स्वामी विवेकानंद के अंतिम लम्हे...

गतांक से आगे...  अब लगता है यह शरीर छोटा पड़ रहा है। स्वामी अभेद्रानंद ने उनसे इस भविष्यवाणी का कारण पूछा तो उनका उत्तर था, ‘मेरा कार्य पूरा हो चुका है। मुझे अब जाना ही होगा। एक बड़ा वृक्ष अपने नीचे पनपने वाले पौधों को विकसित नहीं होने देता।’

संकट चाहे युवा-शक्ति में नव-ऊर्जा के संचार का हो या कोरोना-महामारी के तीसरे चरण और नए ‘ओमिक्रॉन’ के खिला$फ जूझने का हो, स्वामी विवेकानंद एक मार्गदर्शक, महानायक और प्रेरणक एवं व्यावहारिक ज्योतिपुंज के रूप में सामने आते हैं। जयंती हो या पुण्यतिथि या फिर इस महामानव का स्वामी विवेकानंद की देन, हर भूमिका में यह सम्पूर्ण मानव के रूप में आंखों के सामने आ खड़े होते हैं।

जयंती के अवसर पर इस अनूठे मार्गदर्शक की स्मृतियों पर एक बार फिर दृष्टिपात करना अत्यंत प्रासंगिक है।

जन्म- 12 जनवरी, 1863 कोलकाता।

जन्म-नाम: नरेंद्र नाथ। पुण्यतिथि: 4 जुलाई, 1902, बैलूर मठ हावड़ा

शिक्षा: स्कॉटिश चर्च कॉलेज (1884), विद्यासागर कॉलेज (1872-1877)

माता-पिता: श्री विश्वनाथ दत्त और श्रीमती भुवनेश्वरी देवी

भाई: भूपेंद्र दत्त (1880-1861), महेंद्र नाथ दत्ता

बहन: स्वर्णमयी देवी (निधन 16 फरवरी, 1932)

हम आज एक बार फिर पूर्णतया भय के माहौल में जी रहे हैं। कहीं आतंकवाद का भय, कहीं महामारी का भय, कहीं हिंसा का भय, कहीं प्रदूषण का भय, कहीं ‘ग्लोबल वार्मिंग’ का भय, कहीं भूख का भय, कहीं प्रशासन तंत्र एवं पुलिस तंत्र का भय, कहीं सामाजिक वर्जनाओं का भय।

स्वामी विवेकानंद का प्रथम संदेश यही था, ‘भय सबसे बड़ा पाप है।’

अभी भी समय है 

दो महामारियां--इन्फ्लूएंजा (1918-20) और 

कोविड-19 (2020-21) 

    जब महामारी की दूसरी लहर आई तो मुंबई (बॉम्बे) और पुणे (पूना) सबसे बुरी तरह प्रभावित शहरों में से थे। बीमारी जल्द ही देश के अन्य हिस्सों में भी फैल गई थी। अब तीसरी लहर एक नए रूप ‘ओमिक्रॉन’ को साथ लेकर आई है हालांकि पूर्वोत्तर में इसका जोर अपेक्षाकृत कम है। पहले ग्रामीण क्षेत्र भी प्रभावित हुए थे और लगभग सभी राज्य और जिले पहली लहर की तुलना में अधिक मामलों की सूचना दे रहे हैं। लोग खांसी, जुकाम और बुखार की शिकायत कर रहे हैं। छोटी आयु के लोग भी इससे प्रभावित हुए थे। बीमारी के प्रसार को नियंत्रित करने के लिए स्थानीय प्राधिकारियों ने सिनेमा हॉल, स्कूल, कॉलेज, मॉल और अन्य सार्वजनिक स्थानों को बंद करने जैसे बड़े प्रतिबंधों का आदेश दिया है। लोगों से बड़ी संख्या में एकत्र होने से बचने और मास्क पहनने की अपील की गई है। स्वास्थ्य सुविधाओं, डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की कमी अभी भी है। समाचार पत्र स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी भीड़ लगने, उन तक लोगों के पहुंचने में आने वाली कठिनाइयों के बारे में खबरों से भरे हैं। सिद्ध और प्रभावी उपचार के अभाव में, कुछ कंपनियों ने सही उपचार करने का दावा करके चिकित्सा और दवाओं के प्रचार और बिक्री से अकूत लाभ कमाया। पारंपरिक उपचारों का उपयोग भी बढ़ा। अधिकारियों द्वारा रिपोर्ट किए गए मामलों की अनुमानित संख्या से वास्तविक मामले कई गुना अधिक हैं। कई शहरों में, कब्रिस्तानों के भरने और श्मशानों घाटों में जलने के लिए लकड़ी की कमी एक बार फिर से महसूस की जा सकती है। पहले माना जा रहा था कि अधिकारियों द्वारा मौतों की पूरी और सही संख्या छिपाई जा रही थी। परीक्षाओं को स्थगित या रद्द कर दिया गया था, और छात्रों को पदोन्नत कर दिया गया। 

