एक दिन रंगों की बारिश, अगले दिन शोकगीत

अंतिम सांस का कोई ‘एक्सरे’ नहीं होता। यह भी एक अटल सत्य है कि प्रकृति अथवा नियति ही ‘कैलेंडर’ का आखिरी पन्ना लिखती है। फिल्म  ‘जाने भी दो यारो’ और ‘मिस्टर इंडिया’ सरीखी बेहद चर्चित $िफल्मों में अपनी बेहद लोकप्रिय एवं यादगार भूमिका निभाने वाले सतीश कौशिक जिस अंदाज़ से इस नश्वर संसार से गए हैं वह भी दुखद, विचित्र एवं अविस्मरणीय रहेगा।

एक दिन पहले होली के रंग और अगले ही दिन शोकगीतों की बारिश। बेहद अटपटा सा था, सब कुछ। मगर यह सब तो हो चुका। अब थोड़ा इस शख्स को बांच लें। सतीश जब मुंबई पहुंचे थे तो गुज़ारे के लिए अपने पिता के एक परिचित की कपड़ा मिल में भी काम करते रहे। अपने संघर्ष के दिनों को वह मज़े लेकर याद करते थे। श्याम बेनेगल की ‘मंडी’ में काम मिलने का किस्सा बहुत रस लेकर बताते थे। बेनेगल ने कहा था, सारी भूमिकाओं के लिए अभिनेता चुने जा चुके हैं फिर भी अपना फोटो छोड़ दें। ‘हाजिर जवाब सतीश कौशिक ने कहा’, फोटो तो नहीं है, ये एक्सरे रिपोर्ट देख लीजिए, मैं अंदर से बहुत अच्छा दिखता हूं।’ ठहाका लगाते हुए श्याम बेनेगल ने उन्हें काम दे दिया। अभिनय प्रतिभा, लेखक, सहायक निर्देशक, सह-निर्माता के काम भी करने लगे।

हालांकि, पहली निर्देशित फिल्म ‘रूप की रानी चोरों का राजा’ की नाकामी से वह अवसाद में चले गए थे, पर उन्हें बाद में अच्छे निर्देशक के रूप में भी पहचाना गया। समग्रता में यह मानने में कोई हर्ज नहीं कि बतौर हास्य अभिनेता उनका सिक्का ज़्यादा चला। यद्यपि वह अक्सर कहा करते थे, ‘अभिनेता सि$र्फ अभिनेता होते हैं। उन्हें ‘कामेडियन’ तक सीमित रखना भी ज़्यादती है।

हरियाणा विशेष रूप से इस विशिष्ट एवं महान कलाकार की देन कभी नहीं चुका पाएगा। ‘रूप की रानी चोरों का राजा’ से निर्देशन की दुनिया में कदम रखने वाले कौशिक ने ‘हम आपके दिल में रहते हैं’, ‘ हमारा दिल आपके पास है’, ‘बधाई हो बधाई’, ‘तेरे नाम’ और ‘मुझे कुछ कहना है’ जैसी कई फिल्मों का निर्देशन किया। उनके परिवार में पत्नी और बेटी हैं। कौशिक नेशनल स्कूल आफ ड्रामा और फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीच्यूट आफ इंडिया के छात्र थे। हरियाणा में जन्मे और दिल्ली के करोल बाग में पले-बढ़े कौशिक ने हमेशा अभिनेता बनने का साना देखा था। उन्हें ‘जाने भी दो यारो’, ‘राम-लखन’, ‘बड़े मियां छोटे मियां’, ‘मिस्टर इंडिया’, ‘दीवाना मस्ताना’, ‘हसीना मान जाएगी’, ‘भारत’, ‘छलांग’ , ‘उड़ता पंजाब’ जैसी फिल्मों में निभाए उनके किरदारों के लिए काफी सराहना मिली। फिल्म ‘मिस्टर इंडिया’ में कौशिक ने ‘कैलेंडर’ नामक एक रसाइये का किरदार निभाया था जो आज भी लोकप्रिय है। सतीश कौशिक ने वर्ष 1983 में आई फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ के संवाद लिखे और पंकज त्रिपाठी अभिनीत फिल्म ‘कागज’ (2021) की कहानी भी लिखी। कौशिक और अभिनेता गोविंदा की जोड़ी भी काफी मशहूर थी। दोनों 90 के दशक में ‘स्वर्ग’, ‘साजन चले ससुराल’, ‘दीवाना मस्ताना’, ‘परदेसी बाबू’, ‘बड़े मियां छोटे मियां’, ‘आंटी नम्बर-1’ और ‘हसीना मान जाएगी’ जैसी कई फिल्मों में साथ नज़र आए।

