चुनाव 22: क्या बुरा है जो यह अफवाह उड़ा दी जाए
वादों की बारिश जारी है। चुनावों के मौसम में वादों की बाढ़ हर बार आती है। आम आदमी डरने लगता है। वह जानता है कि चुनावी मौसम में, सच, हाशिए पर बिलबिलाता रहता है। आम आदमी तालियां पीटता है सि$र्फ इलेक्ट्रॉनिक चैनलों के कैमरों की ज़द में आने के लिए। $फोटो आएगा तो एकाध पल का सुख मिलेगा। यह तो उसे भी मालूम है कि तालियों का मुआविज़ा नहीं मिलता।
अदबी लोग एक पर्ची पर एक ‘शेअर’ लिखकर जेब में ठूंसे हुए हैं। पर्ची पर लिखा है, ‘हमने इंसानों के दु:ख-दर्द का हल ढंूढ लिया क्या बुरा है जो यह अ$फवाह उड़ा दी जाए।’ वह इस ‘शेअर’ पर भी मुस्कराना चाहता है। मगर मंचों पर नेताओं की अभद्र भाषा, उसका ज़ायका बिगाड़ देती है। उसे डर लगता है चुनावों से। कभी न कभी आशंकाएं कुनमुनाती रहती हैं कि कहीं हिंसा तो नहीं होगी। कोई बड़ा आदमी शिकार नहीं बनेगा। शिकार तो आम आदमी बनेगा। कोई ‘ठंडा करने की धमकी देता है तो कोई पूछ रहा है ‘आप कम्पे्रसर हैं क्या?’ आम आदमी नहीं जानता ‘कम्पे्रसर’ क्या होता है, मगर उसे लगता है कि यह कोई अच्छा शब्द नहीं है। अच्छा शब्द होता तो नेता लोग मंचों से यह क्यों बोलते। चर्बी उतारने वाली भाषा से भी आम आदमी डरता है।
मगर कभी-कभी वह सोचता अवश्य है ‘नेता लोग सभ्य भाषा’ से न$फरत क्यों करते हैं? क्या विनम्रता, शालीनता, सभ्य भाषा और वोट-प्राप्ति के मार्ग की बाधाएं हैं? ‘डंडा’, ‘तमंचा’, ‘दुनाली’ और ‘मा$िफया’ क्या ये सब चुनावी-समर के प्रवेश द्वार पर बंटते हैं? बहरहाल एक बात सच सिद्ध हुई है। चुनावों में सच बोलना मना है। सच बोलेंगे तो वोट नहीं मिल पाएगा।
महर्षि वेदव्यास ने पांच स्थितियों में झूठ बोलने को पाप नहीं माना। विवाह काल में, पे्रम-प्रसंग में, अपने प्राणों पर संकट आने पर, जब सब कुछ लुट जाने का $खतरा हो तब, या जब किसी ज्ञानी अथवा विद्वान पर संकट आए तब। मगर महाभारत में ही ‘अश्वत्थामा’ वाले प्रसंग का (अश्वात्थामा हतो हत:/नरो वा कुंजरो वा) स्मरण होगा कि अश्वात्थामा एक हाथी का भी नाम था) में महर्षि वेदव्यास ने युधिष्ठिर को दोषी का नहीं माना। उस काल में चुनाव नहीं होते थे वरना महर्षि, चुनाव और युद्ध दोनों में झूठ बोलने की स्वीकृति तभी दे डालते।
चुनावों के समय अपने आय व सम्पत्ति का ब्यौरा देना पड़ता है। मगर यह भी सब जानते हैं कि कोई भी सच नहीं बोलता। यदि चुनाव आयोग के सामने पेश विवरण को ही प्रामाणिक मान लें तो पंजाब के चुनावी दंगल में नवजोत सिंह सिद्धू सर्वाधिक सम्पत्ति वाले हैं। उनकी वित्तीय हैसियत सुखबीर बादल, कैप्टन अमरेंदर सिंह, विक्रम सिंह मजीठिया आदि से कहीं ज़्यादा है। जिन चन्नी साहब को उनके राष्ट्रीय नेता राहुल गांधी ने ‘गरीब का बेटा’ घोषित किया था, उस चन्नी साहब के शपथ-पत्र के अनुसार, उनके पास ९.४४ करोड़ की सम्पत्ति है। यह जानना भी दिलचस्प होगा कि चन्नी साहब इन दिनों पंजाब विश्वविद्यालय से ‘इलेक्टोरल स्ट्रैटेजी एंड आर्गेनाइजेशनल स्ट्रक्चर आफ कांग्रेस’ विषय पर ‘पीएचडी’ भी कर रहे हैं। पहले वह एमए, एलएलबी, एमबीए आदि डिग्रियां प्राप्त कर चुके हैं। मगर यह भी नामुमकिन है कि राहुल गांधी सरीखे खानदानी राजनेता के सामने चन्नी साहब की वित्तीय औ$कात, गरीब आदमी वाली ही रहेगी। कहां राजा भोज और कहां...?