यह वर्णन आज से सौ साल पहले भारत में इन्फ्लुएंजा महामारी की दूसरी लहर का है, लेकिन अगर आपको 2021 की कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर का लगा, तो इसमें कुछ गलत नहीं है। 1918-20 की घातक इन्फ्लूएंजा महामारी में, नये अनुमानों के अनुसार, एक तिहाई से लेकर आधी भारतीय आबादी संक्रमित थी और करीब दो करोड़ यानी उस समय देश की आबादी के 3-6 प्रतिशत लोग मारे गए थे। महामारी की दूसरी लहर तीन महीने से भी कम समय तक चली थी-सितम्बर के मध्य से 1918 के शुरुआती दिसम्बर तक लेकिन सबसे विनाशकारी थी।

1918-20 की महामारी का लोगों पर क्या असर पड़ा इसका मानवीय रूप प्रख्यात हिन्दी लेखक और महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा 1939 में लिखित ‘कुल्ली भाट’ नामक पुस्तक से मिलता है। ‘तत्काल वापस आओ, आपकी पत्नी गंभीर रूप से बीमार है’, निराला को मिले टेलीग्राम संदेश में यही लिखा था। महाकवि तब बंगाल में थे। वह अगली ट्रेन पकड़ कर उत्तर प्रदेश के रायबरेली में अपनी पत्नी के गृहनगर डालमऊ, जो गंगा नदी के तट पर स्थित है, पहुंचे। जब निराला डालमऊ में गंगा नदी के पास से गुजर रहे थे, जैसा कि वो अपनी किताब में जिक्र करते हैं, तो उन्होंने देखा कि गंगा नदी के पानी का स्तर उसमें तैर रही लाशों की वजह से बढ़ गया था। जब वह घर पहुंचे, तब तक उनकी किशोर पत्नी पहले ही मर चुकी थी। अगले ही दिन बीमारी के दिनों में उनकी पत्नी की देखभाल कर रहे उनके चचेरे भाई और चचेरे भाई की पत्नी, एक छोटा भतीजा और चाचा, जो सभी संक्रमित थे, सब ने भी दम तोड़ दिया। निराला, इस घटना में वर्ष 1918 और उस साल फैली इन्फ्लूएंजा महामारी का जिक्र कर रहे थे, जिसने भारत को तबाह कर दिया था और उनके परिवार को भी।

निराला के विवरण को मात्र एक साहित्यिक अतिशयोक्ति के रूप में नहीं लिया जा सकता। भारत के तत्कालीन सेनेटरी कमिश्नर की एक रिपोर्ट ने भी इसी तरह का विवरण दिया है कि ‘दाह संस्कार के लिए जलावन की लकड़ी की भारी कमी के कारण पूरे भारत में सभी नदियां लाशों से भर गई थीं।’ अब यह अनुमान लगाया जाता है कि 1918 की फ्लू महामारी में प्रत्येक नागरिक प्रभावित हुआ था, हर परिवार में कम से कम एक संक्रमित था और एक परिचित मर गया था। त्रासदी यह है कि सौ साल बाद मई, 2021 में उत्तर प्रदेश और बिहार में गंगा नदी में फिर लाशें तैर रही थीं, बस महामारी नई थी। इस बार भी परिवार में लगभग एक या अधिक सदस्य संक्रमित हुआ। 