यहां वरिष्ठ पत्रकार अभिताभ श्रीवास्तव की कुछ पंक्तियां देखना ज़रूरी लगता है। ‘कितना आसान और रोमांचक लगता है कि वह नेशनल स्कूल आफ ड्रामा औ पूना फिल्म इंस्टीच्यूट होते हुए सन् 1979 में मुंबई पहुंचे और कुछ ही वर्ष में मशहूर हो गए। साधारण शक्ल-सूरत के बावजूद लोकप्रिय अभिनेता बनने का उनका सफर आसान बिल्कुल न था। उनकी खास बात यह थी कि वह कभी हौसला नहीं हारे और मेहनत से अपना लक्ष्य हासिल करने मे जुटे रहे। सतीश कौशिक दिल्ली के करोल बाग के निम्र मध्यवर्गीय माहौल में पले-बढ़े थे। उनके पिता ताले-घडिय़ां बेचते थे। जीवन में बहुत संघर्ष था। पिता का यह संघर्ष बाद में उनके लिए कच्चे माल की तरह काम आया, जब उन्होंने आर्थर मिलर के नाटक ‘डेथ आफ अ सेल्समैन’ के हिंदी रूपांतरण ‘सेल्समैन रामलाल’ में केंद्रीय चरित्र को रंगमंच पर साकार किया।

वह बिना लाउड हुए सहज हास्य पैदा करते थे। राम लखन में काशीराम की भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला था। साजन चले ससुराल के मुत्तुस्वामी के किरदार के जरिये उन्होंने पड़ोसन फिल्म में निभाए गए महमूद के किरदार को श्रद्धांजलि दी थी। इस फिल्म के लिए भी उन्हें सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता का फिल्म फेयर मिला था। ‘दीवाना मस्ताना’ में उनका पप्पू पेजर का किरदार ‘कैलेंडर’ की भूमिका की ही तरह बहुत लोकप्रिय हुआ। डेढ़ सौ से ज़्यादा फिल्मों में अभिनय व 10 फिल्मों में

निर्देशन के अलावा वह ओटीटी मंचों पर खूब सक्रिय थे। कंगना रनौत की आने वाली इमरजेंसी में वह बाबू जगजीवन राम की भूमिका में दिखेंगे।

सिनेमा दुनिया ने एक बेहतर इंसान खो दिया है। अभिनेत्री नीना गुप्ता ने अपनी आत्मकथा ‘सच कहूं तो’ में उनके बड़प्पन का जिक्र किया है। जिन दिनों नीना गुप्ता क्रिकेटर विवियन रिचड्र्स से अंतरंगता के चलते गर्भवती हो गई थीं, तब सतीश कौशिक ने बदनामी से बचाने के लिए उनकी अजन्मी संतान को अपना नाम देने की पेशकश की थी। वह ऐसे मस्तमौला इंसान थे कि उन्हें और उनके काम को लोग बार-बार देखना चाहते थे, पर

मृत्यु के अदृश्य हाथों ने अचानक बड़ी क्रूरता से ‘कैलेंडर’ को सिने पे्रमियों

के सामने से हटा दिया।

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