सीनियर बादल साहब की घोषित सम्मत्ति १२ करोड़ ३६ लाख ९३ हज़ार २२१ है। उनके पास कोई वाहन नहीं है, सि$र्फ एक टै्रैक्टर है। अब इनमें से कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ, इसकी जांच असम्भव है।
कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार राणा गुरजीत सिंह की देनदारी सबसे ज्यादा हे, जो कपूरथला सीट से मैदान में हैं। उनके शपथ-पत्र के अनुसार, बैंक लोन व अन्य वित्तीय संस्थाओं की देनदारी ४५८८.२१ लाख रुपए और आयकर समेत सरकारी देनदारी १०५०.३५ लाख रुपए की है। राणा गुरजीत की चल सम्पत्ति ३२५४.९८ लाख और अचल सम्पत्ति ४८८५.१६ लाख की है, जिसमें ६३०.१८ लाख की सम्पत्ति पैतृक है। उनके पास ३५.४२ लाख की एक लैंड क्रूजर गाड़ी है और ४२.९४ लाख के गहने हैं।
अमृतसर की पूर्व सीट से ही शिअद के बिक्रम सिंह मजीठिया पर ६६,८३६६० रुपए की बैंक देनदारियां हैं। जलालाबाद सीट से चुनाव लड़ रहे शिअद के प्रधान सुखबीर बादल की देनदारी ६४,८२८९५१९ रुपए की है। चमकौर साहिब और भदौड़ से कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार चरणजीत सिंह चन्नी पर बैंक लोन की ६३,२९९१२ रुपए की देनदारी है।
पूर्व मुख्यमंत्री और पंजाब लोक कांग्रेस के अध्यक्ष कैप्टन अमरेंदर सिंह पर भी बंैकों की २४,५३३६९ रुपए की देनदारी है। डेरा बाबा नानक सीट से कांग्रेस के सीनियर नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा पर बैंक व अन्य वित्तीय संस्थाओं का १५,९३०६३ रुपए बकाया है।
पंजाब में हर चौथे उम्मीदवार पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इस बार के चुनाव में ३१५ ऐसे प्रत्याशी हैं जिन पर विभिन्न मुकद्दमे दर्ज हैं। इनमें २१८ प्रत्याशी अपराध के गंभीर मामलों में संलिप्त हैं।
शिरोमणि अकाली दल ने ६५ और आम आदमी पार्टी ने ५८ आपराधिक रिकॉर्ड वाले प्रत्याशियों को उतारा है। यह खुलासा एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफाम्र्स (एडीआर) व पंजाब इलेक्शन वॉच ने प्रत्याशियों के नामांकर पत्रों के आधार पर किया है। चुनाव में कुल १३०४ प्रत्याशी मैदान में हैं। इनमें २८ प्रत्याशियों के दाखिल हलफनामों का विश्लेषण नहीं हो पाया है। १२७६ में से कुल ३१५ (२५ फीसदी) प्रत्याशियों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले होने की जानकारी दी है। इसमें २१८ (१७ फीसदी) ऐसे प्रत्याशी हैं जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। भाजपा के २७, शिअद (संयुक्त) के ४, बसपा के ३, कांग्रेस के १६ और पंजाब लोक कांग्रेस के ३ उम्मीदवार आपराधिक पृष्ठभूमि से हैं।
अब इनसे क्या उम्मीद रखेंगे? निष्कर्ष यही निकलेगा कि इनमें से कमोबेश कोई भी सच नहीं बोल रहा, लेकिन आप इन्हें झूठा भी नहीं कह सकते, क्योंकि इन लोगों ने झूठ भी बोला है तो ‘ऑन-रिकॉर्ड’ बोला है। इन तथ्यों से चुनाव आयोग भी वाकि$फ है, केंद्रीय गृह मंत्रालय भी और मीडिया भी। मगर इन्हें छू पाना भी आसान नहीं है। साभार: डॉ. चन्द्र त्रिखा
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