आने वाली पीढिय़ां जब इन दो महामारियों का इतिहास पढ़ेंगी तो यह जरूर सोचेंगी कि चिकित्सा विज्ञान की इतनी प्रगति की बातों के बावजूद, शायद एक सदी बाद भी चिकित्सा के क्षेत्र में बहुत कुछ किया जाना शेष था। भारत कोविड-19 की दूसरी लहर के बीच में है, जो पहली लहर की तुलना में अधिक खतरनाक है। वास्तव में, स्वास्थ्य सेवाओं और चिकित्सा विज्ञान ने पहले 100 वर्षों में काफी प्रगति की है, लेकिन इसका जो परिणाम एक महामारी के लिए बेहतर प्रतिक्रिया के रूप में सामने आना चाहिए, नहीं दिखा।

जन स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूती

जब इन्फ्लूएंजा की महामहारी फैली, तब बीमारी का कारण भी ज्ञात नहीं था (सालों बाद, १९३३ में इन्फ्लूएंजा वायरस की पहचान की गई थी)। रोग की पुष्टिï के लिए कोई प्रयोगशाला परीक्षण नहीं था और कोई टीका भी नहीं था; प्रथम विश्व युद्घ चल रहा था;  हैजा और प्लेग के कारण स्वास्थ्य सेवाएं पहले से ही प्रभावित थीं। २०२०-२१ में, वैज्ञानिक प्रगति ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि सार्स-कोव-२ के पूरे जीनोम का पता, बीमारी फैलने के दो सप्ताह के भीतर, चल चुका था। एक अत्यधिक विश्वसनीय प्रयोगशाला परीक्षण उपलब्ध था। नये टीके लोगों को लगाए जा चुके थे। अत्याधुनिक उपकरण और अस्पताल उपलब्ध थे। चिकित्सा विज्ञान की प्रगति उल्लेखनीय रही है, लेकिन लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने में सबसे अधिक कष्टïदायक समय का सामना करना पड़ा। डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं ने नये संक्रमणों का मुकाबला करने में भारी संघर्ष किया। इन सब के बीच, एक बात जो हमेशा से ज्ञात थी और फिर उभर कर आई कि महामारियों से लडऩे के लिए चिकित्सा-विज्ञान के परे महामहारी-विज्ञान और जन-स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की जरूरत होती है, लेकिन भारत जैसे देश में इस पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है।

यदि कोविड-१९ की दूसरी लहर के खत्म होने के तुरंत बाद किसी बात की आवश्यकता होगी, तो वह है, पीछे देखने और विश्लेषण करने की। पिछले दशकों में हुए आर्थिक विकास और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के बावजूद, विश्व कोविड-१९ से लडऩे में बहुत लडख़ड़ाया और अनेक देशों में स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा गईं। ऐसा क्यों हुआ और हमें आगे क्या करना होगा, इस पर सभी को व्यापक रूप में आत्म आकलन करने की जरूरत होगी। बात यहीं खत्म नहीं हो जाती, उसके बाद सरकारी सेवाओं में युद्घ स्तर पर सुधार करने की पहल  करनी होगी। मौजूदा महामारी में हुई गलतियों से सीख लेकर, भविष्य की किसी भी महामहारी के लिए भारत को तैयार करने की शुरुआत करनी होगी।

महाकवि निराला ने गंगा नदी में जो देखा, वो अलग समय और परिस्थितियां थीं, लेकिन २०२१ में गंगा में तैरती लाशें अक्षम्य हैं। अगर हमने सार्वजनिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ किया होता और १९१८ की महामारी से सबक सीख लिए होते, तो वर्तमान में चल रही महामारी के प्रभाव को कम किया जा सकता था। अब, सबक सीखने के लिए तीन महामारियों का अनुभव हैं।

साभार- डॉ. चंद्रकांत लहारिया


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