और उनके पालन-पोषण के संबंध में बेहद सख्त कानून हैं और ये कानून सांस्कृतिक अंतरों की परवाह किए बिना सार्वभौमिक रूप से लागू किए जाते हैं। इस कहानी ने जल्द ही नॉर्वेजियन और साथ ही भारतीय मीडिया दोनों का ध्यान आकर्षित किया, बार्नवरनेट के कार्यों की कई अत्यधिक आलोचनाओं के साथ। कुछ लोग तो इसे ‘सरकार प्रायोजित अपहरण’ भी कहते हैं। मुद्दा यह था कि बार्नवरनेट न केवल भारतीय पालन-पोषण के बारे में सांस्कृतिक रूप से अनभिज्ञ दिखाई देता था बल्कि वे अपने स्वयं के मामले को मजबूत करने के लिए व्यक्तिगत रूप से मां पर हमला करते हुए भी प्रतीत होते थे। यह एक प्रकार का बच्चों का अपहरण करने का गिरोह चल रहा था। बढ़ते प्रचार के साथ कूटनीतिक दबाव आया। तत्कालीन विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने मामले पर समझौता करने के लिए ओस्लो में अपने नॉर्वेजियन समकक्ष से मुलाकात की और लंबी बातचीत के बाद, यह निर्णय लिया गया कि बच्चों की कस्टडी भारत में एक पैतृक चाचा, 27 वर्षीय दंत चिकित्सक अरुणाभस भट्टाचार्य को दी जाएगी। फिल्म किताब पर आधारित है, जिसमें रानी सागरिका का किरदार निभा रही हैं।
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